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साप्ताहिक भविष्यफ़ल : - 23 जनवरी 2012 से 29 जनवरी 2012 तक

साप्ताहिक भविष्यफ़ल : - 23 जनवरी 2012 से 29 जनवरी 2012 तक



(चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ)
सप्ताह की शुरूआत में मन प्रसन्न रहेगा, कारोबार में उन्नति और जीवन साथी से मधुर संबंध, नई कार्य योजनाएं यथार्थ रूप लेंगी. कारोबार एवम आय में वृद्धि होगी. सप्ताह के मध्य में कार्य की अधिकता की वजह से स्वभाव में चिडचिडापन रहेगा, लेकिन धन आगमन सुगमता पूर्वक होगा सभी कार्य यथा समय पूर्ण हो सकेंगे. सप्ताहांत में भ्रमण मनोरंजन एवम भोगविलास की सामग्री पर खर्च होगा, मन आनंदित रहेगा.


( इ, उ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो)
सप्ताह की शुरूआत में आपकी पूर्व मे बनाई योजनाओं को आप मूर्त रूप देने की कोशीश करेंगे, इसमें भाग्य का साथ भी मिल पायेगा. खर्चों की अधिकता रहेगी, किसी कार्ययोजना के लिये ॠण आदि प्राप्त करने में सफ़लता मुश्किल से मिलेगी. सप्ताह मध्य में सभी कार्य योजनाएं के मूर्त रूप लेने की संभावना है, कार्य की अधिकता रहेगी, शांति पूर्वक कार्य करें. सप्तांत में आपकी मेहनत का परिणाम मिलेगा.


(क, की, कू, घ, ड, छ, के, को, ह)
आप जिन योजनाओं पर कार्य कर रहे हैं उनमे आपकी मेहनत और श्रम चालू रहेगा. सप्ताह के मध्य में आपको लगेगा कि अब कार्य पूरा हुआ..अब कार्य पूरा हुआ, किंतु ग्रहों की स्थिति अनुसार आपके श्रम का कोई विशेष फ़ल प्राप्त नही हो पायेगा. आप अपनी योजनाओं को गुप्त रूप से कार्यान्वित करते रहें, अभी तो सप्ताह अंत तक आपका आय व्यय बराबर रहेगा. पारिवारिक सहयोग आपको मिलता रहेगा

(हि, हु, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो)
सप्ताह की शुरूआत में भाग्य और धर्म का सुंदर सहयोग मिलेगा, अगर आप कुंआरे हैं तो विवाह प्रस्ताव प्राप्त होने की प्रबल संभावना हैं जो कि सफ़ल भी हो सकेंगे. सप्ताह मध्य में जरा सा मन खिन्न रहेगा, बिना किसी कारण ही मन मे निरूत्साह हावी रहेगा. सप्ताहांत में आपके सारे बचे हुये काम बन जायेंगे. धनागमन होगा एवम जीवन साथी और मित्र जनों का सहयोग प्राप्त होगा.


(मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे)
सप्ताह की शुरूआत में शरीर में आलस्य की अधिकता रहेगी, अगर आप किसी पुराने रोग के मरीज हैं तो वह रोग फ़िर से उभर आने की संभावना रहेगी. सप्ताह मध्य में भाग्य वश धन का आगमन अच्छा होगा, कार्य व्यवसाय गति पकडेगा किंतु सप्ताहांत में कार्य का बोझ और कार्य पूर्ण ना होने की वजह से मन में खिन्नता बनी रहेगी.


(टो, पा, पी, पू, प, ण, ठ, पे, पो)
सप्ताह की शुरूआत में मन नेक कार्यों में लगा रहेगा, किसी धार्मिक कार्य में धन खर्च होगा, बुद्धि में स्थिरता रहेगी. सप्ताह मध्य में भाग्य से आय अच्छी होगी जिससे मन प्रफ़ुल्लित रहेगा. इसके बावजूद भी शरीर में कुछ रुग्णता महसूस होगी जो कि सप्ताहांत तक दूर होकर प्रसन्नता में बदल जायेगी.


(रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते)
कार्य व्यवसाय के दबाव और उसमें सफ़लता के साथ ही यह सप्ताह शुरू हो रहा है. किंतु अपनी कार्य योजनाओं और व्यापारिक रणनीति को गोपनीय रखें वर्ना विरोधियों से नुक्सान उठाना पड सकता है. कुल मिलाकर इस सप्ताह आप अपने वाक चातुर्य से सभी कार्य सुधार लेंगे और इच्छित सफ़लता प्राप्त करेंगे. परिवार जनों के लिये समय नही निकाल पायेंगे, जिसकी वजह से उनकी नाराजी उठानी पडेगी एवम कार्य की अधिकता की वजह से थकान महसूस करेंगे.


(तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू)
सप्ताह की शुरूआत में परिश्रम और कर्मठता से आपको कार्यों में सफ़लता प्राप्त होगी. सप्ताह के मध्य में कार्य की अधिकता की वजह से आपका समय परेशानी भरा व्यय्तीत होगा जिससे मन में उदासी रहेगी, अनावश्यक यात्राओं को टालें. जरूरी ही हो तो मुंह मीठा करके जल पीकर, उसके बाद ही यात्रा को निकले. जो स्वर चल रहा हो उसी पैर को पहले आगे बढाते हुये यात्रा को जाये. सप्ताहांत में सभी परेशानियां समाप्त होकर हंसी खुशी का वातावरण बनेगा.


(ये, यो, भा, भी, भू, ध, फ़, ढ, भे)
सप्ताह की शुरूआत अत्यधिक सुंदर हो रही है. आप अगर संतान की इच्छा रखते हैं तो इस समय आपको परिवार में बढोत्तरी का शुभ समाचार सुनने को मिलेगा. धन की आवक भी अच्छी रहेगी, अटका हुआ धन भी प्रात होगा. सप्ताह मध्य में आप किन्ही विशेष गुप्त योजनाओं को मूर्त रूप देने में व्यस्त रहेंगे. और सप्ताहांत तक आप इच्छित कार्य पूर्ण करने में जुटे रह कर सफ़लता प्राप्त कर पायेंगे और इच्छित लाभ भी प्राप्त करने में सफ़ल रहेंगे.


(भो, जा, जी, जू, जे, जो, खा, खी, खू, खे, खो, गा, गी)
भाग्य और कर्म का अदभुत समन्वय इस सप्ताह की शुरूआत में रहेगा, इच्छित कार्य पूरे होंगे, जीवन साथी से थोडा मनमुटाव रहने की संभावना है. सप्ताह मध्य में भी आपका कार्य व्यवसाय व्यवस्थित चलेगा परंतु अकारण मन में विषाद रहेगा. सप्ताहांत कार्य व्यव्साय की उलझनों में ही व्यतीत हो जायेगा जिससे थोडी थकान महसूस करेंगे. खान पान व्यवस्थित रखें.


(गु, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, द)
सप्ताह की शुरूआत में मन में बेचैनी और शरीर में रूग्णता व्याप्त रहेगी. धन भी अटकेगा, आमदनी में भी परेशानी रहेगी. खर्चों की तनिक अधिकता रहेगी. सप्ताह मध्य में हंसी खुशी का वातावरण बन जायेगा, शरीर में चुस्ती फ़ुर्ती बहाल होगी और सप्ताहांत में धनागमन होकर कुटुंबी जनों का सहयोग और सुख प्राप्त होगा


(दी, दू, ठ, झ, दे, दो, चा, ची)
सप्ताह की शुरूआत में ही कार्य भार की अधिकता रहेगी, आप ऐसे कार्यों में व्यस्त रहेंगे जो अनावश्यक होंगे और उनकी वजह से आप तनाव ग्रस्त रहेंगे. सप्ताह मध्य में खर्चों की अधिकता की वजह से मन में उदासीनता रहेगी. बुद्धि भ्रम की स्थिति बनेगी. सप्ताहांत में आप तंदरूस्ती प्राप्त करेंगे और आपका अभी तक का अव्यवस्थित कार्य व्यवस्थित होगा. गैर जरूरी कार्यों से बचें.
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मासिक भविष्यफ़ल जनवरी 2012

मासिक भविष्यफ़ल : - 14 January 2012 से 13 Feb. 2012 तक

उपरोक्त अवधि में सूर्य 14 जनवरी तक धनु राशि में रहेंगे तत्पश्चात मकर राशि में रहेंगे, मंगल सिंह राशि में, बुध वृष्चिक राशि मे, 4 जनवरी से धनु राशि में और 25 जनवरी के पश्चात मकर राशि में, गुरू मेष राशि में, शुक्र मकर राशि में 9जनवरी तक तत्पश्चात कुंभ राशि में भ्रमण करेंगे, शनि तुला राशि में रहेंगे, राहु वृष्चिक राशि में और केतु वृष राशि में भ्रमण करेंगे. ग्रहों की उपरोक्त स्थिति अनुसार विभिन्न राशि धारियों का 14 January 2012 To 13 Feb. 2012 का भविष्य फ़ल निम्नानुसार रहेगा.


(चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ)
इस अवधि में धन, संपति का बहुत उत्तम सुख मिलेगा. धन संपति के रूके कार्य सुलझेंगे. वायु विकार जन्य रोगों से किंचित पीडा रहेगी, अधिक उम्र वाले जातक इन रोगों से सावधान रहें एवम अपने चिकित्सक की सलाह अनुसार चले. इस अवधि में संतान से संबंधित चिंता बनी रहेगी. कारोबार व्यवसाय बढिया चलेगा. मासांत में खर्चों की अधिकता रहेगी. जनवरी 19, 20, 28, 29 एवम फ़रवरी की 6, 7, 8 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


( इ, उ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो)
इस अवधि में स्वास्थ्य सुख अच्छा रहेगा. धन का आगमन अच्छा रहेगा यानि रुका हुआ धन प्राप्त होगा. संतान सुख अच्छा रहेगा, संतानों के बारे में सुखद खबर मिलेंगी. ऊंचे और रसूखदार लोगों का साथ व सहयोग प्राप्त होगा. मित्रों से अच्छा तालमेल बना रहेगा, वक्त जरूरत मित्र आपकी मदद को तैयार मिलेंगे. इस अवधि में जीवन साथी के प्रति चिंता बनी रहेगी. कार्य व्यवसाय में परिवर्तन के योग दिखाई दे रहे हैं. जनवरी 21, 22, 30, 31 एवम फ़रवरी की 1, 9, एवम 10 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(क, की, कू, घ, ड, छ, के, को, ह)
इस अवधि में स्वास्थ्य की परेशानी रहेगी. धन का लाभ अच्छा रहेगा, व्यापार व्यवसाय सुगमतापूर्वक चलता रहेगा. आनंद दायक भ्रमण मनोरंजनपूर्ण यात्राएं होंगी, जीवन साथी का सुंदर सहयोग और सुख उपलब्ध होगा लेकिन अचानक घरेलू झगडे झंझट परेशानियां खडी होंगी जिनसे अचानक कष्ट बढेगा. जनवरी 14, 15, 23, 24 एवम फ़रवरी की 2, 3, 11, 12 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(हि, हु, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो)
इस अवधि में कारोबार, व्यापार व्यवसाय में किंचित गडबडी दिखाई दे रही है जिसकी वजह से आप परेशान रहेंगे. यात्राओं में भी कष्ट रहेगा. संतान की और से भी परेशानी परिलक्षित हो रही है, लेकिन जीवन साथी का सहयोग और सुख आपको प्राप्त होता रहेगा जिसकी वजह से आप इन परेशानियों से पार पाने में सफ़ल होंगे. आपके छिपे हुये पुराने शत्रु आपको परेशान कर सकते हैं और राज्य सरकार पक्ष की तरफ़ से भी आपको इस समयावधि में परेशानी खडी हो सकती है. जनवरी की 16, 17, 18, 25, 26, 27 एवम फ़रवरी की 4, 5 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे)
इस अवधि में आप पेट संबंधी बिमारियों से परेशान रह सकते हैं अत: खान पान का विशेष ख्याल रखें. मित्रों एवम संबंधियों से भी इस अवधि के दौरान आपको परेशानियां अनुभव होंगी, उनसे कोई विशेष सहयोग की अपेक्षा ना रखें. जीवन साथी से भी आपको तनाव एवं चिंता बनी रहेगी. कारोबार व्यापार व्यवसाय में रूकावट एवम परेशानियां खडी होंगी. आय से ज्यादा धन का व्यव होगा. जनवरी 19, 20, 28, 29 एवम फ़रवरी की 6, 7, 8 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(टो, पा, पी, पू, प, ण, ठ, पे, पो)
इस समयावधि में आप वायु जनित रोगों से पिडित रहेंगे, खान पान का विशेष ख्याल रखें एवम नियमित सैर को जायें. ग्रह योग धन हानि का संकेत दे रहे हैं. शत्रु पक्ष किंचित माह के पूर्वार्ध में आप पर हावी रहेगें. जीवन साथी का विशेष सुख और सहयोग प्राप्त होता रहेगा जिससे आप सभी परेशानियों से बाहर निकल कर माह के अंत में विशेष लाभान्वित होंगे एवम नये कारोबार की रूपरेखा एवम लाभ की और अग्रसर होंगे. जनवरी 21, 22, 30, 31 एवम फ़रवरी की 1, 9, एवम 10 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते)
इस अवधि में आप कफ़ जनित रोगों से पीडित रह सकते हैं. आंखों की पुरानी बीमारी से कष्ट उठाना पड सकता है. कुटुंबियों से धन संपदा के विवादों से भी झूजना पड सकता है. न्यायालयीन विवादों अनावश्यक धन हानि के योग दिखाई दे रहे हैं. यानि बीमारी और विवादों में व्यर्थ धन हानि होगी. संतान पक्ष की और से भी चिंतित रहेंगे लेकिन इस सबके बावजूद आपका कार्य व्यव्साय व्यवस्थित चलता रहेगा. जनवरी 14, 15, 23, 24 एवम फ़रवरी की 2, 3, 11, 12 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू)
इस अवधि में आपमें क्रोध की मात्रा बढी हुई रहेगी जिसकी वजह से आप नुक्सान उठायेंगे, अपने क्रोध को काबू में रखकर स्वविवेक से कार्य करें. मित्रों एवम संबंधियों से भी कष्ट प्राप्ति के योग बन रहे हैं. राज सत्ता पक्ष से हानि उठानी पड सकती है. विपरीत लिंगी से लाभ प्राप्त होगा. कारोबार व्यवसाय ठीक चलेगा. जनवरी की 16, 17, 18, 25, 26, 27 एवम फ़रवरी की 4, 5 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(ये, यो, भा, भी, भू, ध, फ़, ढ, भे)
इस अवधि में आप कफ़ एवम वायु विकार जैसे रोंगो से परेशान रहेंगे, खान पान एवम अपने चिकित्सक की सलाह का विशेष ध्यान रखें. इस अवधि में खर्चे बढे हुये रहेंगे, संतान पक्ष की और से चिंता लगी रहेगी, व्यापार व्यवसाय में भी रूकावट दिखाई दे रही है जिससे आपकी मानसिक चिंतायें बढी हुई रहेंगी. जनवरी 19, 20, 28, 29 एवम फ़रवरी की 6, 7, 8 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(भो, जा, जी, जू, जे, जो, खा, खी, खू, खे, खो, गा, गी)
इस अवधि में आप सर दर्द व पेट दर्द जैसी बीमारियों से परेशान रहेंगे. इस अवधि की यात्राएं भी कष्ट प्रद रहेंगी. शत्रु पक्ष आप पर हावी रहेगा लेकिन आपको इस अवधि में जीवन साथी का सुख व सहयोग भरपूर प्राप्त होगा जिससे आप मानसिक रूप से अच्छा महसूस करेंगे. कार्य व्यवसाय अच्छा रहेगा. जनवरी 21, 22, 30, 31 एवम फ़रवरी की 1, 9, एवम 10 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(गु, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, द)
इस अवधि में वाहन सावधानी से चलाएं, दुर्घटना का भय रहेगा. पेट से संबंधित रोग परेशान करेंगे. धन की आवक अच्छी रहेगी. मित्रों से मिलन होगा एवम उनका अच्छा सहयोग मिलेगा. जीवन साथी से किंचित वैचारिक मतभेद हो सकते हैं. व्यापार व्यवसाय कमजोर रहेगा. जनवरी 14, 15, 23, 24 एवम फ़रवरी की 2, 3, 11, 12 तारीख अशुभ रह सकती हैं.


(दी, दू, ठ, झ, दे, दो, चा, ची)
इस अवधि में आपकी सेहत अच्छी रहेगी पर ग्रह योग धन हानि का संकेत कर रहे हैं. खर्चों की अधिकता रहेगी. मित्रों और सगे संबंधियों से आपको मार्गदर्शन, सहयोग एवम मदद प्राप्त होगी. व्यापार व्यवसाय की नई योजनाएं बनेंगी, वर्तमान कार्य व्यवसाय यथावत व्यवस्थित चलता रहेगा. जनवरी की 16, 17, 18, 25, 26, 27 एवम फ़रवरी की 4, 5 तारीख अशुभ रह सकती हैं.

शिक्षा पूर्ण होगी अथवा अपूर्ण रहेगी?

बालक की शिक्षा कैसी होगी? यह विषय प्रत्येक माता पिता को चिंतित रखता है. और वैसे भी आज पालकों का जोर बच्चों को किसी भी प्रकार से उच्च शिक्षा दिला कर उनको स्थापित करना होता है. जन्मकुंडली द्वारा सहज रूप से यह पता लगाया जा सकता है कि जातक की शिक्षा दीक्षा कैसी होगी?

अगर जन्मकुंडली में पंचमेश उच्च का या स्वग्रही होकर केंद्रों अथवा त्रिकोणों में अवस्थित हो तो बहुत ही सुंदर विद्या योग बनता है. ऐसा जातक अल्प प्रयत्न से ही अच्छी शिक्षा हासिल कर लेता है. यह योग तभी बनेगा जब पंचम भाव में मेष, मिथुन, तुला या कुंभ राशि हो. इसका मतलब यह हुआ कि यह योग धनु, कुंभ, मेष, तुला एवम मिथुन लग्नों में अति प्रभवाशाली बनेगा. लग्न एवं पांचवे भाव में ये राशियां विद्या दायक होती हैं. ध्यान रहे सिंह लग्न में पंचम भाव में धनु राशि आयेगी जो अपवाद स्वरूप है. पंचम भाव में धनु राशि अपूर्ण विद्या की सूचक है.

