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मीन लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 330 डिग्री से 360 डिग्री तक के भाग को मीन राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता हुआ दिखाई देता है , उस जातक का लग्‍न मीन माना जाता है. मीन लग्‍न में मन का स्‍वामी चंद्रमा पंचम भाव का स्‍वामी होकर माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.


सूर्य षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी , वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल द्वितीय और नवम भाव का स्‍वामी होता है द्वितीय भाव का अधिपति होने के कारण जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्‍व करता है जबकि नवमेश होने के कारण यह धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शुक्र तृतीय और अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है. तॄतीयेश होने के कारण यह जातक के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि संदर्भों का प्रतिनिधि बनता है जबकि अष्टमेश होने के कारण यह व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बुध चतुर्थ भाव का स्‍वामी होकर जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि बनता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बृहस्‍पति दशम भाव का स्‍वामी होकर जातक के राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बॄहस्पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि एकादश और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है. एकादश भाव का स्वामी होने के कारण यह जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि बनता है जबकि द्वादशेश होने के नाते यह निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण.इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु को मीन लग्न में सप्तमेश होने का दायित्व मिलता है जिसकी वजह से यह जातक लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होत है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु को मीन लग्न में लग्नेश होने का दायित्व मिलता है इस वजह से यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व को प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

कुंभ लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 300 डिग्री से 330 डिग्री तक के भाग को कुंभ राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज पर उदित होता हुआ दिखाई देता है, उस जातक का लग्‍न कुंभ माना जाता है. कुंभ लग्‍न की कुंडली में मन का स्‍वामी चंद्र षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है. यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

समस्त विश्व को प्रकाशित करने वाला सूर्य सप्‍तम भाव का स्‍वामी होकर जातक के लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल तृतीय और दशम भाव का स्‍वामी होता है. तॄतीयेश होने के कारण नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है जबकि दशमेश होने के कारण यह जातक के राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शुक्र चतुर्थ और नवम भाव का स्‍वामी होता है. चतुर्थेश होने के कारण यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का कारक होता है. एवम नवमेश होने के कारण धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. कुंभ लग्न में एक केंद्र और एक त्रिकोण का स्वामी होकर शुक्र अतीव शुभ और राजयोग कारक ग्रह बन जाता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में अतयंत शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से न्य़ून शुभ फ़लों के साथ अधिक अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बुध पंचम भाव का स्‍वामी होकर जातक के बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बृहस्‍पति एकादश भाव का स्‍वामी होकर जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि प्रथम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है. लग्नेश होने के नाते यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व इत्यादि का प्रतिनिधि होता है जबकि द्वादशेश होने के कारण यह जातक के निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु अष्टम भाव का स्वामी होकर यहां अष्टमेश होता है जिसके कारण उसे जातक के व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व मिलता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु द्वितीय भाव का स्वामी होकर यहां जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मकर लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 270 डिग्री से 300 डिग्री तक के भाग को मकर राशि के रूप में जाना जाता है. जिस जताक के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है, उस जातक का लग्‍न मकर माना जाता है. मकर लग्‍न की कुंडली में में मन का स्‍वामी चंद्रमा सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है. यह जातक लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

सूर्य अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल चतुर्थ और एकादश भाव का स्‍वामी होता है. चतुर्ठेश होने के नाते माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह संबंधी विषयों का प्रतिनिधित्व करता है जबकि एकादशेश होने के नाते लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शुक्र पंचम और दशम भाव का स्‍वामी होता है. पंचमेश होने के कारण यह जातक के बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार इत्यादि विषयों का और दशमेश होने के कारण राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का अधिपति होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. एक केंद्र और त्रिकोण का स्वामित्व मिलने शुक्र मकर लग्न में अति योगकारी होता है.

मकर लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बृहस्‍पति द्वादश भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है.
जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि प्रथम और द्वितीय भाव का स्‍वामी होता है. यह लग्नेश होने के नाते जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधि एवम द्वितीयेश होने के कारण कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मकर लग्न में राहु नवम भाव का अधिपति होकर जातक के धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि बनकर अति शुभ हो जाता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में विशेष शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु यहां तॄतीयेश होकर जातक के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

धनु लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 240 डिग्री से 270 डिग्री तक के भाग को धनु राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है, उस जातक का लग्‍न धनु माना जाता है. धनु लग्‍न की कुंडली में मन का स्‍वामी चंद्र अष्‍टम भाव का अधिपति होता है. यह जातक व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.


सूर्य नवम् भाव का स्‍वामी होकर धनु लग्न के जातक के भाग्‍य और धर्म का प्रतिनिधित्‍व करता है. यह जातक के धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल पंचम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है. पंचमेश होने कारण यह बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार इत्यादि संदर्भों का प्रतिनिधित्‍व करता है एवम द्वादशेश होने के नाते निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.


शुक्र षष्‍ठ और एकादश भाव का स्‍वामी होता है. षष्ठेश होने के नाते यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. एवम द्वादशेश होने के कारण लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.


बुध सप्‍तम भाव का स्वामी होकर जातक के लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.


बृहस्‍पति प्रथम भाव का स्‍वामी होकर लग्नेश होता है. यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.


शनि द्वितीय और तृतीय भाव का स्‍वामी होता है. द्वितीयेश होने के कारण यह जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब विषयक मामलों का प्रतिनिधि होता है वहीं तॄतीयेश होने के कारण यह नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों को प्रतिनिधित्व देता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु दशम भाव का स्वामी होकर धनु लग्न में जातक के राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयक प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु चतुर्थ भाव का स्वामी होकर जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

वृश्चिक लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 210 डिग्री से 240 डिग्री तक के भाग को वृश्चिक राशि के रूप में चिन्हित किया गया है. जिस जातक के जन्‍म के समय यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है, उस जातक का लग्‍न वृश्चिक माना जाता है. वृश्चिक लग्‍न की कुंडली में मन का स्‍वामी चंद्र नवम् भाव का स्‍वामी होकर जातक धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

सर्वत्र प्रकाश बिखरने वाला सूर्य दशम भाव का स्‍वामी होता है. यह जातक के राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल प्रथम और षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है. लग्नेश होने के कारण रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधि होता है एवम षष्ठेश होने के कारण यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शुक्र सप्‍तम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है. सप्तमेश होने के नाते लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है एवम द्वादशेश होने के कारण यह निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.


