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ग्रहों के वर्जित (निषेध) दान एवं कार्य

दरअसल यह सब निर्भर करता है हमारी जन्मकुँडली में बैठे ग्रहों पर, जो यह संकेत करते हैं कि किस वस्तु का दान या त्याग करना अथवा कौन से कार्य हमारे लिए लाभदायक होगें और कौन सी चीजों के दान/त्याग अथवा कार्यों से हमें हानि का सामना करना पडेगा. इसकी जानकारी निम्नानुसार है.
जो ग्रह जन्मकुंडली में उच्च राशि या अपनी स्वयं की राशि में स्थित हों, उनसे सम्बन्धित वस्तुओं का दान व्यक्ति को कभी भूलकर भी नहीं करना चाहिए.
सूर्य मेष राशि में होने पर उच्च तथा सिँह राशि में होने पर अपनी स्वराशि का होता है. अत: आपकी जन्मकुंडली में उक्त किसी राशि में हो तो:-
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लाल या गुलाबी रंग के पदार्थों का दान न करें.
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गुड, आटा, गेहूँ, ताँबा आदि किसी को न दें.
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चीटियों को आटा मीठा ना खिलायें.
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खानपान में नमक का सेवन कम करें.
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मीठे पदार्थों का अधिक सेवन करना चाहिए.
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कोई मृत्यु के लिए प्राण त्यागने के लिये छटपटा रहा हो तो अविलंब वहां से हट जाये.
चन्द्र वृष राशि में उच्च तथा कर्क राशि में स्वगृही होता है. यदि आपकी जन्मकुंडली में ऎसी स्थिति में हो तो :-
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दूध, चावल, चाँदी, मोती एवं अन्य जलीय पदार्थों का दान कभी नहीं करें.
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माता अथवा माता तुल्य किसी स्त्री का कभी भूल से भी दिल न दुखायें अन्यथा मानसिक तनाव, अनिद्रा एवं किसी मिथ्या आरोप का भाजन बनना पडेगा.
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किसी नल, टयूबवेल, कुआँ, तालाब अथवा प्याऊ निर्माण में कभी आर्थिक रूप से सहयोग न करें. अन्यथा अलप्मृत्यु, परिवार घटने जैसी समस्याएं रहेंगी.
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हल्के श्वेत या दुधिया रंग के पदार्थ किसी को ना देवें वर्ना लेने वाले की आयु घटेगी.
* स्वयं की पत्नी सहित किसी भी स्त्री को कभी नाराज ना करें वर्ना मानसिक तनाव, अनिद्रा व कलंक लगने की संभावना रहेगी.
* विशेषकर जब चंद्रमा 12 वें भाव में हो तब धर्मात्मा, साधु संत या पुजारी इत्यादि को भोजन ना करवाएं और ना ही बच्चों की निशुल्क शिक्षा का खर्चा उठाना चाहिये. ऐसा करने से जातक की ऐसी स्थिति होती है कि अंत समय उसको कोई पानी पिलाने वाला भी नही रहता.
मंगल मेष या वृश्चिक राशि में हो तो स्वराशि का तथा मकर राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में:
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मसूर की दाल, या दो फ़ाड होने वाली दाल,  मिष्ठान अथवा अन्य किसी मीठे खाद्य पदार्थ का दान नहीं करना चाहिए.
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घर आये किसी मेहमान को कभी सौंफ या मिठाई खाने को न दें अन्यथा वह व्यक्ति कभी किसी अवसर पर आपके खिलाफ ही कडुवे वचनों का प्रयोग करेगा अर्थात बाहर वह आपकी बुराई ही करेगा.
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विशेषकर जब मंगल छठे भाव में राहु या शनि अथवा कुंडली के षष्ठेस या दशमेश के साथ हो तो   किसी भी प्रकार का बासी भोजन( अधिक समय पूर्व पकाया हुआ) न तो स्वयं खायें और न ही किसी अन्य को खाने के लिए दें. और ना ही औषधि, दवाईयां या चिकित्सा सामग्री का दान करना चाहिये वर्ना जहर देने जैसा कलंक या सजा मिल सकती है.
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विशेषकर जब 12 वें भाव में मंगल हो तब बडे भाईयों से सहयोग की ना तो उम्मीद करनी चाहिये और ना ही उनका सहयोग लेना चाहिये बल्कि आप स्वयं उनको सहयोग करें. अन्यथा जीवन भर पछतावे वाली घटनाएं होती हैं.
बुध मिथुन राशि में तो स्वगृही तथा कन्या राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. यदि आपकी जन्मपत्रिका में बुध उपरोक्त वर्णित किसी स्थिति में है तो :
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हरे रंग के पदार्थ और वस्तुओं का दान नहीं करना चाहिए.
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साबुत मूँग, पन्ना, फ़ूल, पैन-पैन्सिल, पुस्तकें, मिट्टी का घडा, मशरूम, टीवी, रूमाल आदि का दान न करें अन्यथा सदैव रोजगार और धन सम्बन्धी समस्यायें बनी रहेंगी.
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न तो घर में मछलियाँ पालें और न ही मछलियों को कभी दाना डालें.
* विशेषकर जब बुध या तृतीयेश 11 वें भाव में हो तो किसी दूसरे से सलाह लेने की बजाय स्वयं के निर्णय लेने चाहिये. दूसरे की सलाह से किये गये कार्य अक्सर हानि देते हैं.
बृहस्पति जब धनु या मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा कर्क राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. ऎसी स्थिति में :
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पीले रंग के पदार्थों का दान वर्जित है.
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सोना, पीतल, केसर, धार्मिक साहित्य या वस्तुएं आदि का दान नहीं करना चाहिए. अन्यथा घर का जोगी जोगडा, आन गाँव का सिद्धजैसे हालात होने लगेंगे अर्थात मान-सम्मान में कमी रहेगी एवम स्वयं का धर्म भ्रष्ट होगा.
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घर में कभी कोई लतादार पौधा न लगायें.
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विशेषकर शुक्र या सप्तमेश 7 वें भाव में हो तो किसी को भी वस्त्र का दान नही करना चाहिये वर्ना स्वयं निर्वस्त्र हो जायेगा अर्थात स्वयं का सब कुछ खो देगा.
* विशेषकर गुरू या नवमेश वें भाव में हो तो जातक कितना ही योग्य हो उसे अपनी जन्म भुमी पर मान सम्मान नही मिल सकता. ऐसे जातक को अपना जन्म स्थान छोड देना चाहिये.
शुक्र जब जन्मपत्रिका में वृष या तुला राशि में हो स्वराशि तथा मीन राशि में हो तो उच्च भाव का होता है. अत सी स्थिति में:
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से व्यक्ति को श्वेत रंग के सुगन्धित पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए अन्यथा व्यक्ति के भौतिक सुखों में न्यूनता पैदा होने लगती है.
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नवीन वस्त्र, फैशनेबल वस्तुएं, कास्मेटिक या अन्य सौन्दर्य वर्धक सामग्री, सुगन्धित द्रव्य, दही, मिश्री, मक्खन, शुद्ध घी, इलायची आदि का दान न करें अन्यथा अकस्मात हानि का सामना करना पडता है.
शनि यदि मकर या कुम्भ राशि में हो तो स्वगृही होता है तथा तुलाराशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. सी दशा में :
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काले रंग के पदार्थों का दान न करें.
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लोहा, लकडी और फर्नीचर, तेल या तैलीय सामग्री, बिल्डिंग मैटीरियल आदि का दान/त्याग न करें.
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भैंस अथवा काले रंग की गाय, काला कुत्ता आदि न पालें.
राहु यदि कन्या राशि में हो तो स्वराशि का तथा वृष(ब्राह्मण/वैश्य लग्न में) एवं मिथुन(क्षत्रिय/शूद्र लग्न में) राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. सी स्थिति में:
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नीले, भूरे रंग के पदार्थों का दान नहीं करना चाहिए.
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मोरपंख, नीले वस्त्र, कोयला, जौं अथवा जौं से निर्मित पदार्थ आदि का दान किसी को न करें अन्यथा ऋण का भार चढने लगेगा.
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अन्न का कभी भूल से भी अनादर न करें और न ही भोजन करने के पश्चात थाली में झूठन छोडें.