मेष लग्न में अगर पंचम भाव में सूर्य स्वग्रही हो तो पूर्ण विद्या योग होगा. इस योग वाला जातक जिस भी क्षेत्र में विद्यारंभ करेग उसमें पूर्ण सफ़लता हासिल करता है. सूर्य ज्ञान और प्रकाश का दाता है. पंचम पर इसका प्रभाव जातक को विद्या, बुद्धि, धन एवम पुत्र प्रदान करने में पूर्ण सक्षम होता है.

इसी तरह कुछ विद्या में बाधक योग भी बनते हैं. वॄष, मकर, कन्या एवम सिंह लग्न में यही राशियां पंचम भाव में होगी तब यह योग घटित होगा. जनम्कुंडली अन्य कोई शुभ योग की न्यूनता हो तो ऐसे जातक के विद्याध्ययन में बहुत सी बाधायें आ खडी होती हैं. कुछ ऐसे हालात बन जाते हैं कि विद्या अध्ययन बीच मे छोडने की संभावना प्रबल होती है.

यदि पंचमेश पापग्र्हों के प्रभाव में हो और चठे आठवे या बारहवें भाव में स्थित हो तो यह अध्ययन को भंग करने वाला है. ऐसा जातक अपने शिक्षाकाल में एक दो बार फ़ेल अवश्य होता है. ऐसे जातक के अन्य ग्रह अगर शुभ प्रभाव में हों तो रूक रूक कर शिक्षा चलती रहती है परंतु जातक अपने लक्ष्य को हासिल करने में असफ़ल ही रहता है. यदि जनमकुंडली में ऐसे योग विद्यमान हों तो जातक को सरस्वती यंत्र की पूजा करे और पंचमेश का रत्न किसी योग्य दैवज्ञ की सलाह से धारण करें.

जन्म कुंडली में सुखी दांपत्य जीवन की स्थितियां

विवाह के बाद कुछ समय तो गॄहस्थी की गाडी बढिया चलती रहती है किंतु कुछ समय के बाद ही पति पत्नि में कलह झगडे, अनबन शुरू होकर जीवन नारकीय बन जाता है. इन स्थितियों के लिये भी जन्मकुंडली में मौजूद कुछ योगायोग जिम्मेदार होते हैं. अत: विवाह तय करने के पहले कुंडली मिलान के समय ही इन योगायोगों पर अवश्य ही दॄष्टिपात कर लेना चाहिये.

सातवें भाव में खुद सप्तमेश स्वग्रही हो एवम उसके साथ किसी पाप ग्रह की युति अथवा दॄष्टि भी नही होनी चाहिये. लेकिन स्वग्रही सप्तमेश पर शनि मंगल या राहु में से किन्ही भी दो ग्रहों की संपूर्ण दॄष्टि संबंध या युति है तो इस स्थिति में दापंत्य सुख अति अल्प हो जायेगा. इस स्थिति के कारण सप्तम भाव एवम सप्तमेश दोनों ही पाप प्रभाव में आकर कमजोर हो जायेंगे.

यदि शुक्र के साथ लग्नेश, चतुर्थेश, नवमेश, दशमेश अथवा पंचमेश की युति हो तो दांपत्य सुख यानि यौन सुख में वॄद्धि होती है वहीं षष्ठेश, अष्टमेश अथवा द्वादशेश के साथ संबंध होने पर दांपत्य सुख में न्यूनता आती है.

यदि सप्तम अधिपति पर शुभ ग्रहों की दॄष्टि हो, सप्तमाधिपति से केंद्र में शुक्र संबंध बना रहा हो, चंद्र एवम शुक्र पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो दांपत्य जीवन अत्यंत सुखी और प्रेम पूर्ण होता है.

लग्नेश सप्तम भाव में विराजित हो और उस पर चतुर्थेश की शुभ दॄष्टि हो, एवम अन्य शुभ ग्रह भी सप्तम भाव में हों तो ऐसे जातक को अत्यंत सुंदर सुशील और गुणवान पत्नि मिलती है जिसके साथ उसका आजीवन सुंदर और सुखद दांपत्य जीवन व्यतीत होता है. (यह योग कन्या लग्न में घटित नही होगा)

सप्तमेश की केंद्र त्रिकोण में या एकादश भाव में स्थित हो तो ऐसे जोडों में परस्पर अत्यंत स्नेह रहता है. सप्तमेश एवम शुक्र दोनों उच्च राशि में, स्वराशि में हों और उन पर पाप प्रभाव ना हो तो दांपत्य जीवन अत्यंत सुखद होता है.

सप्तमेश बलवान होकर लग्नस्थ या सप्तमस्थ हो एवम शुक्र और चतुर्थेश भी साथ हों तो पति पत्नि अत्यंत प्रेम पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं.

सप्तमेश एवम शुक्र एक दूसरे की राशि में केंद्र या त्रिकोण में बैठे हों और उन पर द्वितीयेश और चतुर्थेश का दॄष्टि संबंध हो तो निहायत ही सुखद दांपत्य सुख प्राप्त होता है.

पुरूष की कुंडली में स्त्री सुख का कारक शुक्र होता है उसी तरह स्त्री की कुंडली में पति सुख का कारक ग्रह वॄहस्पति होता है. स्त्री की कुंडली में बलवान सप्तमेश होकर वॄहस्पति सप्तम भाव को देख रहा हो तो ऐसी स्त्री को अत्यंत उत्तम पति सुख प्राप्त होता है.

जिस स्त्री के द्वितीय, सप्तम, द्वादश भावों के अधिपति केंद्र या त्रिकोण में होकर वॄहस्पति से देखे जाते हों, सप्तमेश से द्वितीय, षष्ठ और एकादश स्थानों में सौम्य ग्रह बैठे हों, ऐसी स्त्री अत्यंत सुखी और पुत्रवान होकर सुखोपभोग करने वाली होती है.

पुरूष का सप्तमेश जिस राशि में बैठा हो वही राशि स्त्री की हो तो पति पत्नि में बहुत गहरा प्रेम रहता है.

वर कन्या का एक ही गण हो तथा वर्ग मैत्री भी हो तो उनमें असीम प्रम होता है. दोनों की एक ही राशि हो या राशि स्वामियों में मित्रता हो तो भी जीवन में प्रेम बना रहता है.

अगर वर या कन्या के सप्तम भाव में मंगल और शुक्र बैठे हों उनमे कामवासना का आवेग ज्यादा होगा अत: ऐसे वर कन्या के लिये ऐसे ही ग्रह स्थिति वाले जीवन साथी का चुनाव करना चाहिये. अगर ऐसे ग्रहों से युक्त वर कन्या का विवाह ऐसे जातक से कर दिया जाये जिसके सप्तम भाव में बुध या गुरू बैठे हों , जो कि काम वासना को कम करने वाले ग्रह हैं, तो इस स्थिति में इस युगल यौन विषय्क असमानता आ जाती है जिसके फ़लस्वरूप इनके जीवन में झगडे झंझट शुरू होकर दांपत्य सुख खत्म सा हो जाता है.

दांपत्य सुख का संबंध पति पत्नि दोनों से होता है. एक कुंडली में दंपत्य सुख हो और दूसरे की में नही हो तो उस अवस्था में भी दांपत्य सुख नही मिल पाता, अत: सगाई पूर्व माता पिता को निम्न स्थितियों पर ध्यान देते हुये किसी सुयोग्य और विद्वान ज्योतिषी से दोनों की जन्म कुंडलियों में स्वास्थ्य, आयु, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, संतान पक्ष इत्यादि का समुचित अध्ययन करवा लेना चाहिये सिर्फ़ गुण मिलान से कुछ नही होता.

वर वधु की आयु का अधिक अंतर भी नही होना चाहिये, दोनों का शारीरिक ढांचा यानि लंबाई उंचाई, मोटाई, सुंदरता में भी साम्य देख लेना चाहिये. अक्सर कई धनी माता पिता अपनी काली कलूटी कन्या का विवाह धन का लालच देकर किसी सुंदर और गौरवर्ण लडके से कर देते हैं जो बाद में जाकर कलह का कारण बनता है. इसी तरह कई धनी पालक अपने काले कलूटे और कम पढे लिखे पुत्र के लिये सुंदर और गौरवर्ण पढी लिखी युवती से कर देते हैं और युवती के मां बाप भी यह सोचकर कि लडकी उंचे और धनी परिवार में जा रही है, उसकी शादी कर देते हैं, इस तरह के जोडे भी अक्सर दांपत्य सुख में कमी का शिकार होते हैं.

कुल मिलाकर शिक्षा, खानदान, खान पान परंपरा इत्यादि की साम्यता देखकर ही निर्णय लेना चाहिये. इस सबके अलावा वर कन्या के जन्म लग्न एवन जन्म राशि के तत्वों पर भी दॄष्टिपात कर लेना चाहिये. दोनों के लग्न, राशि के एक ही ततव हों और परस्पर मित्र भाव वाले हों तो भी पति पत्नि का जीवन प्रेम मय बना रहता है. इस मामले में विपरीत तत्वों का होना पति पत्नि में शत्रुता पैदा करता है यानि पति अग्नि तत्व का हो और पत्नि जल तत्व की हो तो गॄहस्थी की गाडी बहुत कष्ट दायक हो जाती है. कुल मिलाकर एक ही तत्व वाले जोडे अधिक सुखद दांपत्य जीवन जीते हैं..

