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इच्छानुसार संतान प्राप्त करने के उपाय

विवाहोपरांत दंपति को संतान प्राप्ति की प्रबल उत्कंठा होती है. आज जब लडकियां भी पढ लिखकर काफ़ी उन्नति कर रही हैं तो भी अधिकांश दंपतियों की दबे छुपे मन में पुत्र संतान ही प्राप्त करने की इछ्छा रखते हैं. यों तो संतान योग जातक की जन्मकुंडली में जैसा भी विद्यमान हो उस अनुसार प्राप्त हो ही जाता है फ़िर भी कुछ प्रयासों से मनचाही संतान प्राप्त की जा सकती है. यानि प्रयत्न पूर्वक कर्म करने से बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है.

योग्य पुत्र प्राप्त करने के इच्छुक दंपति अगर निम्न नियमों का पालन करें तो अवश्य ही उत्तम पुत्र प्राप्त होगा. स्त्री को हमेशा पुरूष के बायें तरफ़ सोना चाहिये. कुछ देर बांयी करवट लेटने से दायां स्वर और दाहिनी करवट लेटने से बांया स्वर चालू हो जाता है. इस स्थिति में जब पुरूष का दांया स्वर चलने लगे और स्त्री का बांया स्वर चलने लगे तब संभोग करना चाहिये. इस स्थिति में अगर गर्भादान हो गया तो अवश्य ही पुत्र उत्पन्न होगा. स्वर की जांच के लिये नथुनों पर अंगुली रखकर ज्ञात किया जा सकता है.

योग्य कन्या संतान की प्राप्ति के लिये स्त्री को हमेशा पुरूष के दाहिनी और सोना चाहिये. इस स्थिति मे स्त्री का दाहिना स्वर चलने लगेगा और स्त्री के बायीं तरफ़ लेटे पुरूष का बांया स्वर चलने लगेगा. इस स्थिति में अगर गर्भादान होता है तो निश्चित ही सुयोग्य और गुणवती कन्या संतान प्राप्त होगी.

मासिक धर्म शुरू होने के प्रथम चार दिवसों में संभोग से पुरूष रुग्णता को प्राप्त होता है. पांचवी रात्रि में संभोग से कन्या, छठी रात्रि में पुत्र, सातवी रात्रि में बंध्या पुत्री, आठवीं रात्रि के संभोग से ऐश्वर्यशाली पुत्र, नवी रात्रि में ऐश्वर्यशालिनी पुत्री, दसवीं रात्रि के संभोग से अति श्रेष्ठ पुत्र, ग्यारहवीं रात्रि के संभोग से सुंदर पर संदिग्ध आचरण वाली कन्या, बारहवीं रात्रि से श्रेष्ठ और गुणवान पुत्र, तेरहवी रात्रि में चिंतावर्धक कन्या एवम चौदहवीं रात्रि के संभोग से सदगुणी और बलवान पुत्र की प्राप्ति होती है. पंद्रहवीं रात्रि के संभोग से लक्ष्मी स्वरूपा पुत्री और सोलहवीं रात्रि के संभोग से गर्भाधान होने पर सर्वज्ञ पुत्र संतान की प्राप्ति होती है. इसके बाद की अक्सर संतान नही होती. अत: इच्छित संतान प्राप्ति के लिए उपरोक्त तथ्यों का ध्यान रखते हुये बताये गये स्वरों के अनुसार कर्म करना चाहिये.

जिन लोगों को सुंदर, दिर्घायु और स्वस्थ संतान चाहिये उन्हें गडांत, ग्रहण, सूर्योदय एवम सूर्यास्त्काल, निधन नक्षत्र, रिक्ता तिथि, दिवाकाल, भद्रा, पर्वकाल, अमावस्या, श्राद्ध के दिन, गंड तिथि, गंड नक्षत्र तथा आंठवें चंद्रमा का त्याग करके शुभ मुहुर्त में संभोग करना चाहिये.