केतु यदि मीन राशि में हो तो स्वगृही तथा वृश्चिक(ब्राह्मण/वैश्य लग्न में) एवं धनु (क्षत्रिय/शूद्र लग्न में) राशि में होने पर उच्चता को प्राप्त होता है. आपकी जन्मपत्रिका में केतु उपरोक्त स्थिति में है तो :
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घर में कभी पक्षी न पालें अन्यथा धन व्यर्थ के कामों में बर्बाद होता रहेगा.
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भूरे, चित्र-विचित्र रंग के वस्त्र, कम्बल, तिल या तिल से निर्मित पदार्थ आदि का दान नहीं करना चाहिए.
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नंगी आँखों से कभी सूर्य/चन्द्रग्रहण न देंखें अन्यथा नेत्र ज्योति मंद पड जाएगी अथवा अन्य किसी प्रकार का नेत्र सम्बन्धी विकार उत्पन होने लगेगा.

साप्ताहिक भविष्यफ़ल : - 23 जनवरी 2012 से 29 जनवरी 2012 तक

साप्ताहिक भविष्यफ़ल : - 23 जनवरी 2012 से 29 जनवरी 2012 तक



(चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ)
सप्ताह की शुरूआत में मन प्रसन्न रहेगा, कारोबार में उन्नति और जीवन साथी से मधुर संबंध, नई कार्य योजनाएं यथार्थ रूप लेंगी. कारोबार एवम आय में वृद्धि होगी. सप्ताह के मध्य में कार्य की अधिकता की वजह से स्वभाव में चिडचिडापन रहेगा, लेकिन धन आगमन सुगमता पूर्वक होगा सभी कार्य यथा समय पूर्ण हो सकेंगे. सप्ताहांत में भ्रमण मनोरंजन एवम भोगविलास की सामग्री पर खर्च होगा, मन आनंदित रहेगा.


( इ, उ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो)
सप्ताह की शुरूआत में आपकी पूर्व मे बनाई योजनाओं को आप मूर्त रूप देने की कोशीश करेंगे, इसमें भाग्य का साथ भी मिल पायेगा. खर्चों की अधिकता रहेगी, किसी कार्ययोजना के लिये ॠण आदि प्राप्त करने में सफ़लता मुश्किल से मिलेगी. सप्ताह मध्य में सभी कार्य योजनाएं के मूर्त रूप लेने की संभावना है, कार्य की अधिकता रहेगी, शांति पूर्वक कार्य करें. सप्तांत में आपकी मेहनत का परिणाम मिलेगा.


(क, की, कू, घ, ड, छ, के, को, ह)
आप जिन योजनाओं पर कार्य कर रहे हैं उनमे आपकी मेहनत और श्रम चालू रहेगा. सप्ताह के मध्य में आपको लगेगा कि अब कार्य पूरा हुआ..अब कार्य पूरा हुआ, किंतु ग्रहों की स्थिति अनुसार आपके श्रम का कोई विशेष फ़ल प्राप्त नही हो पायेगा. आप अपनी योजनाओं को गुप्त रूप से कार्यान्वित करते रहें, अभी तो सप्ताह अंत तक आपका आय व्यय बराबर रहेगा. पारिवारिक सहयोग आपको मिलता रहेगा

(हि, हु, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो)
सप्ताह की शुरूआत में भाग्य और धर्म का सुंदर सहयोग मिलेगा, अगर आप कुंआरे हैं तो विवाह प्रस्ताव प्राप्त होने की प्रबल संभावना हैं जो कि सफ़ल भी हो सकेंगे. सप्ताह मध्य में जरा सा मन खिन्न रहेगा, बिना किसी कारण ही मन मे निरूत्साह हावी रहेगा. सप्ताहांत में आपके सारे बचे हुये काम बन जायेंगे. धनागमन होगा एवम जीवन साथी और मित्र जनों का सहयोग प्राप्त होगा.


(मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे)
सप्ताह की शुरूआत में शरीर में आलस्य की अधिकता रहेगी, अगर आप किसी पुराने रोग के मरीज हैं तो वह रोग फ़िर से उभर आने की संभावना रहेगी. सप्ताह मध्य में भाग्य वश धन का आगमन अच्छा होगा, कार्य व्यवसाय गति पकडेगा किंतु सप्ताहांत में कार्य का बोझ और कार्य पूर्ण ना होने की वजह से मन में खिन्नता बनी रहेगी.


(टो, पा, पी, पू, प, ण, ठ, पे, पो)
सप्ताह की शुरूआत में मन नेक कार्यों में लगा रहेगा, किसी धार्मिक कार्य में धन खर्च होगा, बुद्धि में स्थिरता रहेगी. सप्ताह मध्य में भाग्य से आय अच्छी होगी जिससे मन प्रफ़ुल्लित रहेगा. इसके बावजूद भी शरीर में कुछ रुग्णता महसूस होगी जो कि सप्ताहांत तक दूर होकर प्रसन्नता में बदल जायेगी.


(रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते)
कार्य व्यवसाय के दबाव और उसमें सफ़लता के साथ ही यह सप्ताह शुरू हो रहा है. किंतु अपनी कार्य योजनाओं और व्यापारिक रणनीति को गोपनीय रखें वर्ना विरोधियों से नुक्सान उठाना पड सकता है. कुल मिलाकर इस सप्ताह आप अपने वाक चातुर्य से सभी कार्य सुधार लेंगे और इच्छित सफ़लता प्राप्त करेंगे. परिवार जनों के लिये समय नही निकाल पायेंगे, जिसकी वजह से उनकी नाराजी उठानी पडेगी एवम कार्य की अधिकता की वजह से थकान महसूस करेंगे.


(तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू)
सप्ताह की शुरूआत में परिश्रम और कर्मठता से आपको कार्यों में सफ़लता प्राप्त होगी. सप्ताह के मध्य में कार्य की अधिकता की वजह से आपका समय परेशानी भरा व्यय्तीत होगा जिससे मन में उदासी रहेगी, अनावश्यक यात्राओं को टालें. जरूरी ही हो तो मुंह मीठा करके जल पीकर, उसके बाद ही यात्रा को निकले. जो स्वर चल रहा हो उसी पैर को पहले आगे बढाते हुये यात्रा को जाये. सप्ताहांत में सभी परेशानियां समाप्त होकर हंसी खुशी का वातावरण बनेगा.