बुध अष्‍टम भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बृहस्‍पति द्वितीय भाव का स्‍वामी होकर यह जातक कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बॄहस्पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि तृतीय और चतुर्थ भाव का स्‍वामी होता है. तॄतीयेश होने के नाते यह जातक के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों का प्रनिधि होता है जबकि चतुर्थेश होने के कारण यह माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु एकादश भाव का अधिपति होकर जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु पंचम भाव का स्वामी होकर जातक के बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

तुला लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 180 डिग्री से 210 डिग्री तक के भाग को तुला राशि के रूप में जाना जाता है. जिस जातक का जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता है , उस जातक का लग्‍न तुला माना जाता है. तुला लग्‍न की कुंडली में मन का स्‍वामी चंद्र दशम भाव का स्‍वामी होकर यह जातक राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

सूर्य एकादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल द्वितीय और सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है. द्वितीयेश होने के नाते यह जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है जबकि सप्तमेश होने के नाते लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शुक्र प्रथम और अष्‍टम भाव का स्‍वामी है. लग्नेश होने के नाते यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है जबकि अष्टमेश होने के कारण यह व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बुध नवम भाव का स्‍वामी होकर नवमेश होकर यह जातक के धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल, ज्योतिषी इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बृहस्‍पति तृतीय भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बॄहस्पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि चतुर्थ और पंचम भाव का स्‍वामी होकर तुला लग्न की कुंडली में अत्यंत शुभ और योगकारी ग्रह हो जाता है. चतुर्थेश होने के कारण यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है एवम पंचमेश होने के कारण यह बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु द्वादश भाव का स्वामी होकर जातक के निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.


केतु छठे भाव का स्वामी होकर षष्ठेश होता है. यह जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

कन्या लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 150 डिग्री से 180 डिग्री तक के भाग को कन्‍या राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज पर उदित होता दिखाई देता है उस जातक का लग्‍न कन्‍या माना जाता है. कन्‍या लग्‍न की कुंडली के अनुसार मन का स्‍वामी चंद्र एकादश भाव का स्‍वामी होता है. यह जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है . जातक की जन्‍मकुंडली या दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

सूर्य द्वादश भाव का स्‍वामी होकर जातक के निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल तॄतीय एवम अष्टम भाव का स्‍वामी होता है. तॄतीयेश के नाते नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता जैसे विषयों का प्रनिधि होता है जबकि अष्टमेश होने के कारण व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या दशाकाल में मंगल के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.


शुक्र द्वितीय और नवम् भाव का स्‍वामी होता है. द्वितीयेश होने के कारण कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब एवम नवमेश होने के कारण धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.


बुध प्रथम (लग्नेश) और दशम भाव का स्‍वामी होता है. लग्नेश होने के नाते रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधि होता है जबकि दशमेश होने के कारण राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि का प्रतिनिधित्व करता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.


बृहस्‍पति चतुर्थ भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि पंचम और षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है. पंचमेश होने के नाते बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार इत्यादि विषयों का एवम षष्ठेश होने के कारण यह जातक के लिये रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु प्रथम भाव का स्वामी होकर लग्नेश होता है. यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु सप्त भाव का स्वामी होकर जातक के लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड जैसे विषयों का प्रतिनिधि ग्रह होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

सिंह लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 120 डिग्री से 150 डिग्री तक के भाग को सिंह राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज में उदित होता है , उस बालक का लग्‍न सिंह माना जाता है. सिंह लग्‍न की कुंडली में मन का स्‍वामी चंद्रमा द्वादश भाव का स्‍वामी होता है जो कि जातक के निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य प्रथम भाव का स्‍वामी होकर लग्नेश बनता है. यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधि होता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल चतुर्थ और नवम भाव का स्‍वामी होकर सिंह लग्न के जातकों के लिये यह अतीव शुभ फ़लदायक ग्रह होता है. चतुर्थेश होने के कारण यह माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है जबकि नवमेश होने के कारण यह जातक के धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का दायित्व निभाता है. मंगल बलवान और शुभ प्रभाव वाला हो तो वर्णित विषयों
अत्यंत शुभ और प्रचुर फ़ल मिलते हैं जबकि कमजोर और अशुभ प्रभाव वाला मंगल शुभ फ़ल देने में असमर्थ होता है परंतु अशुभ फ़ल सिंह लग्न मे अति अल्प मात्रा में ही देता है. .

शुक्र तृतीय और दशम भाव का स्‍वामी होता है. तॄतीयेश होने के कारण यह जातक के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है एवम दशमेश होने कारण राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति का प्रतिनिधि होता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बुध एकादश भाव का स्‍वामी होकर जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.


बृहस्‍पति पंचम भाव का स्‍वामी हो कर जातक के बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्‍व करता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में वॄहस्पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि षष्‍ठ और सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है. षष्ठेश होने के कारण यह रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन जैसे विषयों एवम सप्तमेश होने के कारण यह लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु द्वितीय भाव का अधिपति होकर जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु अष्टम भाव का अधिपति होकर जातक के व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

कर्क लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 90 डिग्री से 120 डिग्री तक के भाग को कर्क राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज में उदित हुआ दिखाई देता है, उस जातक का लग्‍न कर्क माना जाता है. कर्क लग्‍न की कुंडली में मन का कारक ग्रह चंद्रमा प्रथम भाव का स्‍वामी (लग्नेश) होता है और यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व. इत्यादि का प्रतिनिधित्‍व करता है. इसलिए कर्क लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले ये सभी कार्य ही होते है. जन्‍मकुंडली एवम दशाकाल में चंद्र के बलवान एवम शुभ रहने पर उपरोक्त वर्णित संदर्भों में जातक को शुभ फ़ल मिलकर कर्क लग्‍न के जातक का मन प्रसन्न रहता है. यदि जन्‍मकुंडली या दशाकाल में चंद्र के कमजोर अथवा पाप प्रभाव में रहने पर उपरोक्त संदर्भों में अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं और जातक को मानसिक क्लेश की प्राप्ति होती है.

समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य द्वितीय भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब, का प्रतिनिधित्‍व करता है. इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए कर्क लग्‍न के जातक धन की स्थिति को मजबूत बनाने रखने पर अत्यधिक जोर देते हैं। अपने नाम यश को फैलाने के लिए इन्‍हें धनार्जन एक मुख्य उपाय दिखाई देता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मंगल पंचम और दशम भाव का अधिपति होता है. पंचमेश के नाते बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार इत्यादि एवम दशमेश के नाते राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. कर्क लग्न में मंगल सबसे शुभ अत्यंत राज योगकारी ग्रह होता है. मंगल के बलवान होने एवम शुभ प्रभाव गत होने से कर्क लग्न वाले जातकों को अत्यंत ही शुभ और श्रेष्ठ फ़ल उपरोक्त विषयों में प्राप्त होते हैं. अगर मंगल कमजोर, अशुभ प्रभाव में हो तो वांछित शुभ फ़लों में अत्यंत कमजोर उपलब्धि हो पाती है. अनुभव जन्य बात यह है कि एक केंद्र और एक त्रिकोण का अधिपति होने मंगल इस लग्न में अति शुभ हो जाता है एवम मंगल कितना ही कमजोर हो कर्क लग्न में अशुभ फ़ल बहुत कम ही दे पाता है.

शुक्र चतुर्थ और एकादश भाव का स्‍वामी है और चतुर्थेश होने के नाते यह माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि विषयों का एवम एकादशेश होने के कारण यह लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में शुक्र के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बुध द्वादश भाव का स्‍वामी होता है इस वजह से यह जातक की निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण का प्रतिनिधि होता है.
जन्‍मकुंडली या दशाकाल में बुध के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

बृहस्‍पति कर्क लग्न में षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होकर षष्ठेष बनता है जो कि जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.


शनि यहां सप्‍तम और अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है. सप्तमेष होने के कारण यह लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि एवम अष्टमेश होने के कारण व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में शनि के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु को कर्क लग्न में तॄतीयेश का दायित्व मिलता है जिस नाते यह कर्क लग्न के जातकों के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में राहु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु को कर्क लग्न में नवमेष होने का दायित्व मिला हुआ है जिस कारण यह कर्क लग्न के जातकों के धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में केतु के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मिथुन लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 60 डिग्री से 90 डिग्री तक के भाग को मिथुन राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय पर यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज में उदित होता हुआ दिखाई देता है , उस जातक का लग्‍न मिथुन माना जाता है. मिथुन लग्‍न की कुंडली में मन का स्‍वामी चंद्र द्वितीय यानि धन भाव का स्‍वामी होता है. द्वितियेश होकर यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह जैसे संदर्भों का प्रतिनिधि होता है. मिथुन लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले ये सारे संदर्भ ही होते है, यदि जन्मकुंडली या दशाकाल में चंद्र बलवान और शुभ हो तो जातक को इन संदर्भों के द्वारा संपूर्ण संतुष्टि मिलती है. पाप प्रभाव गत या कमजोर चंद्र के होने से वर्णित विषयों में न्यूनता एवम असंतुष्टि प्राप्त होती है.

समस्‍त जगत में प्रकाश बिखेरने वाला सूर्य तृतीय भाव का अधिपति होता है नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्‍व करता है. अपनी यश पताका फ़हराने के लिये मिथुन लग्‍न के जातक उपरोक्त संदर्भों के प्रचार प्रसार एवम मजबूत बनाने में प्रयास रत रहते हैं. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में सूर्य के बलवान और शुभ प्रभाव में रहने पर इन्हें इन विषयों का शुभ फ़ल प्राप्त होता है जबकि कमजोर एवम पाप प्रभाव गत सूर्य के कमजोर रहने पर उपरोक्त संदर्भों में इन्हें हानि उठानी पडती है.

मंगल षष्‍ठ और एकादश भाव का स्‍वामी होता है. षष्ठेश होने के नाते यह रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी और एकादशेश होने के नाते यह लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी जैसे संदर्भों का स्वामी होता है. मंगल का बलवान और शुभ प्रभावगत होना उपरोक्त विषयों में मिथुन लग्न के जातकों को शुभ फ़लदायक होता है एवम निर्बल एवम पाप प्रभावगत मंगल अशुभ फ़लदायी होता है.

शुक्र पंचम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है पंचमेष होने के नाते बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार जैसे विषयों और द्वादशेश होने के कारण निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, और व्यर्थ भ्रमण जैसे विषयों का प्रतिनिधि ग्रह होता है. जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में अगर शुक्र बलवान और शुभ प्रभाव में हो तो अति शुभ फ़ल प्रदान करता है. अगर कमजोर और पाप प्रभावगत हो तो इन फ़लों में अशुभ फ़ल ही मिलते हैं.

मिथुन लग्‍न में बुध प्रथम भाव का स्वामी होकर लग्नेश होता है जो कि रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व जैसे अति महत्व पूर्ण विषयों का प्रतिनिधि होता है. बलवान बुध की स्थिति इन विषयों में अति शुभ फ़ल प्रदान करती है जबकि कमजोर एवम पाप प्रभाव गत बुध होने से इन संदर्भों मे अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

मिथुन लग्‍न में बृहस्‍पति सप्‍तम भाव का स्‍वामी हो कर लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. शुभ और बलवान वृहस्पति इन विषयों में अति शुभ फ़ल देता है जबकि कमजोर और पाप प्रभाव गत गुरू इन फ़लों में अशुभता देता है.

मिथुन लग्‍न में शनि अष्‍टम और नवम भाव का स्‍वामी होता है अष्टमेश होने से यह व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख एवम नवमेष होने से यह धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. बलवान और शुभ प्रभाव वाला शनि बहुत शुभ फ़ल प्रदान करता है जबकि कमजोर या पाप प्रभाव गत शनि उपरोक्त वर्णित विषयों में अशुभ फ़ल प्रदान करता है.