पुरातन काल में दंपति आज की तरह हर रात्रि को नही मिलते थे सिर्फ़ उनका सहवास सिर्फ़ संतान प्राप्ति के उद्देष्य के लिये होता था. शुभ दिन और शुभ मुहुर्त के संभोग से वो योग्य संतान प्राप्त कर लेते थे. वर्तमान काल में युवा पीढी की उदंडता, अनुशासनहीनता, लडाई झाग्डे की प्रवॄति वाले उग्रवादी होने के लिये वास्तव में उनके माता पिता ही जिम्मेदार हैं क्योंकि वे किसी भी दिन, किसी भी समय संभोग करके गर्भ धारण करके संतान पैदा कर लेते हैं.

ऋषि कश्यप और उनकी स्त्री दिति इसके ज्वलंत उदाहरण हैं एक दिवस महर्षि कश्यप संध्या समय नदी तट पर संध्या हेतु जा रहे थे कि उसी समय उनकी पत्नि दिति ने कामाभिभूत होकर महर्षि कश्यप को सहवास के लिये निमंत्रण देकर उन्हें ऐसा करने के लिये बाध्य कर दिया. इस संध्या काल के गर्भाधान की वजह से ही दिति ने हिरणकश्यप जैसी राक्षस संतान पैदा की.

दिति की बहिन एवम महर्षि कश्यप की द्वितीय पत्नि अदिति धार्मिक नियमों का पालन करते हुये केवल रात्रि के शुभ मुहुर्तों में ही संभोग रत होते थे अत: अदिति की गर्भ से सारी देवता संताने ही पैदा हुई.

गर्भाधान के समय केंद्र एवम त्रिकोण मे शुभ ग्रह हों, तीसरे छठे ग्यारहवें घरों में पाप ग्रह हों, लग्न पर मंगल गुरू इत्यादि शुभ कारक ग्रहों की दॄष्टि हो, विषम चंद्रमा नवमांश कुंडली में हो और मासिक धर्म से सम रात्रि हो, उस समय सात्विक विचार पूर्वक योग्य पुत्र की कामना से यदि रति की जाये तो निश्चित ही योग्य पुत्र की प्राप्ति होती है. इस समय में पुरूष का दायां एवम स्त्री का बांया स्वर ही चलना चाहिये, यह अत्यंत अनुभूत और अचूक उपाय है जो खाली नही जाता. इसमे ध्यान देने वाली बात यह है कि पुरुष का जब दाहिना स्वर चलता है तब उसका दाहिना अंडकोशः अधिक मात्रा में शुक्राणुओं का विसर्जन करता है जिससे कि अधिक मात्रा में पुल्लिग शुक्राणु निकलते हैं. अत: पुत्र ही उत्पन्न होता है.

यदि पति पत्नि संतान प्राप्ति के इच्छुक ना हों और सहवास करना ही चाहें तो मासिक धर्म के अठारहवें दिन से पुन: मासिक धर्म आने तक के समय में सहवास कर सकते हैं, इस काल में गर्भादान की संभावना नही के बराबर होती है.

तीन चार मास का गर्भ हो जाने के पश्चात दंपति को सहवास नही करना चाहिये. अगर इसके बाद भी संभोग रत होते हैं तो भावी संतान अपंग और रोगी पैदा होने का खतरा बना रहता है. इस काल के बाद माता को पवित्र और सुख शांति के साथ देव आराधन और वीरोचित साहित्य के पठन पाठन में मन लगाना चाहिये. इसका गर्भस्थ शिशि पर अत्यंत प्रभावकारी असर पदता है, अभिमन्यु का उदाहरण सभी जानते हैं.

अगर दंपति की जन्मकुंडली के दोषों से संतान प्राप्त होने में दिक्कत आरही हो तो बाधा दूर करने के लिये संतान गोपाल के सवा लाख जप करने चाहिये. यदि संतान मे सूर्य बाधा कारक बन रहा हो तो हरिवंश पुराण का श्रवण करें, राहु बाधक हो तो क्न्यादान से, केतु बाधक हो तो गोदान से, शनि या अमंगल बाधक बन रहे हों तो रूद्राभिषेक से संतान प्राप्ति में आने वाली बाधायें दूर की जा सकती हैं.