(ये, यो, भा, भी, भू, ध, फ़, ढ, भे)
सप्ताह की शुरूआत अत्यधिक सुंदर हो रही है. आप अगर संतान की इच्छा रखते हैं तो इस समय आपको परिवार में बढोत्तरी का शुभ समाचार सुनने को मिलेगा. धन की आवक भी अच्छी रहेगी, अटका हुआ धन भी प्रात होगा. सप्ताह मध्य में आप किन्ही विशेष गुप्त योजनाओं को मूर्त रूप देने में व्यस्त रहेंगे. और सप्ताहांत तक आप इच्छित कार्य पूर्ण करने में जुटे रह कर सफ़लता प्राप्त कर पायेंगे और इच्छित लाभ भी प्राप्त करने में सफ़ल रहेंगे.


(भो, जा, जी, जू, जे, जो, खा, खी, खू, खे, खो, गा, गी)
भाग्य और कर्म का अदभुत समन्वय इस सप्ताह की शुरूआत में रहेगा, इच्छित कार्य पूरे होंगे, जीवन साथी से थोडा मनमुटाव रहने की संभावना है. सप्ताह मध्य में भी आपका कार्य व्यवसाय व्यवस्थित चलेगा परंतु अकारण मन में विषाद रहेगा. सप्ताहांत कार्य व्यव्साय की उलझनों में ही व्यतीत हो जायेगा जिससे थोडी थकान महसूस करेंगे. खान पान व्यवस्थित रखें.


(गु, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, द)
सप्ताह की शुरूआत में मन में बेचैनी और शरीर में रूग्णता व्याप्त रहेगी. धन भी अटकेगा, आमदनी में भी परेशानी रहेगी. खर्चों की तनिक अधिकता रहेगी. सप्ताह मध्य में हंसी खुशी का वातावरण बन जायेगा, शरीर में चुस्ती फ़ुर्ती बहाल होगी और सप्ताहांत में धनागमन होकर कुटुंबी जनों का सहयोग और सुख प्राप्त होगा


(दी, दू, ठ, झ, दे, दो, चा, ची)
सप्ताह की शुरूआत में ही कार्य भार की अधिकता रहेगी, आप ऐसे कार्यों में व्यस्त रहेंगे जो अनावश्यक होंगे और उनकी वजह से आप तनाव ग्रस्त रहेंगे. सप्ताह मध्य में खर्चों की अधिकता की वजह से मन में उदासीनता रहेगी. बुद्धि भ्रम की स्थिति बनेगी. सप्ताहांत में आप तंदरूस्ती प्राप्त करेंगे और आपका अभी तक का अव्यवस्थित कार्य व्यवस्थित होगा. गैर जरूरी कार्यों से बचें.
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मासिक भविष्यफ़ल जनवरी 2012

मासिक भविष्यफ़ल : - 14 January 2012 से 13 Feb. 2012 तक

उपरोक्त अवधि में सूर्य 14 जनवरी तक धनु राशि में रहेंगे तत्पश्चात मकर राशि में रहेंगे, मंगल सिंह राशि में, बुध वृष्चिक राशि मे, 4 जनवरी से धनु राशि में और 25 जनवरी के पश्चात मकर राशि में, गुरू मेष राशि में, शुक्र मकर राशि में 9जनवरी तक तत्पश्चात कुंभ राशि में भ्रमण करेंगे, शनि तुला राशि में रहेंगे, राहु वृष्चिक राशि में और केतु वृष राशि में भ्रमण करेंगे. ग्रहों की उपरोक्त स्थिति अनुसार विभिन्न राशि धारियों का 14 January 2012 To 13 Feb. 2012 का भविष्य फ़ल निम्नानुसार रहेगा.


(चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ)
इस अवधि में धन, संपति का बहुत उत्तम सुख मिलेगा. धन संपति के रूके कार्य सुलझेंगे. वायु विकार जन्य रोगों से किंचित पीडा रहेगी, अधिक उम्र वाले जातक इन रोगों से सावधान रहें एवम अपने चिकित्सक की सलाह अनुसार चले. इस अवधि में संतान से संबंधित चिंता बनी रहेगी. कारोबार व्यवसाय बढिया चलेगा. मासांत में खर्चों की अधिकता रहेगी. जनवरी 19, 20, 28, 29 एवम फ़रवरी की 6, 7, 8 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