राहु इस लग्न में चतुर्थ भाव का स्वामी होकर माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह जैसे विषयों का प्रतिनिधि ग्रह होता है. शुभ प्रभाव गत और बलवान राहु इन विषयों में अति शुभ फ़ल प्रदान करता है जबकि कमजोर एवम पाप प्रभाव वाला राहु अशुभ फ़लों का दाता होता है.

केतु को मिथुन लग्न में दशम भाव का स्वामित्व मिलता है और दशमेश होने की वजह से यह राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति जैसे विषयों का प्रतिनिधि होता है. अगर यह केतु बलवान हो कर शुभ प्रभाव गत हो तो इन विषयों के अति शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

वृष लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 30 डिग्री से 60 डिग्री तक के भाग को वृष राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म समय में यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज में उदित हुआ दिखाई देता है, उस जातक का लग्‍न वृष माना जाता है. वृष लग्‍न की कुंडली में मन का कारक ग्रह चंद्रमा तृतीय भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास इत्यादि का प्रतिनिधित्‍व करता है. इसलिए वृष लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले ये सभी कार्य ही होते है. जन्‍मकुंडली एवम दशाकाल में चंद्र के शुभ रहने पर उपरोक्त वर्णित संदर्भों में जातक को शुभ फ़ल मिलकर वृष लग्‍न के जातक का मन प्रसन्न रहता है. यदि जन्‍मकुंडली या दशाकाल में चंद्र के कमजोर अथवा पाप प्रभाव में रहने पर उपरोक्त संदर्भों में अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं और जातक को मानसिक क्लेश की प्राप्ति होती है.

प्रकाश पुंज सूर्य वॄष लग्न में चतुर्थ भाव का स्‍वामी हो कर यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह इत्यादि संदर्भों का प्रतिनिधित्‍व करता है. जातक अपने नाम यश और कीर्ति के लिये चतुर्थ भाव के संदर्भों का उपयोग करता हैं. वॄष लग्न के जातकों का अपने नाम यश, कीर्ति प्रसिद्धि के लिए इनका सर्वाधिक ध्‍यान उपरोक्त वर्णित संदर्भों में लगा होता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में सूर्य के शुभ और बलवान रहने से जातक की कीर्ति यश फ़ैलकर बडे शुभकारी फ़ल प्राप्त होते हैं और सूर्य के कमजोर और पाप प्रभाव में रहने पर से उपरोक्त वर्णित संदर्भों में कमी से इनकी यश कीर्ति में कमी होती है.

सप्‍तम और द्वादश भाव का स्‍वामी वृष लग्‍न में मंगल होता है. सप्तमेश होने के नाते यह जातक के घर गृहस्‍थी सहित लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार इत्यादि का कारक होता है और द्वादशेश होने के नाते यह खर्च का प्रतिनिधित्‍व करता है. जाहिर है इस लग्‍न के जातकों के घर गृहस्‍थी (सप्तम भाव) के वातावरण में खर्च (द्वादश भाव) की अहम भूमिका होती है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में मंगल के बलवान एवम शुभ प्रभाव में रहने पर वृष लग्‍न वाले जातक की खर्च शक्ति की योग्यता बढने से से घर गृहस्‍थी के कार्य कार्यान्वित करने में सुख और सहजता प्राप्त होती है. यदि जन्‍मकुंडली या दशाकाल में मंगल कमजोर हो अथवा पाप प्रभाव में हो तो जातक की खर्च शक्ति की कमी के कारण घर गृहस्‍थी का वातावरण कष्‍टमय हो जाता है.

शुक्र प्रथम और षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है. लग्नेश होने के कारण यह जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधि होता है. तथा षष्ठेष होने के कारण जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी जैसे सभी प्रकार के संदर्भों का प्रतिनिधित्‍व करता है. इन दोनों ही भावों का वृष लग्‍न के जातक के स्‍वास्‍थ्‍य और आत्‍म विश्‍वास से अति गहन संबंध होता है. जन्‍मकुंडली अथवा दशाकाल में शुक्र के शुभ प्रभाव व बलवान होने पर हर प्रकार से शरीर व स्वास्थ्य का लाभ होता है एवम वर्णित संदर्भों में शुभ फ़ल मिलकर जातक का आत्मविश्वास बढा हुआ होता है. इसके विपरीत जन्‍मकुंडली या दशाकाल में शुक्र के कमजोर या पाप प्रभाव में रहने पर उपरोक्‍त वर्णित विषयों में परेशानी पैदा होकर इनके स्‍वास्‍थ्‍य मे परेशानी एवम आत्‍म विश्‍वास में कमजोरी बनी रहती है.

बुध द्वितीय भाव का स्‍वामी होकर यह जातक के कुल, कुटुंब, विद्या, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्‍व करता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल बुध के शुभ प्रभाव में रहने पर वॄष लग्न के जातकों को उपरोक्त वर्णित विषयों में सहजता और शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं. जबकि इसके विपरीत बुध कमजोर या पाप प्रभावगत हो तो , उपरोक्त वर्णित संदर्भों में न्यूनता औए कठिनाईयो का सामना करना पडता है.

बृहस्‍पति अष्‍टम भाव का स्‍वामी होकर व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख का प्रतिनिधित्व करता है. जन्‍मकुंडली अथवा दशाकाल में बृहस्‍पति के बलवान एव शुभ प्रभाव में रहने पर उपरोक्त वर्णित विषयों में शुभ फ़लों की प्राप्ति होती है इसके विपरीत पाप प्रभाव एवम कमजोर वॄहस्पति के कारण इन फ़लों के विपरीत फ़ल प्राप्त होते हैं.

शनि नवम और दशम जैसे दो महत्वपूर्ण भावों का स्‍वामी होता है. यह नवमेश होने के नाते जातक के धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. एवम दशमेश होने के नाते यह राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति जैसे संदर्भों का प्रतिनिधी होता है. ये दोनों ही भाव वॄष लग्न के जातकों के धार्मिक, राजनैतिक सामाजिक जीवन में अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं. जन्मकुंडली या दशाकाल में शनि के बलवान व शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त वर्णित विषयों एवम मुख्यत भाग्य और कर्म से संबंधित अत्यधिक शुभ व सकारात्मक फ़लों की प्राप्ति होती है इसके विपरीत कमजोर व पाप प्रभाव में होने पर इन विषयों में अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

राहु पंचम स्थान का स्वामी होकर पंचमेश बनता है और एक अत्यधिक महत्वपूर्ण त्रिकोण का स्वामी बनता है. और जीवन के अति महत्वपूर्ण विषयों जैसे बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार का प्रतिनिधित्व करता है. जन्मकुंडली अथवा अपने दशाकाल में बलवान और शुभ प्रभाव गत राहु उपरोक्त विषयों में अत्यधिक शुभ फ़ल प्रदान करता है जबकि कमजोर एवम पाप प्रभाव गत राहु इन विषयों में न्य़ुनता देकर अशुभ फ़ल ही अधिक देता है.