जन्म कुंडली में सुखी दांपत्य जीवन की स्थितियां

विवाह के बाद कुछ समय तो गॄहस्थी की गाडी बढिया चलती रहती है किंतु कुछ समय के बाद ही पति पत्नि में कलह झगडे, अनबन शुरू होकर जीवन नारकीय बन जाता है. इन स्थितियों के लिये भी जन्मकुंडली में मौजूद कुछ योगायोग जिम्मेदार होते हैं. अत: विवाह तय करने के पहले कुंडली मिलान के समय ही इन योगायोगों पर अवश्य ही दॄष्टिपात कर लेना चाहिये.

सातवें भाव में खुद सप्तमेश स्वग्रही हो एवम उसके साथ किसी पाप ग्रह की युति अथवा दॄष्टि भी नही होनी चाहिये. लेकिन स्वग्रही सप्तमेश पर शनि मंगल या राहु में से किन्ही भी दो ग्रहों की संपूर्ण दॄष्टि संबंध या युति है तो इस स्थिति में दापंत्य सुख अति अल्प हो जायेगा. इस स्थिति के कारण सप्तम भाव एवम सप्तमेश दोनों ही पाप प्रभाव में आकर कमजोर हो जायेंगे.

यदि शुक्र के साथ लग्नेश, चतुर्थेश, नवमेश, दशमेश अथवा पंचमेश की युति हो तो दांपत्य सुख यानि यौन सुख में वॄद्धि होती है वहीं षष्ठेश, अष्टमेश अथवा द्वादशेश के साथ संबंध होने पर दांपत्य सुख में न्यूनता आती है.

यदि सप्तम अधिपति पर शुभ ग्रहों की दॄष्टि हो, सप्तमाधिपति से केंद्र में शुक्र संबंध बना रहा हो, चंद्र एवम शुक्र पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो दांपत्य जीवन अत्यंत सुखी और प्रेम पूर्ण होता है.

लग्नेश सप्तम भाव में विराजित हो और उस पर चतुर्थेश की शुभ दॄष्टि हो, एवम अन्य शुभ ग्रह भी सप्तम भाव में हों तो ऐसे जातक को अत्यंत सुंदर सुशील और गुणवान पत्नि मिलती है जिसके साथ उसका आजीवन सुंदर और सुखद दांपत्य जीवन व्यतीत होता है. (यह योग कन्या लग्न में घटित नही होगा)

सप्तमेश की केंद्र त्रिकोण में या एकादश भाव में स्थित हो तो ऐसे जोडों में परस्पर अत्यंत स्नेह रहता है. सप्तमेश एवम शुक्र दोनों उच्च राशि में, स्वराशि में हों और उन पर पाप प्रभाव ना हो तो दांपत्य जीवन अत्यंत सुखद होता है.

सप्तमेश बलवान होकर लग्नस्थ या सप्तमस्थ हो एवम शुक्र और चतुर्थेश भी साथ हों तो पति पत्नि अत्यंत प्रेम पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं.

सप्तमेश एवम शुक्र एक दूसरे की राशि में केंद्र या त्रिकोण में बैठे हों और उन पर द्वितीयेश और चतुर्थेश का दॄष्टि संबंध हो तो निहायत ही सुखद दांपत्य सुख प्राप्त होता है.

पुरूष की कुंडली में स्त्री सुख का कारक शुक्र होता है उसी तरह स्त्री की कुंडली में पति सुख का कारक ग्रह वॄहस्पति होता है. स्त्री की कुंडली में बलवान सप्तमेश होकर वॄहस्पति सप्तम भाव को देख रहा हो तो ऐसी स्त्री को अत्यंत उत्तम पति सुख प्राप्त होता है.

जिस स्त्री के द्वितीय, सप्तम, द्वादश भावों के अधिपति केंद्र या त्रिकोण में होकर वॄहस्पति से देखे जाते हों, सप्तमेश से द्वितीय, षष्ठ और एकादश स्थानों में सौम्य ग्रह बैठे हों, ऐसी स्त्री अत्यंत सुखी और पुत्रवान होकर सुखोपभोग करने वाली होती है.

पुरूष का सप्तमेश जिस राशि में बैठा हो वही राशि स्त्री की हो तो पति पत्नि में बहुत गहरा प्रेम रहता है.