( इ, उ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो)
इस अवधि में स्वास्थ्य सुख अच्छा रहेगा. धन का आगमन अच्छा रहेगा यानि रुका हुआ धन प्राप्त होगा. संतान सुख अच्छा रहेगा, संतानों के बारे में सुखद खबर मिलेंगी. ऊंचे और रसूखदार लोगों का साथ व सहयोग प्राप्त होगा. मित्रों से अच्छा तालमेल बना रहेगा, वक्त जरूरत मित्र आपकी मदद को तैयार मिलेंगे. इस अवधि में जीवन साथी के प्रति चिंता बनी रहेगी. कार्य व्यवसाय में परिवर्तन के योग दिखाई दे रहे हैं. जनवरी 21, 22, 30, 31 एवम फ़रवरी की 1, 9, एवम 10 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(क, की, कू, घ, ड, छ, के, को, ह)
इस अवधि में स्वास्थ्य की परेशानी रहेगी. धन का लाभ अच्छा रहेगा, व्यापार व्यवसाय सुगमतापूर्वक चलता रहेगा. आनंद दायक भ्रमण मनोरंजनपूर्ण यात्राएं होंगी, जीवन साथी का सुंदर सहयोग और सुख उपलब्ध होगा लेकिन अचानक घरेलू झगडे झंझट परेशानियां खडी होंगी जिनसे अचानक कष्ट बढेगा. जनवरी 14, 15, 23, 24 एवम फ़रवरी की 2, 3, 11, 12 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(हि, हु, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो)
इस अवधि में कारोबार, व्यापार व्यवसाय में किंचित गडबडी दिखाई दे रही है जिसकी वजह से आप परेशान रहेंगे. यात्राओं में भी कष्ट रहेगा. संतान की और से भी परेशानी परिलक्षित हो रही है, लेकिन जीवन साथी का सहयोग और सुख आपको प्राप्त होता रहेगा जिसकी वजह से आप इन परेशानियों से पार पाने में सफ़ल होंगे. आपके छिपे हुये पुराने शत्रु आपको परेशान कर सकते हैं और राज्य सरकार पक्ष की तरफ़ से भी आपको इस समयावधि में परेशानी खडी हो सकती है. जनवरी की 16, 17, 18, 25, 26, 27 एवम फ़रवरी की 4, 5 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे)
इस अवधि में आप पेट संबंधी बिमारियों से परेशान रह सकते हैं अत: खान पान का विशेष ख्याल रखें. मित्रों एवम संबंधियों से भी इस अवधि के दौरान आपको परेशानियां अनुभव होंगी, उनसे कोई विशेष सहयोग की अपेक्षा ना रखें. जीवन साथी से भी आपको तनाव एवं चिंता बनी रहेगी. कारोबार व्यापार व्यवसाय में रूकावट एवम परेशानियां खडी होंगी. आय से ज्यादा धन का व्यव होगा. जनवरी 19, 20, 28, 29 एवम फ़रवरी की 6, 7, 8 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(टो, पा, पी, पू, प, ण, ठ, पे, पो)
इस समयावधि में आप वायु जनित रोगों से पिडित रहेंगे, खान पान का विशेष ख्याल रखें एवम नियमित सैर को जायें. ग्रह योग धन हानि का संकेत दे रहे हैं. शत्रु पक्ष किंचित माह के पूर्वार्ध में आप पर हावी रहेगें. जीवन साथी का विशेष सुख और सहयोग प्राप्त होता रहेगा जिससे आप सभी परेशानियों से बाहर निकल कर माह के अंत में विशेष लाभान्वित होंगे एवम नये कारोबार की रूपरेखा एवम लाभ की और अग्रसर होंगे. जनवरी 21, 22, 30, 31 एवम फ़रवरी की 1, 9, एवम 10 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते)
इस अवधि में आप कफ़ जनित रोगों से पीडित रह सकते हैं. आंखों की पुरानी बीमारी से कष्ट उठाना पड सकता है. कुटुंबियों से धन संपदा के विवादों से भी झूजना पड सकता है. न्यायालयीन विवादों अनावश्यक धन हानि के योग दिखाई दे रहे हैं. यानि बीमारी और विवादों में व्यर्थ धन हानि होगी. संतान पक्ष की और से भी चिंतित रहेंगे लेकिन इस सबके बावजूद आपका कार्य व्यव्साय व्यवस्थित चलता रहेगा. जनवरी 14, 15, 23, 24 एवम फ़रवरी की 2, 3, 11, 12 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू)
इस अवधि में आपमें क्रोध की मात्रा बढी हुई रहेगी जिसकी वजह से आप नुक्सान उठायेंगे, अपने क्रोध को काबू में रखकर स्वविवेक से कार्य करें. मित्रों एवम संबंधियों से भी कष्ट प्राप्ति के योग बन रहे हैं. राज सत्ता पक्ष से हानि उठानी पड सकती है. विपरीत लिंगी से लाभ प्राप्त होगा. कारोबार व्यवसाय ठीक चलेगा. जनवरी की 16, 17, 18, 25, 26, 27 एवम फ़रवरी की 4, 5 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(ये, यो, भा, भी, भू, ध, फ़, ढ, भे)
इस अवधि में आप कफ़ एवम वायु विकार जैसे रोंगो से परेशान रहेंगे, खान पान एवम अपने चिकित्सक की सलाह का विशेष ध्यान रखें. इस अवधि में खर्चे बढे हुये रहेंगे, संतान पक्ष की और से चिंता लगी रहेगी, व्यापार व्यवसाय में भी रूकावट दिखाई दे रही है जिससे आपकी मानसिक चिंतायें बढी हुई रहेंगी. जनवरी 19, 20, 28, 29 एवम फ़रवरी की 6, 7, 8 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(भो, जा, जी, जू, जे, जो, खा, खी, खू, खे, खो, गा, गी)
इस अवधि में आप सर दर्द व पेट दर्द जैसी बीमारियों से परेशान रहेंगे. इस अवधि की यात्राएं भी कष्ट प्रद रहेंगी. शत्रु पक्ष आप पर हावी रहेगा लेकिन आपको इस अवधि में जीवन साथी का सुख व सहयोग भरपूर प्राप्त होगा जिससे आप मानसिक रूप से अच्छा महसूस करेंगे. कार्य व्यवसाय अच्छा रहेगा. जनवरी 21, 22, 30, 31 एवम फ़रवरी की 1, 9, एवम 10 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(गु, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, द)
इस अवधि में वाहन सावधानी से चलाएं, दुर्घटना का भय रहेगा. पेट से संबंधित रोग परेशान करेंगे. धन की आवक अच्छी रहेगी. मित्रों से मिलन होगा एवम उनका अच्छा सहयोग मिलेगा. जीवन साथी से किंचित वैचारिक मतभेद हो सकते हैं. व्यापार व्यवसाय कमजोर रहेगा. जनवरी 14, 15, 23, 24 एवम फ़रवरी की 2, 3, 11, 12 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(दी, दू, ठ, झ, दे, दो, चा, ची)
इस अवधि में आपकी सेहत अच्छी रहेगी पर ग्रह योग धन हानि का संकेत कर रहे हैं. खर्चों की अधिकता रहेगी. मित्रों और सगे संबंधियों से आपको मार्गदर्शन, सहयोग एवम मदद प्राप्त होगी. व्यापार व्यवसाय की नई योजनाएं बनेंगी, वर्तमान कार्य व्यवसाय यथावत व्यवस्थित चलता रहेगा. जनवरी की 16, 17, 18, 25, 26, 27 एवम फ़रवरी की 4, 5 तारीख अशुभ रह सकती हैं.

शिक्षा पूर्ण होगी अथवा अपूर्ण रहेगी?

बालक की शिक्षा कैसी होगी? यह विषय प्रत्येक माता पिता को चिंतित रखता है. और वैसे भी आज पालकों का जोर बच्चों को किसी भी प्रकार से उच्च शिक्षा दिला कर उनको स्थापित करना होता है. जन्मकुंडली द्वारा सहज रूप से यह पता लगाया जा सकता है कि जातक की शिक्षा दीक्षा कैसी होगी?

अगर जन्मकुंडली में पंचमेश उच्च का या स्वग्रही होकर केंद्रों अथवा त्रिकोणों में अवस्थित हो तो बहुत ही सुंदर विद्या योग बनता है. ऐसा जातक अल्प प्रयत्न से ही अच्छी शिक्षा हासिल कर लेता है. यह योग तभी बनेगा जब पंचम भाव में मेष, मिथुन, तुला या कुंभ राशि हो. इसका मतलब यह हुआ कि यह योग धनु, कुंभ, मेष, तुला एवम मिथुन लग्नों में अति प्रभवाशाली बनेगा. लग्न एवं पांचवे भाव में ये राशियां विद्या दायक होती हैं. ध्यान रहे सिंह लग्न में पंचम भाव में धनु राशि आयेगी जो अपवाद स्वरूप है. पंचम भाव में धनु राशि अपूर्ण विद्या की सूचक है.

मेष लग्न में अगर पंचम भाव में सूर्य स्वग्रही हो तो पूर्ण विद्या योग होगा. इस योग वाला जातक जिस भी क्षेत्र में विद्यारंभ करेग उसमें पूर्ण सफ़लता हासिल करता है. सूर्य ज्ञान और प्रकाश का दाता है. पंचम पर इसका प्रभाव जातक को विद्या, बुद्धि, धन एवम पुत्र प्रदान करने में पूर्ण सक्षम होता है.

इसी तरह कुछ विद्या में बाधक योग भी बनते हैं. वॄष, मकर, कन्या एवम सिंह लग्न में यही राशियां पंचम भाव में होगी तब यह योग घटित होगा. जनम्कुंडली अन्य कोई शुभ योग की न्यूनता हो तो ऐसे जातक के विद्याध्ययन में बहुत सी बाधायें आ खडी होती हैं. कुछ ऐसे हालात बन जाते हैं कि विद्या अध्ययन बीच मे छोडने की संभावना प्रबल होती है.

यदि पंचमेश पापग्र्हों के प्रभाव में हो और चठे आठवे या बारहवें भाव में स्थित हो तो यह अध्ययन को भंग करने वाला है. ऐसा जातक अपने शिक्षाकाल में एक दो बार फ़ेल अवश्य होता है. ऐसे जातक के अन्य ग्रह अगर शुभ प्रभाव में हों तो रूक रूक कर शिक्षा चलती रहती है परंतु जातक अपने लक्ष्य को हासिल करने में असफ़ल ही रहता है. यदि जनमकुंडली में ऐसे योग विद्यमान हों तो जातक को सरस्वती यंत्र की पूजा करे और पंचमेश का रत्न किसी योग्य दैवज्ञ की सलाह से धारण करें.

