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मेष लग्न (कालपुरूष) की कुंडली का अध्ययन (पाठ - 4)

मेष लग्‍न की कुंडली ही कालपुरूष की कुंडली मानी गई है और सारे ज्योतिषिय फ़लित का आधार भी यही है. ज्योतिष को जानने समझने के लिये हमें कालपुरूष की कुंडली को समझना अति आवश्यक है. आईये कालपुरूष यानि मेष लग्न की कुंडली का यहां विचार करते हैं.

धरती के घूमने के फलस्‍वरूप आसमान के 360 डिग्री पूर्व दिशा से पश्चिम दिशा की ओर जाती हुई पट्टी को बारह भागों में बांटने से तीस तीस डिग्री की कुल बारह राशियां बनी हैं. आप इन्हें पॄथ्वी की कक्षा को जानने समझने के लिये माईल स्टोन की तरह भी समझ सकते हैं.

कुंडली का अध्ययन करने के लिये लग्न अति महत्वपूर्ण होता है तत्पश्चात चंद्रलग्न और सूर्यलग्न का महत्व है. यह लग्न क्या है? जातक के जन्‍म समय पर पूर्वी क्षितिज में जो राशि उदय हो रही हो , उसे ही लग्‍न कहते हैं. 24 घंटे में एक के पश्चात एक ये 12 ही लग्न आते हैं. और इन बारह लग्‍न मे जो भी पूर्वी क्षितिज की उदय होती हुई राशि जन्म समय में होती है वही जातक का लग्न होता है. एक लग्न तकरीबन दो घंटे तक रहता है. जातक का जन्‍म जिस लग्‍न में हुआ होता है , उसी अनुरूप उसकी कुंडली के ग्रहों का अध्ययन करके उसके भावी जीवन के सभी संदर्भों के बारे में भविष्य वाणी की जा सकती है.

पॄथ्वी की कक्षा की 360 डिग्री के प्रथम भाग यानि आकाश के 0 डिग्री से 30 डिग्री तक के हिस्से को मेष राशि के रूप में जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म के समय यह राशि आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होती दिखे तो उस जातक लग्‍न मेष माना होता है. मेष लग्‍न की कुंडली इस जगत और मानव जाति को संपूर्ण रूप से अभिव्यक्त करती है. एवम फ़लित ज्योतिष में इसको समझे बिना सटीकता से फ़ल कथन करना असंभव है. इसकी महता को समझने के लिये निम्न बिंदू विचारणीय हैं.

मेष लग्‍न की कुंडली के अनुसार मन का स्‍वामी चंद्र चतुर्थ भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक की माता, संपत्ति, भूमि, भवन, प्रेम और स्‍थायित्‍व को प्रतिनिधित्‍व करता है. मनुष्य के मन को पूर्ण रूप से संतुष्‍ट कर सकने वाली जगह माता , मातृभूमि , छोटी या बडी संपत्ति, प्रेम एवम स्‍थायित्‍व ही होता है. क्योंकि इनके अभाव में जातक कदापि सुखी नहीं हो सकता.

इस कुंडली में समस्‍त जगत को प्रकाशमान रखने वाला सूर्य पंचम भाव का स्‍वामी बनता है एवम यह जातक की बुद्धि , ज्ञान और संतान का प्रतिनिधि होता है. मनुष्य भी अपनी बुद्धि, ज्ञान एवम समझ के बल पर या सुयोग्‍य संतान के बल पर ही सारी दुनिया में रोशनी फैलाने में सक्षम होता हैं, जबकि बुद्धि एवम ज्ञान के अभाव में या अयोग्‍य संतान समस्त दुनियां को दिशाहीन कर देती है. इसलिये इस भाव का मानव जीवन में अति महत्वपूर्ण स्थान होता है.