वर कन्या का एक ही गण हो तथा वर्ग मैत्री भी हो तो उनमें असीम प्रम होता है. दोनों की एक ही राशि हो या राशि स्वामियों में मित्रता हो तो भी जीवन में प्रेम बना रहता है.

अगर वर या कन्या के सप्तम भाव में मंगल और शुक्र बैठे हों उनमे कामवासना का आवेग ज्यादा होगा अत: ऐसे वर कन्या के लिये ऐसे ही ग्रह स्थिति वाले जीवन साथी का चुनाव करना चाहिये. अगर ऐसे ग्रहों से युक्त वर कन्या का विवाह ऐसे जातक से कर दिया जाये जिसके सप्तम भाव में बुध या गुरू बैठे हों , जो कि काम वासना को कम करने वाले ग्रह हैं, तो इस स्थिति में इस युगल यौन विषय्क असमानता आ जाती है जिसके फ़लस्वरूप इनके जीवन में झगडे झंझट शुरू होकर दांपत्य सुख खत्म सा हो जाता है.

दांपत्य सुख का संबंध पति पत्नि दोनों से होता है. एक कुंडली में दंपत्य सुख हो और दूसरे की में नही हो तो उस अवस्था में भी दांपत्य सुख नही मिल पाता, अत: सगाई पूर्व माता पिता को निम्न स्थितियों पर ध्यान देते हुये किसी सुयोग्य और विद्वान ज्योतिषी से दोनों की जन्म कुंडलियों में स्वास्थ्य, आयु, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, संतान पक्ष इत्यादि का समुचित अध्ययन करवा लेना चाहिये सिर्फ़ गुण मिलान से कुछ नही होता.

वर वधु की आयु का अधिक अंतर भी नही होना चाहिये, दोनों का शारीरिक ढांचा यानि लंबाई उंचाई, मोटाई, सुंदरता में भी साम्य देख लेना चाहिये. अक्सर कई धनी माता पिता अपनी काली कलूटी कन्या का विवाह धन का लालच देकर किसी सुंदर और गौरवर्ण लडके से कर देते हैं जो बाद में जाकर कलह का कारण बनता है. इसी तरह कई धनी पालक अपने काले कलूटे और कम पढे लिखे पुत्र के लिये सुंदर और गौरवर्ण पढी लिखी युवती से कर देते हैं और युवती के मां बाप भी यह सोचकर कि लडकी उंचे और धनी परिवार में जा रही है, उसकी शादी कर देते हैं, इस तरह के जोडे भी अक्सर दांपत्य सुख में कमी का शिकार होते हैं.

कुल मिलाकर शिक्षा, खानदान, खान पान परंपरा इत्यादि की साम्यता देखकर ही निर्णय लेना चाहिये. इस सबके अलावा वर कन्या के जन्म लग्न एवन जन्म राशि के तत्वों पर भी दॄष्टिपात कर लेना चाहिये. दोनों के लग्न, राशि के एक ही ततव हों और परस्पर मित्र भाव वाले हों तो भी पति पत्नि का जीवन प्रेम मय बना रहता है. इस मामले में विपरीत तत्वों का होना पति पत्नि में शत्रुता पैदा करता है यानि पति अग्नि तत्व का हो और पत्नि जल तत्व की हो तो गॄहस्थी की गाडी बहुत कष्ट दायक हो जाती है. कुल मिलाकर एक ही तत्व वाले जोडे अधिक सुखद दांपत्य जीवन जीते हैं..

प्रेम विवाह की सफ़लता या असफ़लता के लिये जिम्मेदार स्थितियां

जैसे--जैसे बच्चों की आयु बढने लगती है, त्यों-त्यों माता-पिता को उनकी विवाह-शादी की चिन्ता सताने लगती है. भारतीय समाज में अधिकाशंत: निर्धारित शादियां करने की ही परम्परा रही है. हालाँकि, पुरातन काल में विवाह की कईं प्रकार की परंपरायें प्रचलन में थी. इच्छित विवाह एवं स्वयंबर तथा गंधर्व विवाह भी हुआ करते थे. कुछ राजा लोग अपनी पुत्री की शादी के लिये किसी बात का प्रण ले लेते थे और उस प्रण को पूरा करने वाले का वरण कन्या को चाहे अनचाहे करना ही पडता था. भगवान राम एवं सीता जी का विवाह भी इसी परंपरा मे हुआ था.