केतु एकादश भाव का स्वामी होकर जातक के लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि भावों का प्रतिनिधि होता है. जनम्कुंडली मे अथवा अपने दशाकाल में बलवान व शुभ प्रभाव गत राहु अत्यंत शुभ फ़ल देकर सभी तरह से आमदनी बनाये रखता है वहीं कमजोर एवम अशुभ प्रभाव गत केतु उपरोक्त फ़लों में कमी करके अशुभ फ़ल प्रदान करता है.

मेष लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 0 डिग्री से 30 डिग्री तक के भाग को मेष राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म के समय यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है , उस जातक का लग्‍न मेष माना जाता है.

मेष लग्‍न में मन का स्‍वामी चंद्र चतुर्थ भाव का अधिपति (चतुर्थेश) होता है एवम यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह को अभिव्यक्त करता है. जन्‍मकुंडली अथवा दशाकाल में चंद्रमा के कमजोर/बलशाली होने से ऊपर बताये गये विषयों के सुख दुख की प्राप्ति होती है. इन सब के लिये चंद्र्मा के साथ साथ अन्य ग्रहों की युति एवम दॄष्टि का भलिभांति अध्ययन कर लेना चाहिये.

प्रकाश फ़ैलाने वाला सूर्य पंचम भाव का स्‍वामी (पंचमेश) होता है. जातक के बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार को अभिव्यक्त करता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में सूर्य की अच्छी बुरी स्थिति अनुसार ही इन फ़लों की न्यूनाधिकता रहती है. भलिभांति सूर्य की स्थिति का अध्ययन करके इन बातों का जातक कितना लाभ ले सकेगा, यह पता लगता है. सूर्य बली हो तो अच्छे फ़लों में वॄद्धि होती है और कमजोर सुर्य इन फ़लों में कमी उत्पन्न करता है.

मंगल प्रथम और अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है. यह लग्नेश होने के नाते जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधि होता है. मेष लग्न में अगर मंगल बलशाली हो तो समस्त कुंडली में शुभ फ़ल अधिक प्राप्त होते हैं, बलवान और शुभ मंगल फ़लों में वॄद्धिकारक होता है जबकि कमजोर मंगल इन फ़लों में न्यूनता पैदा करता है.

लग्नेश के साथ साथ मेष लग्न में मंगल अष्ट भाव का प्रतिनिधि यानि अष्टमेश भी होता है. अष्टमेश होने नाते मंगल, व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि का भी प्रतिनिधि है. इन समस्त फ़लों के बारे में मंगल की स्थिति का अध्ययन करके ही जाना जा सकता है. मेष लग्न में मंगल लग्नेश होकर अष्टमेश है इसलिये उसे अष्टमेश होने का दोषी नही माना जाता, अगर मंगल शुभ और बलि हो तो मेष लग्न में शुभ फ़लों की अतिशय वॄद्धि ही करता है. अशुभ अथवा नीच, कमजोर होने से किंचित अशुभ फ़ल भी प्रदान करता है.

शुक्र द्वितीय और सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है , यहां शुक्र की स्थिति का भलिभांति अध्ययन कर लेना चाहिये. क्योंकि शुक्र यहां द्वितियेश होने के नाते धन और कुटुंब का प्रतिनिधि है और सप्तमेष होने से जीवन के एक प्रमुख भाव यानि विवाह का भी प्रतिनिधि है.

कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब एवम विद्या के मामले यहां द्वितियेश होने के कारण शुक्र के अधीन है, बलि और शुभ प्रभाव वाला शुक्र इन फ़लों में वॄद्धि करेगा और हीनबलि व कमजोर शुक्र इन मामलों में न्यूनता प्रदान करेगा.

लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार इत्यादि के मामले मेष लग्न में सप्तमेष होने के नाते शुक्र के अधीनस्थ होते हैं. शुभ और बलवान शुक्र इन फ़लों में अतिशय शुभ फ़लकारी होता है और कमजोर और पाप प्रभाव वाला शुक्र इन मामलों में न्यूनता देता है.

बुध, मेष लग्न में तृतीय भाव का स्‍वामी यानि तॄतीयेश होता है. यहां बुध नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. शुभ और बलवान बुध यहां शुभ फ़लों का वॄद्धिकारक होता है जबकि कमजोर और पाप प्रभाव वाला बुध इन फ़लों में कमी और अशुभता प्रदान करता है.

बृहस्‍पति नवम भाव का स्‍वामी यानि नवमेश होता है. इस लग्न मे धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि का प्रतिनिधि वॄहस्पति यानि गुरू होता है. शुभ और बलवान वॄहस्पति की स्थिति मेष लग्न के जातको को वर्णित फ़लों की अतिशय शुभकारक प्राप्ति करवाता है जबकि हीनबलि और पाप प्रभाव वाला गुरू जैसा शुभ ग्रह भी इन फ़लों को देने में असमर्थ होता है.

शनि दशम (दशमेश) और एकादश भाव (एकादशेश) का अधिपति होता है. दशमाधिपति होने के नाते राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. एवम एकादश भाव का प्रतिनिधि होने के नाते लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि विषय का प्रतिनिधि होता है.

बलि और शुभ प्रभाव वाला शनि उपरोक्त विषयगत फ़लों में शुभ और कमजोर व पाप प्रभाव वाला शनि अशुभ फ़ल प्रदान करता है.