प्रेम विवाह की सफ़लता या असफ़लता के लिये जिम्मेदार स्थितियां

जैसे--जैसे बच्चों की आयु बढने लगती है, त्यों-त्यों माता-पिता को उनकी विवाह-शादी की चिन्ता सताने लगती है. भारतीय समाज में अधिकाशंत: निर्धारित शादियां करने की ही परम्परा रही है. हालाँकि, पुरातन काल में विवाह की कईं प्रकार की परंपरायें प्रचलन में थी. इच्छित विवाह एवं स्वयंबर तथा गंधर्व विवाह भी हुआ करते थे. कुछ राजा लोग अपनी पुत्री की शादी के लिये किसी बात का प्रण ले लेते थे और उस प्रण को पूरा करने वाले का वरण कन्या को चाहे अनचाहे करना ही पडता था. भगवान राम एवं सीता जी का विवाह भी इसी परंपरा मे हुआ था.

आज के समय में जब लडका और लडकी दोनों ही पढे लिखें हैं और समान रूप से कामकाजी हो गये हैं. घर, शहर और विदेश में अकेले रह कर काम कर रहे हैं तभी से प्रेम विवाह का चलन बढा है. लेकिन यह बात भी उतनी ही सत्य है कि आज के समय में पालक प्रेम विवाह को अच्छी नजर से नही देखते हैं और यथा संभव प्रेम विवाह में रोडे ही अटकाने की कोशीश करते हैं. लेकिन अगर जन्मकुंडली में प्रेम विवाह के योग बने हुये हैं तो वो रोकने की लाख कोशीश करले उसको रोक नही पाते. इसी वजह से कई जोडे घर से भागकर मंदिर में शादी कर लेते हैं.

यहां एक बात कहना उचित होगा कि अगर जन्मकुंडली में प्रेम विवाह का योग परिलक्षित हो रहा हो तो पालको को चाहिये कि शांत दिमाग से काम लेकर किसी योग्य ज्योतिषी से बच्चों की कुंडली का अध्ययन अवश्य करवा लेना चाहिये जिससे यह पता लगाया जा सके कि ये प्रेम संबंध सफ़ल होकर सुख शांति बनी रहेगी या ये प्रेम संबंध सिर्फ़ अनैतिक संबंधों तक ही सीमित होकर कलह का कारण बनेंगे.

प्रेम संबंध और प्रेम विवाह के लिये लडका लडकी की कुंडली के पंचम भाव का भलिभांति अध्ययन कर लेना चाहिये. प्रेम का संबंध पंचम भाव से होकर जीवन साथी का भाव सप्तम होता है. विवाह का कारक शुक्र होकर भोग विलास का दायित्व भी शुक्र का है. इन भावों के अध्ययन से ही स्पष्ट होगा कि ये प्रेमी जोदा सुखपूर्वक जीवन यापन करेगा या एक दुखी जीवन का निर्माण करेगा.

कुंडली के पंचम भाव से स्वाभाविक प्रेम और संतान के बारे में जाना जाता है. सप्तम भाव से इसके तादाम्य के अनुसार ही प्रेम विवाह की सफ़लता असफ़लता का निर्धारण किया जाता है. पंचमेश और सप्तमेश का कुंडली में एक दूसरे से त्रिकोण या केंद्र में होना अति आवश्यक है. यदि ये ग्रह लग्न, नवम भाव, दशम भाव या एकादश भाव में युति करें अथवा केंद्र त्रिकोण में हों तो प्रेम विवाह की प्रबल संभावना बनती है. पंचमेश सप्तमेश और नवमेश और इन भावों की स्थिति मजबूत हो तो एक सफ़ल और सुखद वैवाहिक जीवन व्यतीत होता है. इसके विपरीत पंचमेश, नवमेश और सप्तमेश का संअबंध किसी भी तरह कुंडली के छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो प्रेम विवाह में विफ़लता एवम निराशा ही उठानी पडती है.

निम्न लिखित योग कुंडली में अगर विद्यमान हों तो प्रेम विवाह की संभावना प्रबल होती है:----

१. युति अथवा दॄष्टि द्वारा पंचम, नवम और सप्तम भावो ए भावेशों का संबध बन रहा हो.

२. सांतवे भाव में शनि और केतु की उपस्थिति भी प्रेम विवाह में अति सहायक होती है.

३. जब नवम और सप्तम भाव और उनके अधिपति और गुरू अशुभ भावों से घिरे हों.

४. सप्तमेश एवम शुक्र यदि शनि या राहु से युति करें या उनसे दॄष्ट हों तो भी प्रेम विवाह हो सकता है.

जब द्वादश भाव चर राशि का नही हो एवम उसका संबंध लग्नेश और सप्तमेश के साथ हो जातक घर की परंपाराओं के विपरीत अंतर्जातीय विवाह करता है.

५. लग्न और सप्तम के अधिपति आटवें या पांचवे भाव मे हो अथवा लग्नेश पंचमेश सातवें हों, पंचमेश एवम सप्तमेश लग्न में हों तो मर्यादाओं को लांघते हुये जातक बेधडक प्रेम विवाह करता है.

६. लग्न में चंद्र हो या कर्क राशि हो, अथवा मंगल हो या उसकी राशि हो तो निश्चित तौर पर अंतर्जातीय प्रेम विवाह होता है.
७. पंचमेश, लग्नेश और सप्तमेश का संबंध द्वादश भाव से बने तब भी प्रेम विवाह होता है.

जन्मकुंडली का विस्तॄत अध्ययन करके प्रेम विवाह की सफ़लता या असफ़लता का निश्चित तौर पर पता लगाया जा सकता है.

विवाह कब होगा ?

वर्तमान युग में पढाई लिखाई और सेटल होने तक शादी नही करने के चलन की वजह से शादी ज्यादा उम्र में होने लगी है. ऐसे में पालको का चिंतित होना स्वाभाविक है. जन्मकुंडली में कुछ योग ऐसे होते हैं जिनके फ़लिते होने के समय में विवाह आसानी से हो जाता है.

इसके लिये सातवां भाव, सप्तमेश व शुक्र से संबन्ध बनाने वाले ग्रहों को देखना चाहिये. जन्म कुण्डली में जो भी ग्रह अशुभ या पापी ग्रह इन ग्रहों से युति या अन्य प्रकार के संबंधों द्वारा इन पर प्रभाव डालता है असल में वही ग्रह विवाह में विलम्ब का कारण बन जाता है.

विवाह के कारक भाव सप्तम, सप्तमेश व शुक्र पर शुभ ग्रहों का असर जितना ज्यादा होगा, उतना ही अच्छा रहता है. एवम अशुभ ग्रहों का प्रभाव ना होना भी विवाह का समय पर संपन्न होने के लिये जरूरी रहता है. क्योकि अशुभ एवम पापी ग्रह जब भी शादी के कारक भावों अथवा कारक ग्रहों को प्रभावित करते है तो विवाह में अनावश्यक देरी होती है. जन्म कुण्डली के अध्ययन पश्चात जब यह तय हो जाये कि शादी की उम्र या वर्ष कौन सा है तब उसके बाद विवाह के कारक ग्रह शुक्र और विवाह के खास (main) ग्रह की दशा अंतर्दशा में विवाह संपन्न होने की संभावनाएं बढ जाती है.


कौन सी दशा- अन्तर्दशाओं में विवाह होगा :-

जिस समय में कुण्डली के योग विवाह की संभावनाएं बना रहे हों, उस समय में जातक की ग्रह दशा में सप्तमेश का संबन्ध शुक्र (Venus) से हो तों इस समयावधि में विवाह संपन्न होता है. एवम जब भी सप्तमेश और द्वितीयेश का ग्रह दशा/अंतर्दशाओं में संबंध बन रहा हो उस समयावधि में भी विवाह होने के प्रबल योग होते है.

ग्रह दशाओं में जब भी सप्तमेश व नवमेश का आपस में योग बन रहा हो और ये दोनों जन्म कुण्डली में पंचमेश से भी संबन्ध बनाते हों तो इस समय में प्रेम विवाह होने की संभावनाएं बलवती हो जाती है.

सातवें भाव में जो ग्रह स्थित होते हैं उनका संबन्ध अगर सप्तमेश या शुक्र से बन रहा हो, उन सभी ग्रहों की दशा - अन्तर्दशा में विवाह होने की प्रबल संभावनाएं होती हैं.

सप्तम भावगत ग्रह, सप्तमेश जब शुभ बलि ग्रह होकर शुभ भाव में विराजित हों तो जातक का विवाह संबन्धित ग्रह की दशा की शुरूआत की अवधि में होने की प्रबल संभावना होती.

शुक्र, सप्तम भावगत ग्रह या सप्तमेश जब बलि शुभ ग्रह होकर अशुभ भाव अथवा अशुभ ग्रह की राशि में होने पर अपनी दशा/अन्तर्दशा के बीच वाले समय में विवाह के योग बना देता है..
जब विवाह कारक ग्रह शुक्र नैसर्गिक रुप से शुभ हों, तो गोचर में गुरू अथवा शनि से योग करने पर अपनी दशा/अन्तर्दशाओं में विवाह होने का योग बनाता है.

जन्म कुण्डली में शुक्र जिस ग्रह के नक्षत्र में स्थित हों, उस ग्रह की दशा/अंतर्दशा की अवधि में विवाह होने की प्रबल संभावनाएं होती है.