आज के समय में जब लडका और लडकी दोनों ही पढे लिखें हैं और समान रूप से कामकाजी हो गये हैं. घर, शहर और विदेश में अकेले रह कर काम कर रहे हैं तभी से प्रेम विवाह का चलन बढा है. लेकिन यह बात भी उतनी ही सत्य है कि आज के समय में पालक प्रेम विवाह को अच्छी नजर से नही देखते हैं और यथा संभव प्रेम विवाह में रोडे ही अटकाने की कोशीश करते हैं. लेकिन अगर जन्मकुंडली में प्रेम विवाह के योग बने हुये हैं तो वो रोकने की लाख कोशीश करले उसको रोक नही पाते. इसी वजह से कई जोडे घर से भागकर मंदिर में शादी कर लेते हैं.

यहां एक बात कहना उचित होगा कि अगर जन्मकुंडली में प्रेम विवाह का योग परिलक्षित हो रहा हो तो पालको को चाहिये कि शांत दिमाग से काम लेकर किसी योग्य ज्योतिषी से बच्चों की कुंडली का अध्ययन अवश्य करवा लेना चाहिये जिससे यह पता लगाया जा सके कि ये प्रेम संबंध सफ़ल होकर सुख शांति बनी रहेगी या ये प्रेम संबंध सिर्फ़ अनैतिक संबंधों तक ही सीमित होकर कलह का कारण बनेंगे.

प्रेम संबंध और प्रेम विवाह के लिये लडका लडकी की कुंडली के पंचम भाव का भलिभांति अध्ययन कर लेना चाहिये. प्रेम का संबंध पंचम भाव से होकर जीवन साथी का भाव सप्तम होता है. विवाह का कारक शुक्र होकर भोग विलास का दायित्व भी शुक्र का है. इन भावों के अध्ययन से ही स्पष्ट होगा कि ये प्रेमी जोदा सुखपूर्वक जीवन यापन करेगा या एक दुखी जीवन का निर्माण करेगा.

कुंडली के पंचम भाव से स्वाभाविक प्रेम और संतान के बारे में जाना जाता है. सप्तम भाव से इसके तादाम्य के अनुसार ही प्रेम विवाह की सफ़लता असफ़लता का निर्धारण किया जाता है. पंचमेश और सप्तमेश का कुंडली में एक दूसरे से त्रिकोण या केंद्र में होना अति आवश्यक है. यदि ये ग्रह लग्न, नवम भाव, दशम भाव या एकादश भाव में युति करें अथवा केंद्र त्रिकोण में हों तो प्रेम विवाह की प्रबल संभावना बनती है. पंचमेश सप्तमेश और नवमेश और इन भावों की स्थिति मजबूत हो तो एक सफ़ल और सुखद वैवाहिक जीवन व्यतीत होता है. इसके विपरीत पंचमेश, नवमेश और सप्तमेश का संअबंध किसी भी तरह कुंडली के छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो प्रेम विवाह में विफ़लता एवम निराशा ही उठानी पडती है.

निम्न लिखित योग कुंडली में अगर विद्यमान हों तो प्रेम विवाह की संभावना प्रबल होती है:----

१. युति अथवा दॄष्टि द्वारा पंचम, नवम और सप्तम भावो ए भावेशों का संबध बन रहा हो.

२. सांतवे भाव में शनि और केतु की उपस्थिति भी प्रेम विवाह में अति सहायक होती है.

३. जब नवम और सप्तम भाव और उनके अधिपति और गुरू अशुभ भावों से घिरे हों.

४. सप्तमेश एवम शुक्र यदि शनि या राहु से युति करें या उनसे दॄष्ट हों तो भी प्रेम विवाह हो सकता है.

जब द्वादश भाव चर राशि का नही हो एवम उसका संबंध लग्नेश और सप्तमेश के साथ हो जातक घर की परंपाराओं के विपरीत अंतर्जातीय विवाह करता है.