राहु षष्ठ भाव का अधिपति यानि षष्ठेश होता है. रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि के फ़लों का दायित्व राहु पर होता है. अगर राहु शुभ प्रभाव युक्त हो तो शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं और अशुभ प्रभाव वाले राहु की वजह से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु बारहवें भाव का अधिपति यानि द्वादशेश होता है. निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण इत्यादि विषयों का दायित्व केतु पर होता है. अगर केतु शुभ प्रभाव युक्त हो तो अत्यंत शुभ प्राप्त होते हैं और अशुभ और पाप प्रभाव युक्त केतु के अतिशय अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

स्मरण रहे कि युं तो जन्मकुंडली के सभी ग्रह अपनी शुभता अशुभता का फ़ल जीवन पर्यन्त ही देते रहते हैं किंतु अपनी दशा अंतर्दशा में संपूर्ण रूप से प्रभावी होकर शुभ अशुभ फ़लों के दाता बनते हैं.

मेष लग्न (कालपुरूष) की कुंडली का अध्ययन (पाठ - 4)

मेष लग्‍न की कुंडली ही कालपुरूष की कुंडली मानी गई है और सारे ज्योतिषिय फ़लित का आधार भी यही है. ज्योतिष को जानने समझने के लिये हमें कालपुरूष की कुंडली को समझना अति आवश्यक है. आईये कालपुरूष यानि मेष लग्न की कुंडली का यहां विचार करते हैं.

धरती के घूमने के फलस्‍वरूप आसमान के 360 डिग्री पूर्व दिशा से पश्चिम दिशा की ओर जाती हुई पट्टी को बारह भागों में बांटने से तीस तीस डिग्री की कुल बारह राशियां बनी हैं. आप इन्हें पॄथ्वी की कक्षा को जानने समझने के लिये माईल स्टोन की तरह भी समझ सकते हैं.

कुंडली का अध्ययन करने के लिये लग्न अति महत्वपूर्ण होता है तत्पश्चात चंद्रलग्न और सूर्यलग्न का महत्व है. यह लग्न क्या है? जातक के जन्‍म समय पर पूर्वी क्षितिज में जो राशि उदय हो रही हो , उसे ही लग्‍न कहते हैं. 24 घंटे में एक के पश्चात एक ये 12 ही लग्न आते हैं. और इन बारह लग्‍न मे जो भी पूर्वी क्षितिज की उदय होती हुई राशि जन्म समय में होती है वही जातक का लग्न होता है. एक लग्न तकरीबन दो घंटे तक रहता है. जातक का जन्‍म जिस लग्‍न में हुआ होता है , उसी अनुरूप उसकी कुंडली के ग्रहों का अध्ययन करके उसके भावी जीवन के सभी संदर्भों के बारे में भविष्य वाणी की जा सकती है.

पॄथ्वी की कक्षा की 360 डिग्री के प्रथम भाग यानि आकाश के 0 डिग्री से 30 डिग्री तक के हिस्से को मेष राशि के रूप में जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म के समय यह राशि आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होती दिखे तो उस जातक लग्‍न मेष माना होता है. मेष लग्‍न की कुंडली इस जगत और मानव जाति को संपूर्ण रूप से अभिव्यक्त करती है. एवम फ़लित ज्योतिष में इसको समझे बिना सटीकता से फ़ल कथन करना असंभव है. इसकी महता को समझने के लिये निम्न बिंदू विचारणीय हैं.

मेष लग्‍न की कुंडली के अनुसार मन का स्‍वामी चंद्र चतुर्थ भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक की माता, संपत्ति, भूमि, भवन, प्रेम और स्‍थायित्‍व को प्रतिनिधित्‍व करता है. मनुष्य के मन को पूर्ण रूप से संतुष्‍ट कर सकने वाली जगह माता , मातृभूमि , छोटी या बडी संपत्ति, प्रेम एवम स्‍थायित्‍व ही होता है. क्योंकि इनके अभाव में जातक कदापि सुखी नहीं हो सकता.

इस कुंडली में समस्‍त जगत को प्रकाशमान रखने वाला सूर्य पंचम भाव का स्‍वामी बनता है एवम यह जातक की बुद्धि , ज्ञान और संतान का प्रतिनिधि होता है. मनुष्य भी अपनी बुद्धि, ज्ञान एवम समझ के बल पर या सुयोग्‍य संतान के बल पर ही सारी दुनिया में रोशनी फैलाने में सक्षम होता हैं, जबकि बुद्धि एवम ज्ञान के अभाव में या अयोग्‍य संतान समस्त दुनियां को दिशाहीन कर देती है. इसलिये इस भाव का मानव जीवन में अति महत्वपूर्ण स्थान होता है.

इसके बाद मंगल प्रथम एवम अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता हुआ जातक के शरीर और जीवन का प्रतिनिधि होता है. शरीर की देखभाल, मजबूती देने के लिए तथा स्‍वास्‍थ्‍य के लिए मानव को जीवनशैली को सुव्‍यवस्थित बनाए रखना होता है. स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा और नीरोग हो तो जीवन के सही होने की एवम स्‍वास्‍थ्‍य बुरा हो तो जीवन के बिगडने की संभावना ही अधिक बनती है. जीवनशैली गडबड हो तो स्‍वास्‍थ्‍य के खराब रहने की तथा जीवनशैली ठीक हो तो स्‍वास्‍थ्‍य के अच्‍छे बने रहने की संभावना बलवती होती है.

शुक्र द्वितीय और सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है जो कि जातक के धन कोष तथा दापंत्य/गृहस्‍थी का स्वामी होता है. मनुष्य को गृहस्‍थी के लिए धन की तथा धन की व्‍यवस्‍था के लिए गृहस्‍थी की आवश्‍यकता पडती है, यानि दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं. साधन और संपन्‍नता हो तो गृहस्‍थी की गाडी भली प्रकार दौडती है , जबकि धन के अभाव में घर गृहस्‍थी का वातावरण खराब रहता है. इसी प्रकार जीवनसाथी के साथ सहयोग से आर्थिक स्थिति और अधिक मजबूत होती है, जबकि ऐसा नही होने पर आर्थिक स्थिति में कमजोरी ही दिखाई देती है. वर्तमान युग में तो पति पत्नि दोनों ही कामकाजी होने से ये दोनों ही बाते भली प्रकार समझी जा सकती हैं.