इच्छानुसार संतान प्राप्त करने के उपाय

विवाहोपरांत दंपति को संतान प्राप्ति की प्रबल उत्कंठा होती है. आज जब लडकियां भी पढ लिखकर काफ़ी उन्नति कर रही हैं तो भी अधिकांश दंपतियों की दबे छुपे मन में पुत्र संतान ही प्राप्त करने की इछ्छा रखते हैं. यों तो संतान योग जातक की जन्मकुंडली में जैसा भी विद्यमान हो उस अनुसार प्राप्त हो ही जाता है फ़िर भी कुछ प्रयासों से मनचाही संतान प्राप्त की जा सकती है. यानि प्रयत्न पूर्वक कर्म करने से बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है.

योग्य पुत्र प्राप्त करने के इच्छुक दंपति अगर निम्न नियमों का पालन करें तो अवश्य ही उत्तम पुत्र प्राप्त होगा. स्त्री को हमेशा पुरूष के बायें तरफ़ सोना चाहिये. कुछ देर बांयी करवट लेटने से दायां स्वर और दाहिनी करवट लेटने से बांया स्वर चालू हो जाता है. इस स्थिति में जब पुरूष का दांया स्वर चलने लगे और स्त्री का बांया स्वर चलने लगे तब संभोग करना चाहिये. इस स्थिति में अगर गर्भादान हो गया तो अवश्य ही पुत्र उत्पन्न होगा. स्वर की जांच के लिये नथुनों पर अंगुली रखकर ज्ञात किया जा सकता है.

योग्य कन्या संतान की प्राप्ति के लिये स्त्री को हमेशा पुरूष के दाहिनी और सोना चाहिये. इस स्थिति मे स्त्री का दाहिना स्वर चलने लगेगा और स्त्री के बायीं तरफ़ लेटे पुरूष का बांया स्वर चलने लगेगा. इस स्थिति में अगर गर्भादान होता है तो निश्चित ही सुयोग्य और गुणवती कन्या संतान प्राप्त होगी.

मासिक धर्म शुरू होने के प्रथम चार दिवसों में संभोग से पुरूष रुग्णता को प्राप्त होता है. पांचवी रात्रि में संभोग से कन्या, छठी रात्रि में पुत्र, सातवी रात्रि में बंध्या पुत्री, आठवीं रात्रि के संभोग से ऐश्वर्यशाली पुत्र, नवी रात्रि में ऐश्वर्यशालिनी पुत्री, दसवीं रात्रि के संभोग से अति श्रेष्ठ पुत्र, ग्यारहवीं रात्रि के संभोग से सुंदर पर संदिग्ध आचरण वाली कन्या, बारहवीं रात्रि से श्रेष्ठ और गुणवान पुत्र, तेरहवी रात्रि में चिंतावर्धक कन्या एवम चौदहवीं रात्रि के संभोग से सदगुणी और बलवान पुत्र की प्राप्ति होती है. पंद्रहवीं रात्रि के संभोग से लक्ष्मी स्वरूपा पुत्री और सोलहवीं रात्रि के संभोग से गर्भाधान होने पर सर्वज्ञ पुत्र संतान की प्राप्ति होती है. इसके बाद की अक्सर संतान नही होती. अत: इच्छित संतान प्राप्ति के लिए उपरोक्त तथ्यों का ध्यान रखते हुये बताये गये स्वरों के अनुसार कर्म करना चाहिये.

जिन लोगों को सुंदर, दिर्घायु और स्वस्थ संतान चाहिये उन्हें गडांत, ग्रहण, सूर्योदय एवम सूर्यास्त्काल, निधन नक्षत्र, रिक्ता तिथि, दिवाकाल, भद्रा, पर्वकाल, अमावस्या, श्राद्ध के दिन, गंड तिथि, गंड नक्षत्र तथा आंठवें चंद्रमा का त्याग करके शुभ मुहुर्त में संभोग करना चाहिये.

पुरातन काल में दंपति आज की तरह हर रात्रि को नही मिलते थे सिर्फ़ उनका सहवास सिर्फ़ संतान प्राप्ति के उद्देष्य के लिये होता था. शुभ दिन और शुभ मुहुर्त के संभोग से वो योग्य संतान प्राप्त कर लेते थे. वर्तमान काल में युवा पीढी की उदंडता, अनुशासनहीनता, लडाई झाग्डे की प्रवॄति वाले उग्रवादी होने के लिये वास्तव में उनके माता पिता ही जिम्मेदार हैं क्योंकि वे किसी भी दिन, किसी भी समय संभोग करके गर्भ धारण करके संतान पैदा कर लेते हैं.

ऋषि कश्यप और उनकी स्त्री दिति इसके ज्वलंत उदाहरण हैं एक दिवस महर्षि कश्यप संध्या समय नदी तट पर संध्या हेतु जा रहे थे कि उसी समय उनकी पत्नि दिति ने कामाभिभूत होकर महर्षि कश्यप को सहवास के लिये निमंत्रण देकर उन्हें ऐसा करने के लिये बाध्य कर दिया. इस संध्या काल के गर्भाधान की वजह से ही दिति ने हिरणकश्यप जैसी राक्षस संतान पैदा की.

दिति की बहिन एवम महर्षि कश्यप की द्वितीय पत्नि अदिति धार्मिक नियमों का पालन करते हुये केवल रात्रि के शुभ मुहुर्तों में ही संभोग रत होते थे अत: अदिति की गर्भ से सारी देवता संताने ही पैदा हुई.

गर्भाधान के समय केंद्र एवम त्रिकोण मे शुभ ग्रह हों, तीसरे छठे ग्यारहवें घरों में पाप ग्रह हों, लग्न पर मंगल गुरू इत्यादि शुभ कारक ग्रहों की दॄष्टि हो, विषम चंद्रमा नवमांश कुंडली में हो और मासिक धर्म से सम रात्रि हो, उस समय सात्विक विचार पूर्वक योग्य पुत्र की कामना से यदि रति की जाये तो निश्चित ही योग्य पुत्र की प्राप्ति होती है. इस समय में पुरूष का दायां एवम स्त्री का बांया स्वर ही चलना चाहिये, यह अत्यंत अनुभूत और अचूक उपाय है जो खाली नही जाता. इसमे ध्यान देने वाली बात यह है कि पुरुष का जब दाहिना स्वर चलता है तब उसका दाहिना अंडकोशः अधिक मात्रा में शुक्राणुओं का विसर्जन करता है जिससे कि अधिक मात्रा में पुल्लिग शुक्राणु निकलते हैं. अत: पुत्र ही उत्पन्न होता है.

यदि पति पत्नि संतान प्राप्ति के इच्छुक ना हों और सहवास करना ही चाहें तो मासिक धर्म के अठारहवें दिन से पुन: मासिक धर्म आने तक के समय में सहवास कर सकते हैं, इस काल में गर्भादान की संभावना नही के बराबर होती है.

तीन चार मास का गर्भ हो जाने के पश्चात दंपति को सहवास नही करना चाहिये. अगर इसके बाद भी संभोग रत होते हैं तो भावी संतान अपंग और रोगी पैदा होने का खतरा बना रहता है. इस काल के बाद माता को पवित्र और सुख शांति के साथ देव आराधन और वीरोचित साहित्य के पठन पाठन में मन लगाना चाहिये. इसका गर्भस्थ शिशि पर अत्यंत प्रभावकारी असर पदता है, अभिमन्यु का उदाहरण सभी जानते हैं.