५. लग्न और सप्तम के अधिपति आटवें या पांचवे भाव मे हो अथवा लग्नेश पंचमेश सातवें हों, पंचमेश एवम सप्तमेश लग्न में हों तो मर्यादाओं को लांघते हुये जातक बेधडक प्रेम विवाह करता है.

६. लग्न में चंद्र हो या कर्क राशि हो, अथवा मंगल हो या उसकी राशि हो तो निश्चित तौर पर अंतर्जातीय प्रेम विवाह होता है.
७. पंचमेश, लग्नेश और सप्तमेश का संबंध द्वादश भाव से बने तब भी प्रेम विवाह होता है.

जन्मकुंडली का विस्तॄत अध्ययन करके प्रेम विवाह की सफ़लता या असफ़लता का निश्चित तौर पर पता लगाया जा सकता है.

विवाह कब होगा ?

वर्तमान युग में पढाई लिखाई और सेटल होने तक शादी नही करने के चलन की वजह से शादी ज्यादा उम्र में होने लगी है. ऐसे में पालको का चिंतित होना स्वाभाविक है. जन्मकुंडली में कुछ योग ऐसे होते हैं जिनके फ़लिते होने के समय में विवाह आसानी से हो जाता है.

इसके लिये सातवां भाव, सप्तमेश व शुक्र से संबन्ध बनाने वाले ग्रहों को देखना चाहिये. जन्म कुण्डली में जो भी ग्रह अशुभ या पापी ग्रह इन ग्रहों से युति या अन्य प्रकार के संबंधों द्वारा इन पर प्रभाव डालता है असल में वही ग्रह विवाह में विलम्ब का कारण बन जाता है.

विवाह के कारक भाव सप्तम, सप्तमेश व शुक्र पर शुभ ग्रहों का असर जितना ज्यादा होगा, उतना ही अच्छा रहता है. एवम अशुभ ग्रहों का प्रभाव ना होना भी विवाह का समय पर संपन्न होने के लिये जरूरी रहता है. क्योकि अशुभ एवम पापी ग्रह जब भी शादी के कारक भावों अथवा कारक ग्रहों को प्रभावित करते है तो विवाह में अनावश्यक देरी होती है. जन्म कुण्डली के अध्ययन पश्चात जब यह तय हो जाये कि शादी की उम्र या वर्ष कौन सा है तब उसके बाद विवाह के कारक ग्रह शुक्र और विवाह के खास (main) ग्रह की दशा अंतर्दशा में विवाह संपन्न होने की संभावनाएं बढ जाती है.


कौन सी दशा- अन्तर्दशाओं में विवाह होगा :-

जिस समय में कुण्डली के योग विवाह की संभावनाएं बना रहे हों, उस समय में जातक की ग्रह दशा में सप्तमेश का संबन्ध शुक्र (Venus) से हो तों इस समयावधि में विवाह संपन्न होता है. एवम जब भी सप्तमेश और द्वितीयेश का ग्रह दशा/अंतर्दशाओं में संबंध बन रहा हो उस समयावधि में भी विवाह होने के प्रबल योग होते है.

ग्रह दशाओं में जब भी सप्तमेश व नवमेश का आपस में योग बन रहा हो और ये दोनों जन्म कुण्डली में पंचमेश से भी संबन्ध बनाते हों तो इस समय में प्रेम विवाह होने की संभावनाएं बलवती हो जाती है.

सातवें भाव में जो ग्रह स्थित होते हैं उनका संबन्ध अगर सप्तमेश या शुक्र से बन रहा हो, उन सभी ग्रहों की दशा - अन्तर्दशा में विवाह होने की प्रबल संभावनाएं होती हैं.

सप्तम भावगत ग्रह, सप्तमेश जब शुभ बलि ग्रह होकर शुभ भाव में विराजित हों तो जातक का विवाह संबन्धित ग्रह की दशा की शुरूआत की अवधि में होने की प्रबल संभावना होती.