बुध तृतीय और षष्‍ठ भाव का स्‍वामी है और यह जातक के भाई बंधु, झंगडा एवम प्रभाव से संबंधित मामलों का स्वामी होता है. मनुष्य के जीवन में भाई, बंधुओं के बीच झंझट झगडे होने की अतिशय संभावना बनी ही रहती है एवम किसी भी झंगडे को निपटाने के लिये भाई बंधुओं का सहयोग भी अति आवश्‍यक होता है. अगर जातक के भाई बंधुओं की स्थिति मजबूत होकर वो सक्षम हों तो कई प्रकार के झंझट विवादों को निपटाने में वे प्रभाव का उपयोग करके मददगार भी हो सकते हैं. अगर यह कमजोर हो तो न तो झंझट झगडे निपटते हैं और ना ही प्रभाव में कोई बढोतरी होने की संभावना बनती है. जिसके पास झंझट झगडे निपटाने की ताकत मौजूद हो तो उन्‍हें भाई बंधुओं की कभी कमी भी नहीं रहती.

बृहस्‍पति यानि गुरू नवम और द्वादश भाव का अधिपति होता है एवम यह जातक के धर्म, भाग्य, खर्च और बाहरी संदर्भों को अभिव्यक्त करता है. मानव जीवन में भाग्‍य और खर्च का पारस्‍परिक अदभुत संबंध होता है. जातक भाग्‍य की मजबूती की वजह से खर्च करने की शक्ति या बाहरी संदर्भों की श्रेष्ठता प्राप्‍त करते हैं एवम खर्च करने की शक्ति या बाहरी संदर्भों की प्रबलता से भाग्‍य भी प्रबल होता हैं. अगर भाग्‍य कमजोर हो तो खर्च शक्ति या बाह्य संदर्भों में न्य़ुनता और खर्च करने की शक्ति न्यून हो तो भाग्‍य भी निर्बल होता है.

शनि दशम और एकादश भाव का होकर यह जातक के पिता पक्ष , प्रतिष्‍ठा पक्ष और सर्व प्रकार के लाभ को अभिव्यक्त करता है. मानव जीवन में पिता पक्ष और लाभ का आपस में संबंध होता है. यह कोई बताने वाली बात नही हैं कि एक बच्‍चे को समाज में पहचान पिता के नाम से ही मिलती है, पिता के स्‍तर के अनुरूप ही उसे पद और प्रतिष्‍ठा मिलती है तदनुरूप ही उसके लाभ का माहोल होता है. इसे यूं भी कहा जा सकता है कि लाभ के वातावरण के दॄढ होने पर ही किसी जातक को समाज में प्रतिष्‍ठा मिल पाती है और प्रतिष्‍ठा मिल जाने पर लाभ प्राप्ति का वातावरण और अधिक मजबूत बन जाता है.

भावों के नाम व कारकत्व (पाठ – 3)


इस आलेख में हम आपका परिचय भावों  के नाम से, उनके पर्यायवाची शब्दों से व उनके द्वारा ज्ञात किये जा सकने वाले विषयों से   करवा रहे हैं.  जिज्ञासु पाठक इस आलेख में अभिव्यक्त किये गये पर्यायवाची शब्दों और कारकत्व (भावों से ज्ञात किये जा सकने वाले विषय) को अच्छी तरह ध्यान में ले ले, जिससे आगे के पाठ समझने में आसानी रहेगी.



भावों के नाम अंग्रेजी नाम पर्यायवाची संस्कृत शब्द कारकत्व
प्रथम House of
Ascendant
लग्न, उदय, आद्य,तनु,
जन्म, विलग्न, होय
शरीर का वर्ण, आकृति, लक्षण, यश, गुण, स्थान, सुख दुख, प्रवास, तेज बल
द्वितीय 2nd House स्व कुटुंब, वाणी, अर्थ, मुक्ति, नयन धन, नेत्र, मुख, विद्या, वचन, कुटुंब, भोजन, पैतॄक धन,
तॄतीय 3rd House पराक्रम, सहोदर, सहज,
वीर्य, धैर्य,
भ्राता, पराक्रम, साहस, कंठ, स्वर, श्रवण, आभरण, वस्त्र, धैर्य, बल, मुल, फ़ल.
चतुर्थ 4th House सुख, पाताल, मातृ, विद्या, यान, यान,  बंधु, मित्र, अंबु विद्या, माता, सुख, गौ, बंधु, मनोगुण, राज्य, यान, वाहन, भूमि, गॄह, हॄदय
पंचम 5th House बुद्धि, पितॄ, नंदन, पुत्र, देवराज, पंचक देवता, राजा, पुत्र, पिता, बुद्धि, पुण्य, यातरा, पुत्र प्राप्ति, पितृ विचार (सूर्य से)
षष्ठ 6th House रोग, अंग, शस्त्र, भय, रिपु, क्षत,
रोग, श्त्रु, व्यसन, व्रण, घाव (मंगल से भी विचारणीय),
सप्तम 7th House जामित्र, द्यून, काम, गमन, कलत्र, संपत,
अस्त.
संपूर्ण यात्रा, स्त्री सुख, पुत्र विवाह (शुक्र से भी विचारणीय)
अष्टम 8th House आयु, रंध्र, रण, मॄत्यु, विनाश, आयु (शनि से भी विचारणीय)
नवम 9th House धर्म, गुरू, शुभ, तप, नव, भाग्य, अंक. भाग्य, प्रभाव, धर्म, गुरू, तप, शुभ (गुरू से भी विचारणीय)
दशम 10th House
Mid-Heaven
व्यापार, मध्य, मान, ज्ञान, राज, आस्पद, कर्म, आज्ञा, मान, व्यापार, भूषण, निद्रा, कॄषि, प्रवज्या, आगम, कर्म, जीवन, जिविका, वृति, यश, विज्ञान, विद्या,
एकादश 11th House भव, आय, लाभ संपूर्ण धन प्राप्ति, लोभ, लाभ, लालच, दासता
द्वादश 12th House व्यय, लंबा सफ़र, दुर्गति, कुत्ता, मछली, मोक्ष, भोग, स्वप्न, निद्रा,  (शनि राहु से भी विचारणीय)

राशियों के नाम एव उनके स्वामी (पाठ - 2)


इस आलेख में सभी राशियों के प्रचलित नाम, अंग्रेजी नाम, उनके स्वामियों  एवम राशियों के वर्ण के बारे में  बता रहे हैं. निम्न चार्ट में जो प्रतीक चिन्ह लिखे हैं वो जन्म कुंडली के खानों में इन्ही राशियों के नाम का संकेत होता है.