इसके बाद मंगल प्रथम एवम अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता हुआ जातक के शरीर और जीवन का प्रतिनिधि होता है. शरीर की देखभाल, मजबूती देने के लिए तथा स्‍वास्‍थ्‍य के लिए मानव को जीवनशैली को सुव्‍यवस्थित बनाए रखना होता है. स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा और नीरोग हो तो जीवन के सही होने की एवम स्‍वास्‍थ्‍य बुरा हो तो जीवन के बिगडने की संभावना ही अधिक बनती है. जीवनशैली गडबड हो तो स्‍वास्‍थ्‍य के खराब रहने की तथा जीवनशैली ठीक हो तो स्‍वास्‍थ्‍य के अच्‍छे बने रहने की संभावना बलवती होती है.

शुक्र द्वितीय और सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है जो कि जातक के धन कोष तथा दापंत्य/गृहस्‍थी का स्वामी होता है. मनुष्य को गृहस्‍थी के लिए धन की तथा धन की व्‍यवस्‍था के लिए गृहस्‍थी की आवश्‍यकता पडती है, यानि दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं. साधन और संपन्‍नता हो तो गृहस्‍थी की गाडी भली प्रकार दौडती है , जबकि धन के अभाव में घर गृहस्‍थी का वातावरण खराब रहता है. इसी प्रकार जीवनसाथी के साथ सहयोग से आर्थिक स्थिति और अधिक मजबूत होती है, जबकि ऐसा नही होने पर आर्थिक स्थिति में कमजोरी ही दिखाई देती है. वर्तमान युग में तो पति पत्नि दोनों ही कामकाजी होने से ये दोनों ही बाते भली प्रकार समझी जा सकती हैं.

बुध तृतीय और षष्‍ठ भाव का स्‍वामी है और यह जातक के भाई बंधु, झंगडा एवम प्रभाव से संबंधित मामलों का स्वामी होता है. मनुष्य के जीवन में भाई, बंधुओं के बीच झंझट झगडे होने की अतिशय संभावना बनी ही रहती है एवम किसी भी झंगडे को निपटाने के लिये भाई बंधुओं का सहयोग भी अति आवश्‍यक होता है. अगर जातक के भाई बंधुओं की स्थिति मजबूत होकर वो सक्षम हों तो कई प्रकार के झंझट विवादों को निपटाने में वे प्रभाव का उपयोग करके मददगार भी हो सकते हैं. अगर यह कमजोर हो तो न तो झंझट झगडे निपटते हैं और ना ही प्रभाव में कोई बढोतरी होने की संभावना बनती है. जिसके पास झंझट झगडे निपटाने की ताकत मौजूद हो तो उन्‍हें भाई बंधुओं की कभी कमी भी नहीं रहती.

बृहस्‍पति यानि गुरू नवम और द्वादश भाव का अधिपति होता है एवम यह जातक के धर्म, भाग्य, खर्च और बाहरी संदर्भों को अभिव्यक्त करता है. मानव जीवन में भाग्‍य और खर्च का पारस्‍परिक अदभुत संबंध होता है. जातक भाग्‍य की मजबूती की वजह से खर्च करने की शक्ति या बाहरी संदर्भों की श्रेष्ठता प्राप्‍त करते हैं एवम खर्च करने की शक्ति या बाहरी संदर्भों की प्रबलता से भाग्‍य भी प्रबल होता हैं. अगर भाग्‍य कमजोर हो तो खर्च शक्ति या बाह्य संदर्भों में न्य़ुनता और खर्च करने की शक्ति न्यून हो तो भाग्‍य भी निर्बल होता है.

शनि दशम और एकादश भाव का होकर यह जातक के पिता पक्ष , प्रतिष्‍ठा पक्ष और सर्व प्रकार के लाभ को अभिव्यक्त करता है. मानव जीवन में पिता पक्ष और लाभ का आपस में संबंध होता है. यह कोई बताने वाली बात नही हैं कि एक बच्‍चे को समाज में पहचान पिता के नाम से ही मिलती है, पिता के स्‍तर के अनुरूप ही उसे पद और प्रतिष्‍ठा मिलती है तदनुरूप ही उसके लाभ का माहोल होता है. इसे यूं भी कहा जा सकता है कि लाभ के वातावरण के दॄढ होने पर ही किसी जातक को समाज में प्रतिष्‍ठा मिल पाती है और प्रतिष्‍ठा मिल जाने पर लाभ प्राप्ति का वातावरण और अधिक मजबूत बन जाता है.