शुक्र, सप्तम भावगत ग्रह या सप्तमेश जब बलि शुभ ग्रह होकर अशुभ भाव अथवा अशुभ ग्रह की राशि में होने पर अपनी दशा/अन्तर्दशा के बीच वाले समय में विवाह के योग बना देता है..
जब विवाह कारक ग्रह शुक्र नैसर्गिक रुप से शुभ हों, तो गोचर में गुरू अथवा शनि से योग करने पर अपनी दशा/अन्तर्दशाओं में विवाह होने का योग बनाता है.

जन्म कुण्डली में शुक्र जिस ग्रह के नक्षत्र में स्थित हों, उस ग्रह की दशा/अंतर्दशा की अवधि में विवाह होने की प्रबल संभावनाएं होती है.

तयशुदा शादी या प्रेमविवाह ( Love Marrige or Arrange Marrige)

जब भी लड़का और लड़की के बीच प्रेम हो जाता है तो प्रेम की अंतिम परिणीति वो विवाह के रूप में करना चाहते हैं. कुछ लोग इसमे कामयाब हो जाते हैं और कुछ नाकाम होते देखे गये हैं. अब जन्मकुंडली के वो कौन से योग हैं जिनके फ़लित होने से प्रेम विवाह में सफ़लता मिलती है.

अगर जन्म कुंडली में चतुर्थेश दशम भावगत हो तो जातक/जातिका अवश्य ही प्रेम विवाह करते हैं चाहे जितनी भी बाधायें, उन्हें आसानी से पार कर लेते हैं.

इसके अलावा ज्योतिष में "शुक्र ग्रह" को प्रेम का कारक ग्रह माना जाता है जन्म कुण्डली में शुक्र का सम्बन्ध लग्न, पंचम, सप्तम तथा एकादश भावों से होने पर जातक प्रेमी स्वभाव का होता है. पर स्वभाव का विवाह में परिणत होना तभी संभव होगा जब इनका सप्तम से बलि और शुभ संबंध बन रहा हो. क्योंकि इस योग में लग्न पंचम और नवम त्रिकोण का सप्तम भाव से संबंध बन जाता है जो सफ़ल और सुखी दांपत्य जीवन देने में सक्षम सिद्ध होता है.

पंचम भाव का स्वामी पंचमेश शुक्र अगर सप्तम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह की प्रबल संभावना बनती है. शुक्र अगर अपने घर में मौजूद हो तब भी प्रेम विवाह का योग बनता है. अगर ये स्थियां जन्मकुंडली में ना हों तब भी अनेक योग मौजूद होकर प्रेम विवाह में सहायक सिद्ध होते हैं जैसे अगर कुण्डली में प्रेम विवाह योग नहीं है और नवमांश कुण्डली में सप्तमेश और नवमेश की युति होती है तब तो प्रेम विवाह की संभावना सौ प्रतिशत हो जाती है. प्रेम का कारक बलि और शुभ शुक्र ग्रह लग्न में मौजूद हो और साथ में लग्नेश भी वही बैथे हों तो प्रेम विवाह निश्चित तौर पर होता ही है.

शनि और केतु जैसे पापी ग्रहों की सप्तम भाव में युति प्रेम विवाह के लिये अति शुभ संकेत होता है।

आपका होने वाला पति कैसा होगा?

विवाह योग्य होती कन्याएं अक्सर यह कल्पना करती हैं कि उनका होने वाला पति कैसा होगा? जो घोडी पर चढकर आयेगा और उन्हें ले जायेगा जहां उनका नया घर संसार शुरू होगा. हर लडकी की इच्छा होती है कि उसका एक सुखी गॄहस्थ जीवन हो, प्यार देने वाला पति हो और जीवन में सुख ऐश्वर्य हो.

पर क्या सभी क्न्याओं के सपने पूर्ण हो पाते हैं? एक तरफ़ ऐसा पति मिलता है जो बडा व्यापारी या ओहदेदार अफ़्सर है, अपनी पत्नि पर जान छिडकता है, उसकी सुख सुविधा के लिये अच्छा घर मकान नौकर चाकर जुटाता है तो दूसरी तरफ़ ऐसे भी पति होते हैं जो दिन रात घर में कलह किये रहते हैं. अब्बल तो वो खुद कमाने में अक्षम होकर पत्नि से दूसरों के घर झाडू बुहारी का काम करवाते हैं, बच्चों व पत्नि से मारपीट करना अपना धर्म समझते हैं. और कुछ ऐसे भी पति पाये जाते हैं जो अच्छा व्यापार, धन या अफ़सर होते हुये भी पत्नि और बच्चों को सिवाय गाली गलौच और मारपीट के कुछ नही देते, घर मे चौबीसों घंटे कलह मचाये रहते हैं. जब तक वो घर में रहते हैं, बच्चे और पत्नि यही प्रार्थना करते रहते अहिं कि कब ये घर से आफ़िस जाये और थोडी देर के लिये शांति मिले.