शनि की साढे साती एवम अढैया


साढेसाती क्या है ?
सढेसाती वह समय है, जब जीवनकाल में जन्मराशि अर्थात चन्द्रराशि से शनि 12वें स्थान पर आता है. शनि एक राशि में लगभग अढाई वर्ष रहता है. जब शनि 12वें स्थान पर आता है तो साढेसाती आरम्भ होती है और जब जन्म अर्थात चन्द्रराशि से दूसरे स्थान से निकलता है तो यह समाप्त होती है. तीन राशियों में शनि का कुल समय साढे 7 वर्ष बनता है, इसलिए इसे साढेसाती कहा जाता है. शनि समस्त 12 राशियों के चक्र को 30 वर्ष की अवधि में पूर्ण करता है. इस तरह किसी भी व्यक्ति के जीवन में साढेसाती अधिकतम कुल तीन बार ही आ सकती है.

साढेसाती का प्रभाव एवं फल
जब भी कोई ज्योतिषी व्यक्ति को यह बताता है कि उसकी साढेसाती आरम्भ हो गई है तो साधारण व्यक्ति का मनोबल यह सुनते ही गिर जाता है. वह तुरन्त सोचने लगता है कि अब उसपर दु:खों, मुसीबतों तथा कठिनाईयों का पहाड टूट पडेगा, क्योंकि साढेसाती सम्बन्धी साधारण लोगों के मन में कुछ इसी प्रकार की गलत धारणा, शंका एवं भय पाया जाता है. जिसका मुख्य कारण अधकचरे ज्योतिषियों द्वारा लोगों के मन में साढेसाती सम्बन्धी अशुभ प्रभावों की बडी ही भयानक तस्वीर निर्मित कर दी गई है. ताकि जहाँ ओर साढेसाती की आड लेकर अपनी ज्योतिषीय अज्ञानता पर पर्दा डाला जा सके और दूसरे इसके जरिये साधारण जनता के भय का दोहन भी किया जाता रहे. यही कारण है कि जब कोई आम व्यक्ति किसी कष्ट, परेशानी, संकट में फंस जाता है तो वो यही समझने लगता है कि उसकी साढेसाती आरम्भ हो गई है. अब चाहे वो हुई हो या नहीं. चाहे उसके पीछे उसका अपना ही कोई कार्मिक दोष अथवा जन्मकुंडली में प्रतिकूल ग्रहदशा ही कारण क्यों न हो, लेकिन उसके मन में यही विचार आता है कि जरूर उसे शनि की साढेसाती लग गई है. यह साढेसाती के नाम पर फैलाये गये भ्रम और भय का ही परिणाम है. पंडितों द्वारा साढेसाती का हौव्वा दिखलाकर तरह-तरह के दान-पुण्य एवं उपाय बतला अथवा करवा दिए जाते हैं, जिसके कि बेचारा एक आम व्यक्ति ओर भी अधिक चक्रव्यूह में फँस जाता है.

यद्यपि, साढेसाती के कुछ समय में, कुछेक जातकों पर कुप्रभाव होते हैं, जैसे किसी भीषण शारीरिक व्याधि का होना, माता-पिता अथवा जीवनसाथी से मतभेद, रोजगार में नुक्सान, उन्नति में बाधा अथवा अन्य किसी प्रकार की चिन्ता, हानि, परेशानी आदि-------परन्तु जितना इसका दु:ष्प्रभाव होता नहीं, उससे कहीं अधिक लोगों के मन में इसका भय पैदा कर दिया गया है. अत: साढेसाती आरम्भ होने पर किसी प्रकार के भय की कोई आवश्यकता नहीं बल्कि इस अवधि में स्वयं को समझने एवं आत्मबल को सशक्त बनाने का सुअवसर समझना चाहिए तथा इसके शुभ प्रभावों के सम्बन्ध में ही विचार करना चाहिए. यह सदैव स्मरण रखने की आवश्यकता है कि जन्मकुंडली में जब कोई ग्रह बुरे स्थान पर आता है तो कोई न कोई शुभ ग्रह भी बचाव हेतु शुभ स्थान पर आ विराजमान होता है. तभी तो कहा गया है कि मारने वाले से बचाने वाला सदैव बलवान होता है. इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ही शनि की साढेसाती के शुभ/अशुभ प्रभाव बारे विचार करना चाहिए....
अलग अलग राशियों पर पडने वाला शनि की साढेसाती का प्रभाव

जन्म राशि


साढेसाती का प्रभाव

मेषमध्य के अढाई वर्ष अशुभ
वृषआरम्भिक अढाई वर्ष अशुभ
मिथुनअन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
कर्कअन्तिम 5 वर्ष अशुभ
सिँहप्रथम 5 वर्ष अशुभ
कन्याआरम्भिक अढाई वर्ष अशुभ
तुलाअन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
वृश्चिकअन्तिम 5 वर्ष अशुभ
धनुप्रारम्भिक 5 वर्ष अशुभ
मकरअन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
कुम्भअन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
मीनअन्तिम अढाई वर्ष अशुभ

कालसर्प योग से मुक्ति के सहज उपाय

यह तो सर्वविदित ही है कि जन्मकुंडली में कालसर्प योग के कारण इन्सन को जीवन में अनेक प्रकार की बाधाओं, हानि-परेशानी, दिक्कतों का सामना करना पडता है. जैसे, विवाह, सन्तान में विलम्ब, विद्याभ्यास में विक्षेप, दाम्पत्य जीवन में असंतोष, मानसिक अशांति, भ्रम एवं दुविधापूर्ण अनिश्चयात्मक स्थिति, स्वास्थय हानि, धनाभाव एवं प्रगति में रूकावट आदि इन सब कष्टों, परेशानियों से मुक्ति हेतु 'कालसर्प योग' की श्रद्धा-भक्तिपूर्वक विधिवत शान्ति करानी अति आवश्यक हो जाती है. इस योग की शान्ति के पश्चात ही व्यक्ति जीवन में पगे-पगे उत्पन होने वाली विषम परिस्थितियों से मुक्त होकर पूर्ण आनन्दमय सुखी जीवन का उपभोग कर सकता है.

किन्तु 'कालसर्प शान्ति अनुष्ठान' अपने आप में एक जटिल एवं महंगी प्रक्रिया है, जिसे कष्टों-परेशानियों में घिरे एक आम मध्यमवर्गीय परिवार के व्यक्ति द्वारा सम्पन्न करवा पाना भी थोडा मुश्किल हो जाता है. अब व्यक्ति या तो जीवनभर इस योग के दुष्प्रभावों को झेलता रहे या फिर अपने परिवार का पेट काटकर अथवा किसी से उधार पकडकर इस महंगें अनुष्ठान को सम्पन्न कराये. उस पर से इस बात की भी कोई गारंटी भी नहीं कि जिस ब्राह्मण के द्वारा वो शान्ति अनुष्ठान सम्पन्न करवाने जा रहा है, वो उसे पूर्ण विधि विधानपूर्वक कर भी पाता है या नहीं. क्योंकि ये तो ब्राह्मण की अपनी योग्यता पर निर्भर करता है कि वो इस गूढ शान्ति कर्म का कितना ज्ञान रखता है.

इसलिए हम कालसर्प योग शान्ति विधान के अतिरिक्त आपको कुछ सर्वसुलभ साधारण उपायों की जानकारी दे रहे हैं, जिन्हे समय-समय पर करते रहने से आप इस योग के दुष्प्रभावों से निजात पा सकते हैं----

* काले पत्थर की नाग देवता की एक प्रतिमा बनवा कर उसकी किसी मन्दिर में प्रतिष्ठा करवा दें.
* कार्तिक या चैत्रमास में सर्पबलि कराने से भी कालसर्प योग-दोष का निवारण हो जाता है.
* ताँबा धातु की एक सर्पमूर्ति बनवाकर अपने घर के पूजास्थल में स्थापित करें. एक वर्ष तक नित्य उसका पूजन करने के बाद उसे किसी नदी/तालाब इत्यादि में प्रवाहित कर दें.
* श्रावण कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि अर्थात नागपंचमी को उपवास रखें. उस दिन सर्पाकार सब्जियाँ खुद न खाकर, न अपने हाथों काटकर बल्कि उनका किसी भिक्षुक को दान करें.
* प्रत्येक मास के ज्येष्ठ सोमवार( सक्रान्ति के बाद आने वाला प्रथम सोमवार) के दिन शिवलिंग पर चाँदी के सर्पों की एक जोडी चढाते रहें.

वैदिक ज्योतिष और रोजगार की स्थिति

व्यक्ति को जीवन में रोजगार, व्यवसाय, पद प्राप्ति, नौकरी आदि के कौन से अवसर प्राप्त होंगे अथवा जातक की आर्थिक स्थिति कैसी रहेगी, इसके संबंध में अपने पाठकों को यहाँ विस्तार पूर्वक जानकारी प्रदान की जा रही है. यहां कुछ मूल सिद्धांतो, ग्रहों के सांमंजस्य से बनते रोजगार एवम व्यवसायों, पद प्राप्ति व नौकरी प्राप्ति से संबंधित समस्याओं पर प्रकाश डाला जा रहा है.