अगर दंपति की जन्मकुंडली के दोषों से संतान प्राप्त होने में दिक्कत आरही हो तो बाधा दूर करने के लिये संतान गोपाल के सवा लाख जप करने चाहिये. यदि संतान मे सूर्य बाधा कारक बन रहा हो तो हरिवंश पुराण का श्रवण करें, राहु बाधक हो तो क्न्यादान से, केतु बाधक हो तो गोदान से, शनि या अमंगल बाधक बन रहे हों तो रूद्राभिषेक से संतान प्राप्ति में आने वाली बाधायें दूर की जा सकती हैं.

जन्म कुंडली में सुखी दांपत्य जीवन की स्थितियां

विवाह के बाद कुछ समय तो गॄहस्थी की गाडी बढिया चलती रहती है किंतु कुछ समय के बाद ही पति पत्नि में कलह झगडे, अनबन शुरू होकर जीवन नारकीय बन जाता है. इन स्थितियों के लिये भी जन्मकुंडली में मौजूद कुछ योगायोग जिम्मेदार होते हैं. अत: विवाह तय करने के पहले कुंडली मिलान के समय ही इन योगायोगों पर अवश्य ही दॄष्टिपात कर लेना चाहिये.

सातवें भाव में खुद सप्तमेश स्वग्रही हो एवम उसके साथ किसी पाप ग्रह की युति अथवा दॄष्टि भी नही होनी चाहिये. लेकिन स्वग्रही सप्तमेश पर शनि मंगल या राहु में से किन्ही भी दो ग्रहों की संपूर्ण दॄष्टि संबंध या युति है तो इस स्थिति में दापंत्य सुख अति अल्प हो जायेगा. इस स्थिति के कारण सप्तम भाव एवम सप्तमेश दोनों ही पाप प्रभाव में आकर कमजोर हो जायेंगे.

यदि शुक्र के साथ लग्नेश, चतुर्थेश, नवमेश, दशमेश अथवा पंचमेश की युति हो तो दांपत्य सुख यानि यौन सुख में वॄद्धि होती है वहीं षष्ठेश, अष्टमेश अथवा द्वादशेश के साथ संबंध होने पर दांपत्य सुख में न्यूनता आती है.

यदि सप्तम अधिपति पर शुभ ग्रहों की दॄष्टि हो, सप्तमाधिपति से केंद्र में शुक्र संबंध बना रहा हो, चंद्र एवम शुक्र पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो दांपत्य जीवन अत्यंत सुखी और प्रेम पूर्ण होता है.

लग्नेश सप्तम भाव में विराजित हो और उस पर चतुर्थेश की शुभ दॄष्टि हो, एवम अन्य शुभ ग्रह भी सप्तम भाव में हों तो ऐसे जातक को अत्यंत सुंदर सुशील और गुणवान पत्नि मिलती है जिसके साथ उसका आजीवन सुंदर और सुखद दांपत्य जीवन व्यतीत होता है. (यह योग कन्या लग्न में घटित नही होगा)

सप्तमेश की केंद्र त्रिकोण में या एकादश भाव में स्थित हो तो ऐसे जोडों में परस्पर अत्यंत स्नेह रहता है. सप्तमेश एवम शुक्र दोनों उच्च राशि में, स्वराशि में हों और उन पर पाप प्रभाव ना हो तो दांपत्य जीवन अत्यंत सुखद होता है.

सप्तमेश बलवान होकर लग्नस्थ या सप्तमस्थ हो एवम शुक्र और चतुर्थेश भी साथ हों तो पति पत्नि अत्यंत प्रेम पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं.

सप्तमेश एवम शुक्र एक दूसरे की राशि में केंद्र या त्रिकोण में बैठे हों और उन पर द्वितीयेश और चतुर्थेश का दॄष्टि संबंध हो तो निहायत ही सुखद दांपत्य सुख प्राप्त होता है.

पुरूष की कुंडली में स्त्री सुख का कारक शुक्र होता है उसी तरह स्त्री की कुंडली में पति सुख का कारक ग्रह वॄहस्पति होता है. स्त्री की कुंडली में बलवान सप्तमेश होकर वॄहस्पति सप्तम भाव को देख रहा हो तो ऐसी स्त्री को अत्यंत उत्तम पति सुख प्राप्त होता है.

जिस स्त्री के द्वितीय, सप्तम, द्वादश भावों के अधिपति केंद्र या त्रिकोण में होकर वॄहस्पति से देखे जाते हों, सप्तमेश से द्वितीय, षष्ठ और एकादश स्थानों में सौम्य ग्रह बैठे हों, ऐसी स्त्री अत्यंत सुखी और पुत्रवान होकर सुखोपभोग करने वाली होती है.

पुरूष का सप्तमेश जिस राशि में बैठा हो वही राशि स्त्री की हो तो पति पत्नि में बहुत गहरा प्रेम रहता है.

वर कन्या का एक ही गण हो तथा वर्ग मैत्री भी हो तो उनमें असीम प्रम होता है. दोनों की एक ही राशि हो या राशि स्वामियों में मित्रता हो तो भी जीवन में प्रेम बना रहता है.

अगर वर या कन्या के सप्तम भाव में मंगल और शुक्र बैठे हों उनमे कामवासना का आवेग ज्यादा होगा अत: ऐसे वर कन्या के लिये ऐसे ही ग्रह स्थिति वाले जीवन साथी का चुनाव करना चाहिये. अगर ऐसे ग्रहों से युक्त वर कन्या का विवाह ऐसे जातक से कर दिया जाये जिसके सप्तम भाव में बुध या गुरू बैठे हों , जो कि काम वासना को कम करने वाले ग्रह हैं, तो इस स्थिति में इस युगल यौन विषय्क असमानता आ जाती है जिसके फ़लस्वरूप इनके जीवन में झगडे झंझट शुरू होकर दांपत्य सुख खत्म सा हो जाता है.

दांपत्य सुख का संबंध पति पत्नि दोनों से होता है. एक कुंडली में दंपत्य सुख हो और दूसरे की में नही हो तो उस अवस्था में भी दांपत्य सुख नही मिल पाता, अत: सगाई पूर्व माता पिता को निम्न स्थितियों पर ध्यान देते हुये किसी सुयोग्य और विद्वान ज्योतिषी से दोनों की जन्म कुंडलियों में स्वास्थ्य, आयु, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, संतान पक्ष इत्यादि का समुचित अध्ययन करवा लेना चाहिये सिर्फ़ गुण मिलान से कुछ नही होता.

वर वधु की आयु का अधिक अंतर भी नही होना चाहिये, दोनों का शारीरिक ढांचा यानि लंबाई उंचाई, मोटाई, सुंदरता में भी साम्य देख लेना चाहिये. अक्सर कई धनी माता पिता अपनी काली कलूटी कन्या का विवाह धन का लालच देकर किसी सुंदर और गौरवर्ण लडके से कर देते हैं जो बाद में जाकर कलह का कारण बनता है. इसी तरह कई धनी पालक अपने काले कलूटे और कम पढे लिखे पुत्र के लिये सुंदर और गौरवर्ण पढी लिखी युवती से कर देते हैं और युवती के मां बाप भी यह सोचकर कि लडकी उंचे और धनी परिवार में जा रही है, उसकी शादी कर देते हैं, इस तरह के जोडे भी अक्सर दांपत्य सुख में कमी का शिकार होते हैं.