राशि नाम प्रतीक
चिन्ह
अग्रेजी नाम राशि स्वामी राशि वर्ण
मेष 1 Aries (Ram) मंगल क्षत्रिय
वॄष 2 Taurus (Bull) शुक्र वैष्य
मिथुन 3 Gemini (Twins) बुध शुद्र
कर्क 4 Cancer (Crab) चंद्र्मा ब्राह्मण
सिंह 5 Leo (Lion) सूर्य क्षत्रिय
कन्या 6 Virgo (Virgin) राहु वैष्य
तुला 7 Libra (Scale) शुक्र शुद्र
वॄष्चिक 6 Virgo (Virgin) मंगल ब्राह्मण
धनु 7 Libra (Scale) गुरू क्षत्रिय
मकर 10 Capricorn
(Crocodile)
शनि वैष्य
कुंभ 11 Aquarius
(Watercarrier)
शनि शुद्र
मीन 12 Pisces (Fishes) केतु ब्राह्मण

ग्रहों के नाम (पाठ -1)


ज्योतिष ज्ञान प्राप्त करने के लिये सर्वप्रथम ग्रहों के नाम और उनके पर्याय शब्द जानना अति आवश्यक है. इस आलेख में जानिये कि ग्रहों के प्रचलित नाम, अंग्रेजी नाम, अरबी,फ़ारसी एवम संस्कॄत में उनके क्या क्या नाम हैं?






ग्रहों के
प्रचलित
नाम
अंग्रेजी
नाम
अरबी
फ़ारसी
नाम

प्रयायवाची संस्कृत नाम
सूर्य Sun शम्स
आफ़ताब
फ़ारसी
खुरशेद
आदित्य, अहस्कर, अर्क, अर्यमा, अरूण, अहर्पति, अंशुमाली, अब्जिनीपति, इन, ईषांपति, उष्णरश्मि, कर्मसाक्षी, भग, भानु, भास्वत, रवि, लोकबंधु, विभाकर, विभास्वत, विवस्वान, सूर, सविता, सहस्त्रांशु, सप्ताश्व, ग्रहपति, ग्रहराज, चंडाशु, चित्रभानु, छायानाथ, जगचक्षु, तमिस्रहा, तेजसारांशि, तरणि, तपन, दिवाकर, द्युमणि, त्रयीतनु, दिनकर, दिनमणी, दिनेश, दिनकृत, धामनिधि, प्रभाकर, पूषण, पदमाक्ष, पतंग, हेलि, हरिदश्व, हंस, द्वादशात्म, भास्कर, मार्तंड, मिहिर, मित्र, दीप्तरश्मि.
चंद्रमा Moon कमर
फ़ारसी
माह
अब्ज, इंदु, कलानिधि, कुमुदबांधव, ग्लौ, चंद्र,
जैवातॄक, छपाकर (क्षपाकर), नक्षत्रेष, द्विजराज, निशाकर, निशापति, मॄगांक, मयंक, पर्व, रजनीश, राकेश, सोम, शुभ्रांशु, सुधांशु, मनोज, विधु, सुधाकर, शशधर, शीतरश्मि, शशि, शशांक, हिमगु, तारेश, तारापति, उडुपति, शीतांशु, हिमकर, हिमांशु,
मंगल Mars मरीक
मर्रीख
फ़ारसी
बेहराम
अंगारक, आवनेय, कुज, अवनीज, क्षितिज, लोहितांग, वक्र, भूसुत, भौम, क्रूरद्रूक, कृरनेत्र, धराज, क्षितिनंदन.
विशेष : – पॄथ्वी के पर्यायवाची शब्दों में सुत, पुत्र या नंदन जैसे शब्द जोडने पर सभी शब्द मंगल के पर्यायवाची शब्द बनेंगे.
बुध Mercury उतारद
फ़ारसी
तीर
इंदुसुत, चंद्रपुत्र, चांद्रि, चंद्रात्मज, वित, सौम्य, रोहिणेय, शांत, श्यामगाव, अतिदीर्घ, हेम्न, तारातनय, तारासूनु,
विशेष :- चंद्रमा के पर्यायवाची शब्दों के साथ
पुत्र, तनय, इत्यादि शब्दों के जोड से बने सभी बुध के पर्यायवाची शब्द होंगे.
गुरू Jupiter मुश्तरी

फ़ारसी
अहुरम-
क्रद
आंगिरस, अंगिरा, आर्य, इज्य, गीष्पति, जीव, चित्रशिखंडिज, ढिषन, गुरु, सुराचार्य, त्रिदिवेशबंद्य, देवगुरू, प्रशांत, सुरगुरू, वाचस्पति, वॄहस्पति.
शुक्र Venus जुहरी
फ़ारसी
नाहीद
असुरपुजित, दानवेज्य, काण, अच्छ, दैत्यगुरू, भार्गव, भॄगु, भॄगुसुत, भृगु, भार्गव.
शनि Saturn जुहुल

फ़ारसी
केदवान
नील, सौरि, अर्कपुत्र, पंगु, यम, सूर्यपुत्र, सूर्यसुनु, शनैश्चर, मांदि, छायात्मज, मंद, कोण, आर्कि, असित, भास्करी, रविज,

विशेष :- सूर्य के पर्यायवाची शब्दों के साथ सुत, पुत्र इत्यादि शब्द जोदने से सभी शनि के पर्यायवाची शब्द बनेंगे.
राहु Dragons
Head (Node)
रास आगव, फ़णि, सर्प, दीर्घ, असुर, कपिलास, कॄष्णांग, अभि, सैहिकेय, विधुन्तुद, अंगु, तम.
केतु Dragons
Tail (Node)

जनब

सहुपुच्छ, शिखि, ध्वज.



विशेष :- मंगल को भूमिसुत, बुध को चंद्रसुत और शनि को सूर्यपुत्र माना जाता है, इसी प्रकार सूर्य को ग्रहपति, चंद्रमा को तारापति (नक्षत्र), वॄहस्पति को इंद्रादि देवताओं का गुरू तथा शुक्र को दैत्य गुरू माना गया है.