१. व्यक्ति को सरकारी सेवा/ नौकरी/रोजगार/व्यापार अथवा कोई पद प्राप्त होगा, जन्मकुंडली के प्रथम, द्वितीय, दशम एवम एकादश भावों में ग्रहों की स्थिति एवम इन भावों के स्वामी ग्रहों की स्थिति एवम इन सब पर पडते अन्य ग्रहों के प्रभाव पर निर्भर करती है. यदि दसवें भाव का स्वामी ग्रह किसी प्रकार भी पहले, दूसरे, छठें एवम ग्यारहवें भावों से संबंध रखता है तो व्यक्ति को हर हालत में अच्छे रोजगार की प्राप्ति होती है. तथा वो पूर्णतया लाभदायक सिद्ध होता है.

२. जन्मकुंडली में अधिकांश ग्रह जिन राशियों में हो उस राशि के तत्व गुण, स्वभाव एवम जिस जिस रोजगार को वह राशि सूचित करेती है, व्यक्ति का स्वाभाविक झुकाव उन्हीं कार्यों की तरफ़ होता है.

३. दो या दो से अधिक क्रूर ग्रहों के साथ केतु जब मेष, वृश्चिक, मकर या कुंभ में से किसी राशि में हो तो व्यक्ति को निराशा, असफ़लता, हार तथा बार बार नौकरी छूटने का काष्ट सहन करना पडता है.

४. दसवें भाव का स्वामी ग्रह शुभ स्थिति में नौवें या बारहवें भाव में वृहस्पति के साथ स्थित हो तो व्यक्ति विदेश में सफ़लता प्राप्त करता है.

५. जब जन्मकुंडली में शनि से आगे राहु ( जैसे जन्मकुंडली में शनि पांचवें भाव में और राहु सातवें भाव में हो) होता है और इन दोनों के मध्य अन्य कोई ग्रह ना हो तो व्यक्ति को पहले ३५ वर्ष तक की आयु में रोजगार संबम्धी कष्टों और परेशानियों का सामना करना पडता है. किसी भी काम में उसके पूरी तरह से पैर नही जम पाते.

६. जन्मकुंडली मे बुध ग्रह कहीं भी अकेला एवम अशुभ प्रभाव से दूर हो तो व्यापार में जातक अत्यधिक उन्नति प्राप्त करता है.

७. यदि अधिकांश ग्रह जनमकुंडली में तीसरे, दसवें, ग्यारहवें एवम बारहवें अथवा ७, ८, ९, १०. ११ एवम १२ वें भाव में बैठे हों और उन्हीं में सूर्य ग्रह भी सम्मिलित हो तो जातक के लिये नौकरी करना अथवा जनहित विभागों में कार्य करना ही लाभ प्रद रहता है. ऐसे व्यक्ति व्यापार में कभी प्रगति नही कर सकते.



10 वें भाव में स्थित ग्रह अथवा 10 वें भाव का स्वामी ग्रह


रोजगार/ व्यवसाय
सूर्य
बहुत आशाएं और उमंगे रखने वाला, जीवन में उच्च अधिकारी बनना चाहे, उच्च पद प्राप्ति, सरकारी सेवा सेवा नौकरी में रहना कठिन, डाक्टर, लीडर या प्रबंधकीय कार्यों में सलंग्न.
चंद्रमा
व्यापार, प्रोविजन स्टोर, कृषि, जलीय पदार्थ, पैतृक व्यवसाय में सलंग्न, रोजगार में परिवर्तन हेतुबार बार विचार उठते रहें.
मंगल
जोखिम के कार्य, पुलिस सेना, मैक्नीकल, सर्जन, धातु का कार्य, केमिस्ट, फ़ायर ब्रिगेड, होटल, ढाबा, अग्नि से संबंधित कार्य, डाईवर, मेकेनिक एवम इंजीनीयर आदि.
बुध
व्यापारी, ज्योतिषी, प्रिंटिंग कार्य, सेकेरेट्री, लेखक, अकाऊंटेंट, क्लर्क, आडीटर, एजेंट, पुस्तक विक्रेता, दलाल, अनुवादक, अध्यापक, सहायक, नर्सिंग, मुंशी, स्पीडपोस्ट, कोरियर इत्यादि का कार्य.
गुरू
शिक्षक, प्रकाशक, जज, न्यायाधीश, वकील, धार्मिक नेता, कथावाचक, पुरोहित, बैंक अधिकारी, मेनेजर, कपडा स्टोर, प्रोविजन स्टोर, सलाहकारिता आदि के कार्य
शुक्र
स्वास्थ्य विभाग, अस्पताल, मेटरनिटी होम, सोसायटी, रेस्टोरेंट, रेडीमेड वस्त्र, मनियारी की दुकान, फ़ोटोग्राफ़ी, गिफ़्ट आयटम, आभूषण एवम स्त्री से संबंधित विभाग/कार्यक्षेत्र
शनि
लेबर, लेबर विभाग, प्रबंधक या फ़िर अधिनस्थ सेवा में उच्चपद, अधिकारी, उद्योगपति, डाक्टर, रंग रसायन, पेट्रोकेमिकल इत्यादि.

सब्र संतोष, सुझबूझ रखे तो व्यवसाय ठीक चले, जल्दबाजी करे तो मुश्किले खडी हों और हानि हो, दुर्घटनाएं, निराशा एवम घाटे का मुंह देखना पडे.
राहु
डाक्टर, कसाई, सफ़ाई कर्मचारी, जेल विभाग, विद्युत विभाग, लेखक उच्चाधिकारी एवम उच्च पद प्राप्ति.

यदि सूझबूझ रखे और दिमाग से काम ले तो उन्नति करे नही तो अपना काम खुद ही बिगाडे.
केतु
गुप्त विद्या, तांत्रिक, ज्योतिषि, होम्योपैथी/आयुर्वेद/नेचरोपैथी का डाक्टर, ट्रेवल एजेंट, फ़र्नीचर का काम, पशुओं का व्यापारी.

जितना घूमने फ़िरने वाला हो उतना ही लाभ प्राप्त करे.

साढेसाती क्या है ?

साढेसाती क्या है ?
साढेसाती वह समय है, जब जीवनकाल में जन्मराशि अर्थात चन्द्रराशि से शनि 12वें स्थान पर आता है. शनि एक राशि में लगभग अढाई वर्ष रहता है. जब शनि 12वें स्थान पर आता है तो साढेसाती आरम्भ होती है और जब जन्म अर्थात चन्द्रराशि से दूसरे स्थान से निकलता है तो यह समाप्त होती है. तीन राशियों में शनि का कुल समय साढे 7 वर्ष बनता है, इसलिए इसे साढेसाती कहा जाता है. शनि समस्त 12 राशियों के चक्र को 30 वर्ष की अवधि में पूर्ण करता है. इस तरह किसी भी व्यक्ति के जीवन में साढेसाती अधिकतम कुल तीन बार ही आ सकती है.
साढेसाती का प्रभाव एवं फल
जब भी कोई ज्योतिषी व्यक्ति को यह बताता है कि उसकी साढेसाती आरम्भ हो गई है तो साधारण व्यक्ति का मनोबल यह सुनते ही गिर जाता है. वह तुरन्त सोचने लगता है कि अब उसपर दु:खों, मुसीबतों तथा कठिनाईयों का पहाड टूट पडेगा, क्योंकि साढेसाती सम्बन्धी साधारण लोगों के मन में कुछ इसी प्रकार की गलत धारणा, शंका एवं भय पाया जाता है. जिसका मुख्य कारण अधकचरे ज्योतिषियों द्वारा लोगों के मन में साढेसाती सम्बन्धी अशुभ प्रभावों की बडी ही भयानक तस्वीर निर्मित कर दी गई है. ताकि जहाँ ओर साढेसाती की आड लेकर अपनी ज्योतिषीय अज्ञानता पर पर्दा डाला जा सके और दूसरे इसके जरिये  साधारण जनता के भय का दोहन भी किया जाता रहे. यही कारण है कि जब कोई आम व्यक्ति किसी कष्ट, परेशानी, संकट में फंस जाता है तो वो यही समझने लगता है कि उसकी साढेसाती आरम्भ हो गई है. अब चाहे वो हुई हो या नहीं. चाहे उसके पीछे उसका अपना ही कोई कार्मिक दोष अथवा जन्मकुंडली में प्रतिकूल ग्रहदशा ही कारण क्यों न हो, लेकिन उसके मन में यही विचार आता है कि जरूर उसे शनि की साढेसाती लग गई है. यह साढेसाती के नाम पर फैलाये गये भ्रम और भय का ही परिणाम है. पंडितों द्वारा साढेसाती का हौव्वा दिखलाकर तरह-तरह के दान-पुण्य एवं उपाय बतला अथवा करवा दिए जाते हैं, जिसके कि बेचारा एक आम व्यक्ति ओर भी अधिक चक्रव्यूह में फँस जाता है.
यद्यपि, साढेसाती के कुछ समय में, कुछेक जातकों पर कुप्रभाव होते हैं, जैसे किसी भीषण शारीरिक व्याधि का होना, माता-पिता अथवा जीवनसाथी से मतभेद, रोजगार में नुक्सान, उन्नति में बाधा अथवा अन्य किसी प्रकार की चिन्ता, हानि, परेशानी आदि-------परन्तु जितना इसका दु:ष्प्रभाव होता नहीं, उससे कहीं अधिक लोगों के मन में इसका भय पैदा कर दिया गया है. अत: साढेसाती आरम्भ होने पर किसी प्रकार के भय की कोई आवश्यकता नहीं बल्कि इस अवधि में स्वयं को समझने एवं आत्मबल को सशक्त बनाने का सुअवसर समझना चाहिए तथा इसके शुभ प्रभावों के सम्बन्ध में ही विचार करना चाहिए. यह सदैव स्मरण रखने की आवश्यकता है कि जन्मकुंडली में जब कोई ग्रह बुरे स्थान पर आता है तो कोई न कोई शुभ ग्रह भी बचाव हेतु शुभ स्थान पर आ विराजमान होता है. तभी तो कहा गया है कि मारने वाले से बचाने वाला सदैव बलवान होता है. इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ही शनि की साढेसाती के शुभ/अशुभ प्रभाव बारे विचार करना चाहिए....
अलग अलग राशियों पर पडने वाला शनि की साढेसाती का प्रभाव