कुल मिलाकर शिक्षा, खानदान, खान पान परंपरा इत्यादि की साम्यता देखकर ही निर्णय लेना चाहिये. इस सबके अलावा वर कन्या के जन्म लग्न एवन जन्म राशि के तत्वों पर भी दॄष्टिपात कर लेना चाहिये. दोनों के लग्न, राशि के एक ही ततव हों और परस्पर मित्र भाव वाले हों तो भी पति पत्नि का जीवन प्रेम मय बना रहता है. इस मामले में विपरीत तत्वों का होना पति पत्नि में शत्रुता पैदा करता है यानि पति अग्नि तत्व का हो और पत्नि जल तत्व की हो तो गॄहस्थी की गाडी बहुत कष्ट दायक हो जाती है. कुल मिलाकर एक ही तत्व वाले जोडे अधिक सुखद दांपत्य जीवन जीते हैं..

प्रेम विवाह की सफ़लता या असफ़लता के लिये जिम्मेदार स्थितियां

जैसे--जैसे बच्चों की आयु बढने लगती है, त्यों-त्यों माता-पिता को उनकी विवाह-शादी की चिन्ता सताने लगती है. भारतीय समाज में अधिकाशंत: निर्धारित शादियां करने की ही परम्परा रही है. हालाँकि, पुरातन काल में विवाह की कईं प्रकार की परंपरायें प्रचलन में थी. इच्छित विवाह एवं स्वयंबर तथा गंधर्व विवाह भी हुआ करते थे. कुछ राजा लोग अपनी पुत्री की शादी के लिये किसी बात का प्रण ले लेते थे और उस प्रण को पूरा करने वाले का वरण कन्या को चाहे अनचाहे करना ही पडता था. भगवान राम एवं सीता जी का विवाह भी इसी परंपरा मे हुआ था.

आज के समय में जब लडका और लडकी दोनों ही पढे लिखें हैं और समान रूप से कामकाजी हो गये हैं. घर, शहर और विदेश में अकेले रह कर काम कर रहे हैं तभी से प्रेम विवाह का चलन बढा है. लेकिन यह बात भी उतनी ही सत्य है कि आज के समय में पालक प्रेम विवाह को अच्छी नजर से नही देखते हैं और यथा संभव प्रेम विवाह में रोडे ही अटकाने की कोशीश करते हैं. लेकिन अगर जन्मकुंडली में प्रेम विवाह के योग बने हुये हैं तो वो रोकने की लाख कोशीश करले उसको रोक नही पाते. इसी वजह से कई जोडे घर से भागकर मंदिर में शादी कर लेते हैं.

यहां एक बात कहना उचित होगा कि अगर जन्मकुंडली में प्रेम विवाह का योग परिलक्षित हो रहा हो तो पालको को चाहिये कि शांत दिमाग से काम लेकर किसी योग्य ज्योतिषी से बच्चों की कुंडली का अध्ययन अवश्य करवा लेना चाहिये जिससे यह पता लगाया जा सके कि ये प्रेम संबंध सफ़ल होकर सुख शांति बनी रहेगी या ये प्रेम संबंध सिर्फ़ अनैतिक संबंधों तक ही सीमित होकर कलह का कारण बनेंगे.

प्रेम संबंध और प्रेम विवाह के लिये लडका लडकी की कुंडली के पंचम भाव का भलिभांति अध्ययन कर लेना चाहिये. प्रेम का संबंध पंचम भाव से होकर जीवन साथी का भाव सप्तम होता है. विवाह का कारक शुक्र होकर भोग विलास का दायित्व भी शुक्र का है. इन भावों के अध्ययन से ही स्पष्ट होगा कि ये प्रेमी जोदा सुखपूर्वक जीवन यापन करेगा या एक दुखी जीवन का निर्माण करेगा.

कुंडली के पंचम भाव से स्वाभाविक प्रेम और संतान के बारे में जाना जाता है. सप्तम भाव से इसके तादाम्य के अनुसार ही प्रेम विवाह की सफ़लता असफ़लता का निर्धारण किया जाता है. पंचमेश और सप्तमेश का कुंडली में एक दूसरे से त्रिकोण या केंद्र में होना अति आवश्यक है. यदि ये ग्रह लग्न, नवम भाव, दशम भाव या एकादश भाव में युति करें अथवा केंद्र त्रिकोण में हों तो प्रेम विवाह की प्रबल संभावना बनती है. पंचमेश सप्तमेश और नवमेश और इन भावों की स्थिति मजबूत हो तो एक सफ़ल और सुखद वैवाहिक जीवन व्यतीत होता है. इसके विपरीत पंचमेश, नवमेश और सप्तमेश का संअबंध किसी भी तरह कुंडली के छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो प्रेम विवाह में विफ़लता एवम निराशा ही उठानी पडती है.

निम्न लिखित योग कुंडली में अगर विद्यमान हों तो प्रेम विवाह की संभावना प्रबल होती है:----

१. युति अथवा दॄष्टि द्वारा पंचम, नवम और सप्तम भावो ए भावेशों का संबध बन रहा हो.

२. सांतवे भाव में शनि और केतु की उपस्थिति भी प्रेम विवाह में अति सहायक होती है.

३. जब नवम और सप्तम भाव और उनके अधिपति और गुरू अशुभ भावों से घिरे हों.

४. सप्तमेश एवम शुक्र यदि शनि या राहु से युति करें या उनसे दॄष्ट हों तो भी प्रेम विवाह हो सकता है.

जब द्वादश भाव चर राशि का नही हो एवम उसका संबंध लग्नेश और सप्तमेश के साथ हो जातक घर की परंपाराओं के विपरीत अंतर्जातीय विवाह करता है.

५. लग्न और सप्तम के अधिपति आटवें या पांचवे भाव मे हो अथवा लग्नेश पंचमेश सातवें हों, पंचमेश एवम सप्तमेश लग्न में हों तो मर्यादाओं को लांघते हुये जातक बेधडक प्रेम विवाह करता है.

६. लग्न में चंद्र हो या कर्क राशि हो, अथवा मंगल हो या उसकी राशि हो तो निश्चित तौर पर अंतर्जातीय प्रेम विवाह होता है.
७. पंचमेश, लग्नेश और सप्तमेश का संबंध द्वादश भाव से बने तब भी प्रेम विवाह होता है.

जन्मकुंडली का विस्तॄत अध्ययन करके प्रेम विवाह की सफ़लता या असफ़लता का निश्चित तौर पर पता लगाया जा सकता है.

श्राद्ध करना धर्म है !!!