यानि कुछ ऐसी खुशनसीब पत्निया होती हैं जो यहां स्वर्गिक आनंद उठा रही होती हैं वही कुछ ऐसी होती हैं जो यहां साक्षात नर्क भोगती है. आईये इस बात को ज्योतिषिय दॄश्टिकोण से समझने का प्रयत्न करते हैं.

जन्म समय में जो ग्रहों की स्थिति होती है उस अनुसार विद्या, बुद्धि, धन, कुटुंब, भाग्य, सुख इत्यादि का अनुमान जन्म्कुंडली से लग जाता है इसी प्रकार किसी लडकी का दांपत्य जीवन कैसा रहेगा, इसका पता भी जन्मकुंडली स्थित ग्रहों को देखकर लग जाता है.

जनम्कुंडली का सातवां भाव जीवन साथी का होता है और गुरू पति सुख का कारक ग्रह होता है. मंगल की भुमिका यहां स्त्री के काम (यौन) सुख एवम रज से संबंधित होती है. अत: किसी स्त्री का का पति कैसा होगा और उसका भावी दांपत्य जीवन कैसा होगा? इसके लिये बहुत गहराई से स्त्री की जन्मकुंडली के सातवें भाव, सप्तमस्थ राशि, सप्तमस्थ स्थित ग्रह, सप्तम पर दॄष्टि डालने वाले अन्य भावाधिपति, वॄहस्पति ग्रह स्थित और उस पर अन्य भावाधिपतियों के प्रभाव का अध्ययन करना पडेगा. वॄहस्पति के साथ ही मंगल का भी विशेष रूप से अध्ययन कर लेना चाहिये. स्त्रियों की कुंडली का अध्ययन करते समय विशेष रूप से नवमांश कुंडली के साथ ही साथ द्रेषकाण और त्रिशांश का भलिभांति अवलोकन कर लेना चाहिये.

अब हम आपको कुछ वो योग बता रहे हैं जो किसी स्त्री की कुंडली में विद्यमान हों तो उसे दामफ्त्य सुख प्रदान करने वाले पति की प्राप्ति सहज रूप से होती है.

१. सप्तम भाव में सप्तमेष स्वग्रही हो
२. सप्तम भाव पर पाप ग्रहों की दॄष्टि ना होकर शुभ ग्रहों की दॄष्टि हो अथवा स्वयं सप्तमेश सप्तम भाव को देखता हो.
३. सप्तमस्थ कोई नीच ग्रह ना हो यदि सप्त भाव में कोई उच्च ग्रह हो तो अति सुंदर योग होता है.
४. सप्तम भाव में कोई पाप ग्रह ना होकर शुभ ग्रह विद्यमान हों और षष्ठेश या अष्टमेश की उपस्थिति सप्तम भाव में कदापि नही होनी चाहिये.
५. स्वयं सप्तमेश को षष्ठ, अष्टम एवम द्वादश भाव में नहीं होना चाहिये. सप्तमेश के साथ कोई पाप ग्रह भी नही होना चाहिये साथ ही स्वयं सप्तमेश नीच का नही होना चाहिये.
६. सप्तमेश उच्च राशिगत होकर केंद्र त्रिकोण में हो.
७. वॄहस्पति भी स्वग्रही या उच्च का होकर बलवान हो, दु:स्थानगत ना हो, उस पर पाप प्रभाव ना हो तो अति श्रेष्ठ दांपत्य सुख प्राप्त होता है.
८ मंगल भी बलवान हो. मंगल पर राहु शनि की युति अथवा दॄष्टि प्रभाव नही होना चाहिये.

विवाह कब होगा ?



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