जन्म राशि


साढेसाती का प्रभाव

मेष मध्य के अढाई वर्ष अशुभ
वृष आरम्भिक अढाई वर्ष अशुभ
मिथुन अन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
कर्क अन्तिम 5 वर्ष अशुभ
सिँह प्रथम 5 वर्ष अशुभ
कन्या आरम्भिक अढाई वर्ष अशुभ
तुला अन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
वृश्चिक अन्तिम 5 वर्ष अशुभ
धनु प्रारम्भिक 5 वर्ष अशुभ
मकर अन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
कुम्भ अन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
मीन अन्तिम अढाई वर्ष अशुभ

तयशुदा शादी या प्रेमविवाह ( Love Marrige or Arrange Marrige)

जब भी लड़का और लड़की के बीच प्रेम हो जाता है तो प्रेम की अंतिम परिणीति वो विवाह के रूप में करना चाहते हैं. कुछ लोग इसमे कामयाब हो जाते हैं और कुछ नाकाम होते देखे गये हैं. अब जन्मकुंडली के वो कौन से योग हैं जिनके फ़लित होने से प्रेम विवाह में सफ़लता मिलती है.

अगर जन्म कुंडली में चतुर्थेश दशम भावगत हो तो जातक/जातिका अवश्य ही प्रेम विवाह करते हैं चाहे जितनी भी बाधायें, उन्हें आसानी से पार कर लेते हैं.

इसके अलावा ज्योतिष में "शुक्र ग्रह" को प्रेम का कारक ग्रह माना जाता है जन्म कुण्डली में शुक्र का सम्बन्ध लग्न, पंचम, सप्तम तथा एकादश भावों से होने पर जातक प्रेमी स्वभाव का होता है. पर स्वभाव का विवाह में परिणत होना तभी संभव होगा जब इनका सप्तम से बलि और शुभ संबंध बन रहा हो. क्योंकि इस योग में लग्न पंचम और नवम त्रिकोण का सप्तम भाव से संबंध बन जाता है जो सफ़ल और सुखी दांपत्य जीवन देने में सक्षम सिद्ध होता है.

पंचम भाव का स्वामी पंचमेश शुक्र अगर सप्तम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह की प्रबल संभावना बनती है. शुक्र अगर अपने घर में मौजूद हो तब भी प्रेम विवाह का योग बनता है. अगर ये स्थियां जन्मकुंडली में ना हों तब भी अनेक योग मौजूद होकर प्रेम विवाह में सहायक सिद्ध होते हैं जैसे अगर कुण्डली में प्रेम विवाह योग नहीं है और नवमांश कुण्डली में सप्तमेश और नवमेश की युति होती है तब तो प्रेम विवाह की संभावना सौ प्रतिशत हो जाती है. प्रेम का कारक बलि और शुभ शुक्र ग्रह लग्न में मौजूद हो और साथ में लग्नेश भी वही बैथे हों तो प्रेम विवाह निश्चित तौर पर होता ही है.

शनि और केतु जैसे पापी ग्रहों की सप्तम भाव में युति प्रेम विवाह के लिये अति शुभ संकेत होता है।

शिक्षा में बाधा और ज्योतिषीय परामर्श

प्राय: देखा गया है कि अच्छी भली चलते विद्याअध्ययन में रूकावट खडी हो जाती है. जन्मकुंडली में शिक्षा से संबंधित कुछ ऐसे बाधा योग उपस्थित हो जाते हैं कि जन्म कुंडली में उच्च शिक्षा का योग होने पर भी कभी-कभी जातक उच्च शिक्षा प्राप्त करना तो दूर बल्कि सामान्य शिक्षा भी प्राप्त नही कर पाता. शिक्षा प्राप्ति में कुछ रुकावट वाले वाले योगइस प्रकार होते हैं.

यदि पंचमेश 6, 8 या 12 वें भाव में स्थित हो या किसी अशुभ ग्रह के साथ स्थित हो या अशुभ ग्रह से देखा जाता हो, तो जातक को शिक्षा प्राप्त करने में बाधा आती हैं. ज्यादातर शिक्षा प्राप्ति के समय यदि राहु की महादशा आ जाये तो जातक का मन विध्याअध्ययन के प्रति ऊब जाता है और वो अन्य सांसारिक पचडों में उलझ जाता है. जातक की कुंडली में अगर गुरु या बुध 3, 6, 8 या 12 वें भावगत हो, शत्रुगृही हो, तो शिक्षा प्राप्ति में अनावश्यक अवरोध खडा हो जाता है.

जातक की जन्म कुंडली में द्वितीय भाव में अशुभ ग्रह स्थित हो अथवा अशुभ ग्रहो का संबंध किसी भी रूप में द्वितीय भाव को दूषित कर रहा हो , तो विद्या प्राप्ति में रूकावट समझना चाहिये. इसी समय में अगर जातक की दशा अंतर्दशाओं में द्वितियेश का अष्टम भाव से संबंध बन जाये तो निश्चय ही शिक्षा में बाधा आयेगी.

इसके अलावा जन्म कुंडली में शनि पंचम भाव अथवा अष्टम भावगत हो तो भी शिक्षा अपूर्ण ही रह जाती है. पंचम भाव, पंचमेश, तृतीयेश, या नवमेष पर अशुभ प्रभाव हो, तो विद्या अध्ययन में व्यवधान आ जाता हैं धन, विद्या, वाणी एवं स्वयं के कोष के लिये द्वितीय भाव से विचार करना चाहिए.

विद्या अध्ययन में व्यवधान दूर करने के उपाय:-

अगर ग्रहों की अशुभ स्थिति के कारण अथवा किन्ही तात्कालिक अंतर्दशाओं की वजह से विद्या प्राप्ति में अडचन खदी हो रही हो, बालक की स्मरण शक्ति कमजोर हो अथवा एकाग्रता की कमी हो रही हो, इस स्थिति में अभिमंत्रित किया हुआ सरस्वती कवच एवं यंत्र धारण करना चाहिये.

अभिमंत्रित तीन मुखी रूद्राक्ष गले में, काले धागे में धारण करवाने से मन विद्या अध्ययन में एकाग्र होता है.

जन्म कुंडली में उच्च शिक्षा का योग विद्यमान हो, इसके बावजूद भी शिक्षा में अशुभ ग्रहों की दशा/अंतर्दशाओं के कारण अडचन आरही हो तो संबंधित ग्रह की शांति हेतु उस ग्रह से संबंधित यंत्र/कवच जातक के बेडरूम में स्थापित करने से अत्यंत मंगल दायक फ़ल प्राप्त होते हैं, इसके अलावा किसी योग्य देवैज्ञ से सलाह लेकर भी उपाय किये जा सकते हैं.

कैसे हैं आपके शिक्षा योग?

जातक के शिक्षा योग कैसे हैं? यह एक सहज जिज्ञासा होती है जिसके बारे में जन्मकुंडली के चतुर्थ भाव के अधिपति की स्थिति से सहज ही जानकारी प्राप्त की जा सकती है. यानि चतुर्थेश कुंडली के जिस भाव में बैठा हो उसके अनुसार परिणाम प्राप्त होते हैं. नीचे हम सभी भावों की स्थिति के अनुसार फ़ल बता रहे हैं.

प्रथम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के प्रथम भाव में बैठा हो तो जातक जीवन में अच्छी विद्या प्राप्त करता है जो उसको लाभदायक रहती है.

द्वितीय भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के द्वितीय भाव में बैठा हो तो ऐसा जातक विद्या अवश्य प्राप्त करता है भले ही उसके पालकों की आर्थिक हैसियत उसे पढाने लायक ना हो तो भी.

तृतीय भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के तृतीय भाव में बैठा हो तो जातक की विद्या प्राप्त करने में उसकी माता की विशेष भूमिका होती है. माता की मेहनत से ऐसा जातक शिक्षा प्राप्त कर लेता है.

चतुर्त भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के चतुर्थ भाव में ही बैठा हो तो ऐसा जातक बहुत ही उत्तम विद्या प्राप्त करता है.

पंचम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के पंचम भाव में बैठा हो तो ऐसा जातक अनेक प्रकार की बाधाओं के साथ विद्या प्राप्त करता है और जातक अपने जीवन में ऐसी विद्या का कोई उपयोग नही कर पाता है.

षष्ठ भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के षष्ठ भाव में बैठा हो तो ऐसे जातक को विद्याध्ययन में बहुत अडेचने आती हैं परंतु उसे विद्या लाभकारी होती है.

सप्तम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के सप्तम भाव में बैठा हो तो और ऐसे जातक की विद्या २२ साल की उम्र के पहले पूर्ण हो जाती है और उससे जातक लाभ प्राप्त करता है. यदि २२ साल की उम्र के पहले विवाह हो जाये तो उसकी विद्या प्राप्ति में विघ्न उत्पन्न हो जाते हैं.