हमारे धर्म शास्त्रों में श्राद्ध के सम्बन्ध में इतने विस्तार से विचार किया गया है कि इसके सामने अन्य समस्त धार्मिक कार्य गौण लगने लगते हैं. श्राद्ध के छोटे से छोटे कार्य के सम्बन्ध में इतनी सूक्ष्म मीमाँसा और समीक्षा की गई है कि विचारशील व्यक्ति तो सहज में ही चमत्कृत हो उठते हैं. वास्तव में मृत माता-पिता एवं अन्य पूर्वजों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किया गया दान ही "श्राद्ध" है. हम यूँ भी कह सकते हैं कि श्रद्धापूर्वक किए जाने के कारण ही इसे श्राद्ध कहा गया है. श्राद्ध से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं पर आईये डालते हैं एक नजर धार्मिक दृष्टिकोण से............!!!
"श्राद्धकल्पता" अनुसार पितरों के उद्देश्य से श्रद्धा एवं आस्तिकतापूर्वक पदार्थ-त्याग का दूसरा नाम ही श्राद्ध है.
पित्रयुद्देश्येन श्रद्दया तयक्तस्य द्रव्यस्य
ब्राह्मणैर्यत्सीकरणं तच्छ्राद्धम !!
"श्राद्धविवेक" का कहना है कि वेदोक्त पात्रालम्भनपूर्वक पित्रादिकों के उद्देश्य से द्रव्यत्यागात्मक कर्म ही श्राद्ध है----श्राद्धं नाम वेदबोधित पात्रालम्भनपूर्वक प्रमीत पित्रादिदेवतोद्देश्यको द्रव्यत्यागविशेष: !
" गौडीय श्राद्धप्रकाश" अनुसार भी देश-काल-पात्र पितरों के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक हविष्याण,तिल,कुशा तथा जल आदि का त्याग-दान श्राद्ध है---देशकालपात्रेषु पित्रयुद्देश्येन हविस्तिलदर्भमन्त्र श्रद्धादिभिर्दानं श्राद्दम !
श्राद्ध न करने से हानि:--
जो लोग यह समझकर कि पितर हैं ही कहाँ---श्राद्ध नही करता, पितर-लोग लाचार होकर उसका रक्तपान करते हैं. जो उचित तिथि पर जल से अथवा भोजा इत्यादि से भी श्राद्ध नहीं करता,पितर उसे श्राप देकर अपने लोक को लौट जाते हैं. मार्कण्डेयपुराण का कहना है कि जिस कुल में श्राद्ध नहीं होता,वहाँ वीर,निरोगी,शतायु पुरूष नहीं जन्म लेते. जहाँ श्राद्ध नहीं होता, वहाँ वास्तविक कल्याण नहीं होता.
श्राद्ध में महत्व के साथ पदार्थ :--
गंगाजल, दूध,शहद, कुशा,सूती कपडा, दौहित्र और तिल--ये कुल सात श्राद्ध में बहुत ही महत्व के प्रयोजनीय हैं.
इनके अतिरिक्त श्राद्धकर्म में तुलसी की भी विशाल महिमा कही गई है. तुलसी की गंध से पितृगण प्रसन्न होकर, पूर्णत: तृप्ति को प्राप्त कर इस लोक से विष्णुलोक की ओर गमन कर जाते हैं.
श्राद्धकर्ता के लिए वर्ज्य सात वस्तुएं:--
पान खाना, उपवास, स्त्रीसंभोग,औषध,दातुन करना और पराये अन्न का सेवन करना---ये सात वस्तुएं श्राद्धकर्ता के लिए वर्जित हैं. यदि भूल से इनमें से किसी वस्तु का प्रयोग हो भी जाए तो प्रायश्चित कर 108 बार गायत्री मन्त्र का जाप अवश्य कर लेना चाहिए.
इसके अतिरिक्त श्राद्ध में ताँबें के बर्तनों का बहुत महत्व है. लोहे/स्टील के बर्तनों का श्राद्ध में कदापि उपयोग नहीं करना चाहिए. रसोई बनाते अर्थात खाना बनाने में भी इनका उपयोग नहीं किया जाता. केवल काटने या धोने इत्यादि के लिए इन्हे प्रयोग में लाया जा सकता है.
श्राद्ध में प्रशस्त अन्न:- 
फलादि, काले उडद,तिल,जौं,श्यामक चावल, गेहूँ, दूध के बने सभी पदार्थ, शहद, चीनी,कपूर, आँवला, अंगूर, कटहल, गुड, नारियल, नींबूं, अखरोट इत्यादि पदार्थ प्रशस्त कहे गये हैं. अत: इनका अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए.
श्राद्ध में निषिद्ध अन्न:-
चना, मसूर, सत्तू, मूली, जीरा, कचनार, काला नमक, लौकी, बडी सरसों, सरसों का शाक, खीरा, और कोई भी बासी, गला-सडा,कच्चा, अपवित्र फल या अन्न निषिद्ध है. 
श्राद्ध में पाठय प्रसंग :-
श्राद्धकाल में पुरूषसूक्त,श्रीसूक्त,सौपर्णाख्यान, श्रीभागवतगीता, ऎन्द्रसूक्त,सोमसूक्त,सप्तार्चिस्तव,मधुमती अथवा अन्य किसी पुराणादि का पठन-श्रवण अवश्य करना चाहिए.

अन्त में एक बात, कि श्राद्ध में भोजन के समय मौन रहना चाहिए. माँगने या प्रतिषेद करने का इशारा हाथ से करना चाहिए. खाना खाते हुए पंडित जी से यह नहीं पूछना चाहिए कि "खाना कैसा है ?", अन्यथा पितर निराश होकर लौट जाते हैं.

मीन लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 330 डिग्री से 360 डिग्री तक के भाग को मीन राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता हुआ दिखाई देता है , उस जातक का लग्‍न मीन माना जाता है. मीन लग्‍न में मन का स्‍वामी चंद्रमा पंचम भाव का स्‍वामी होकर माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.


सूर्य षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी , वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल द्वितीय और नवम भाव का स्‍वामी होता है द्वितीय भाव का अधिपति होने के कारण जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्‍व करता है जबकि नवमेश होने के कारण यह धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शुक्र तृतीय और अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है. तॄतीयेश होने के कारण यह जातक के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि संदर्भों का प्रतिनिधि बनता है जबकि अष्टमेश होने के कारण यह व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बुध चतुर्थ भाव का स्‍वामी होकर जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि बनता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बृहस्‍पति दशम भाव का स्‍वामी होकर जातक के राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बॄहस्पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि एकादश और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है. एकादश भाव का स्वामी होने के कारण यह जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि बनता है जबकि द्वादशेश होने के नाते यह निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण.इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु को मीन लग्न में सप्तमेश होने का दायित्व मिलता है जिसकी वजह से यह जातक लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होत है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु को मीन लग्न में लग्नेश होने का दायित्व मिलता है इस वजह से यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व को प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

कुंभ लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 300 डिग्री से 330 डिग्री तक के भाग को कुंभ राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज पर उदित होता हुआ दिखाई देता है, उस जातक का लग्‍न कुंभ माना जाता है. कुंभ लग्‍न की कुंडली में मन का स्‍वामी चंद्र षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है. यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

समस्त विश्व को प्रकाशित करने वाला सूर्य सप्‍तम भाव का स्‍वामी होकर जातक के लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल तृतीय और दशम भाव का स्‍वामी होता है. तॄतीयेश होने के कारण नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है जबकि दशमेश होने के कारण यह जातक के राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शुक्र चतुर्थ और नवम भाव का स्‍वामी होता है. चतुर्थेश होने के कारण यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का कारक होता है. एवम नवमेश होने के कारण धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. कुंभ लग्न में एक केंद्र और एक त्रिकोण का स्वामी होकर शुक्र अतीव शुभ और राजयोग कारक ग्रह बन जाता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में अतयंत शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से न्य़ून शुभ फ़लों के साथ अधिक अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बुध पंचम भाव का स्‍वामी होकर जातक के बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बृहस्‍पति एकादश भाव का स्‍वामी होकर जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि प्रथम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है. लग्नेश होने के नाते यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व इत्यादि का प्रतिनिधि होता है जबकि द्वादशेश होने के कारण यह जातक के निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु अष्टम भाव का स्वामी होकर यहां अष्टमेश होता है जिसके कारण उसे जातक के व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व मिलता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु द्वितीय भाव का स्वामी होकर यहां जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.