अष्टम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के अष्टम भाव में बैठा हो तो ऐसे जातक को मातृ सुख में कमी होती है और मातृ सुख के अभाव वश विद्या में न्युनता.

नवम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के नवम भाव में बैठा हो तो ऐसा जातक प्रचारक, आलोचक, एवम शिक्षक होता है चाहे पूरी विद्या प्राप्त की हो या नही.

दशम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के दशम भाव में बैठा हो तो ऐसे जातक को स्कूल जाने में डर लगता है और विद्या में कमी रहती है. ऐसा जातक अपने पिता का कार्य संभालता है.

एकादशम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के एकादश भाव में बैठा हो तो ऐसा जातक अनेक रूकावटों के साथ विद्या प्राप्त करता है.

द्वादश भाव - ऐसा जातक घर के बाहर रहकर विद्या प्राप्त करता है. ऐसा जातक पढे तो पूरा पढे वर्ना एकांत में बैठा विद्या प्राप्त करने के सपने लेने वाला होता है.

नक्षत्र पति और उसका प्रभाव

चन्द्रमा का एक राशिचक्र 27 नक्षत्रों में बंटा हुआ है, इस कारण से चन्द्रमा को अपनी कक्षा में परिभ्रमण करते समय प्रत्येक नक्षत्र में से गुजरना होता है. आपके जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में गुजर रहा होगा होगा, वही आपका जन्म नक्षत्र होगा. आपके वास्तविक जन्म नक्षत्र का चरण सहित निर्धारण करने के पश्चात आपके बारे में बिल्कुल सटीक भविष्य कथन किया जा सकता है. नक्षत्र पद्धति आधारित गणना से आप जीवन के सही अवसरों को सही समय पर पहचान सकते हैं. और इसी तरह आप अपने खराब और कष्टकारक समय को जान सकते हैं. और उसका उपाय भी कर सकते हैं. आपको एक बार आपके नक्षत्रपति की सही सही जानकारी और दिशा निर्धारण हो जाये तो जीवन अत्यंत सुगम हो जाता है. आप इसके लिये हमसे संपर्क कर सकते हैं और अपने संपूर्ण जीवन चक्र का सही दिशा निर्देश प्राप्त करें.

नीचे हम क्रमश नक्षत्र, उनके स्वामी, उनकी उच्च व नीच राशि की तालिका दे रहे हैं. जिससे आप सहज ही इसका पता लगा सकेंगे.

क्रम
नक्षत्र
स्वामी
उच्च राशि
नीच राशि
1
अश्विनी
केतु
धनु (क्ष*-शु* लग्न)
वृश्चिक (ब्रा*-वै* लग्न)
मिथुन (क्ष*-शु* लग्न)
वृष  (ब्रा*-वै* लग्न)
2
भरणी
    शुक्र
मीन
कन्या
3
कृतिका
सुर्य
मेष
तुला
4
रोहिणी
चंद्र
वृष
वृश्चिक
5
मृगशिरा
मंगल
मकर
कर्क
6
आद्रा
राहु
मिथुन (क्ष*-शु* लग्न)
वृष  (ब्रा*-वै* लग्न)
धनु (क्ष*-शु* लग्न)
वृश्चिक (ब्रा*-वै* लग्न)
7
पुनर्वसु
गुरु
कर्क
मकर
8
पुष्य
शनि
तुला
मेष
9
अश्लेषा
बुध
कन्या
मीन
10
मघा
केतु
धनु (क्ष*-शु* लग्न)
वृश्चिक (ब्रा*-वै* लग्न)
मिथुन (क्ष*-शु* लग्न)
वृष  (ब्रा*-वै* लग्न)
11
पूर्वाफ़ाल्गुनी
शुक्र
मीन
कन्या
12
उत्तराफ़ाल्गुनी
सूर्य
मेष
तुला
13
हस्त
चंद्र
वृष
वृश्चिक
14
चित्रा
मंगल
मकर
कर्क
15
स्वाति
राहु
मिथुन (क्ष*-शु* लग्न)
वृष  (ब्रा*-वै* लग्न)
धनु (क्ष*-शु* लग्न)
वृश्चिक (ब्रा*-वै* लग्न)
16
विशाखा
गुरू
कर्क
मकर
17
अनुराधा
शनि
तुला
मेष
18
ज्येष्ठा
बुध
कन्या
मीन
19
मूल
केतु
धनु (क्ष*-शु* लग्न)
वृश्चिक (ब्रा*-वै* लग्न)
मिथुन (क्ष*-शु* लग्न)
वृष  (ब्रा*-वै* लग्न)
20
पूर्वाषाढा
शुक्र
मीन
कन्या
21
उत्तराषाढा
सुर्य
मेष
तुला
22
श्रवण
चंद्र
वृष
वृश्चिक
23
धनिष्टा
मंगल
मकर
कर्क
24
शतभिषा
राहु
मिथुन (क्ष*-शु* लग्न)
वृष  (ब्रा*-वै* लग्न)
धनु (क्ष*-शु* लग्न)
वृश्चिक (ब्रा*-वै* लग्न)
25
पूर्वाभाद्रा
गुरू
कर्क
मकर
26
उत्तराभाद्रा
शनि
तुला
मेष
27
रेवती
बुध
कन्या
मीन
(क्ष* = क्षत्रिय लग्न, शु* = शुद्र लग्न, ब्रा* = ब्राम्हण लग्न, -वै* = वैष्य लग्न)
नक्षत्रपति की उच्च और नीच स्थिति, अपने भाव और उच्च भाव से दूरी, जन्मकुंडली की पूरी दिशा ही बदल देती है. अत: इसका निर्धारण बहुत ही योग्यता और कुशलता पूर्वक किया जाना चाहिये.

नक्षत्र




भारतीय वैदिक ज्योतिष में नक्षत्र सिद्धांत को प्रमुखता से स्थान दिया गया है. भविष्यकथन हेतु नक्षत्र पद्धति ज्योतिष की अन्य सभी प्रचलित पद्धतियों में सबसे सटीक व अचूक पद्धति है. चंद्रमा को अपनी कक्षा में भ्रमण करते हुये पृथ्वी की एक परिक्रमा करने में 27.3 अर्थात करीब सवा सत्ताईस दिन लगते हैं. चंद्रमा के 360 अंशों के इस परिभ्रमण पथ को ही 27 समान भागों में बांटा गया है, जिन्हे नक्षत्र कहा जाता है. और इन्हें ही पृथ्वी पर पाये जाने वाले विभिन्न पदार्थों, जीवों, प्राणियों की समानता के आधार पर एवं उनके तारामंडलों के गुण धर्म के आधार पर नामकरण किया गया है. हर एक नक्षत्र एक विशिष्ट तारों के समूह का प्रतिनिधित्व करता है. और हर नक्षत्र का विभाजन 4 चरणों में किया गया है. जातक का जन्म जिस नक्षत्र के जिस चरण में हुआ है, उसी के अनूरूप उसका नाम, व्यक्तित्व, जीवन-चरित्र और भविष्य तय होता है.
क्रमनक्षत्र नामवैदिक नामवेदांग ज्योतिष नामअंग्रेजी नाम
1अश्विनीअश्वयुजजौARIETES
2भरणीअपभरणीण्य:MUSCA
3कृतिकाकृतिकाकृALCYONE
4रोहिणीरोहिणीरोALDE BARAN
5मृगशिरामृगशीर्षमृORIONIS
6आद्राबाहूद्र्र्र्ORIONIS II
7पुनर्वसुपुनर्वसुसूGEMINORUM
8पुष्यतिष्यष्यCANCRI
9आश्लेषाअश्लेषाषाHYDRAE
10मघामघाधाREGULAS
11पूर्वाफाल्गुनीफल्गुनीग:LEONIS
12उत्तराफाल्गुनीउत्तराफाल्गुनीमाDENEBOLA
13हस्तहस्त्यCORVI
14चित्राचित्राचित्त्SPICA
15स्वातिनिष्टयास्वाARCTURUS
16विशाखाविशाखाखेLIBRAE
17अनुराधाअनुराधाधाSCORP II
18ज्येष्ठाज्येष्ठाज्येANTARES
19मूलविचृतौमूSCORPIONIS
20पूर्वाषाढाअषाढाप:SAGITTAR I
21उत्तराषाढाअषाढा उत्तराश्वेSAGITTAR II
22श्रवणश्रोणान:AQUILAE
23धनिष्ठाश्रविष्ठाष्ठाDELPHINI
24शतभिषाशतभिषकषक्AQUAR II
25पूर्वाभाद्रपदप्रोष्ठपदअज:PEGASI/ MARKAB
26उत्तराभाद्रपदपृष्ठपदहि:PEGASI/ ANDROMEDA
27रेवतीरेवतीरेPISCIUM


गुण धर्म, प्रकृति के आधार पर सम्पूर्ण 27 नक्षत्रों का तीन समूहों में विभाजन किया गया है-----
(1)देव प्रकृति:-अश्विनी, म्रृगशीर्ष, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, स्वाति, अनुराधा, श्रवण और रेवती नक्षत्र
(2)मनुष्य प्रकृति:-भरणी, रोहिणी, पूर्वा फ़ाल्गुनी, उत्तरा फ़ाल्गुनी, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और आद्रा नक्षत्र
(3)राक्षस प्रकृति:- कृतिका, आश्लेषा, मघा, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, धनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्र.