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शनि की साढे साती एवम अढैया


साढेसाती क्या है ?
सढेसाती वह समय है, जब जीवनकाल में जन्मराशि अर्थात चन्द्रराशि से शनि 12वें स्थान पर आता है. शनि एक राशि में लगभग अढाई वर्ष रहता है. जब शनि 12वें स्थान पर आता है तो साढेसाती आरम्भ होती है और जब जन्म अर्थात चन्द्रराशि से दूसरे स्थान से निकलता है तो यह समाप्त होती है. तीन राशियों में शनि का कुल समय साढे 7 वर्ष बनता है, इसलिए इसे साढेसाती कहा जाता है. शनि समस्त 12 राशियों के चक्र को 30 वर्ष की अवधि में पूर्ण करता है. इस तरह किसी भी व्यक्ति के जीवन में साढेसाती अधिकतम कुल तीन बार ही आ सकती है.

साढेसाती का प्रभाव एवं फल
जब भी कोई ज्योतिषी व्यक्ति को यह बताता है कि उसकी साढेसाती आरम्भ हो गई है तो साधारण व्यक्ति का मनोबल यह सुनते ही गिर जाता है. वह तुरन्त सोचने लगता है कि अब उसपर दु:खों, मुसीबतों तथा कठिनाईयों का पहाड टूट पडेगा, क्योंकि साढेसाती सम्बन्धी साधारण लोगों के मन में कुछ इसी प्रकार की गलत धारणा, शंका एवं भय पाया जाता है. जिसका मुख्य कारण अधकचरे ज्योतिषियों द्वारा लोगों के मन में साढेसाती सम्बन्धी अशुभ प्रभावों की बडी ही भयानक तस्वीर निर्मित कर दी गई है. ताकि जहाँ ओर साढेसाती की आड लेकर अपनी ज्योतिषीय अज्ञानता पर पर्दा डाला जा सके और दूसरे इसके जरिये साधारण जनता के भय का दोहन भी किया जाता रहे. यही कारण है कि जब कोई आम व्यक्ति किसी कष्ट, परेशानी, संकट में फंस जाता है तो वो यही समझने लगता है कि उसकी साढेसाती आरम्भ हो गई है. अब चाहे वो हुई हो या नहीं. चाहे उसके पीछे उसका अपना ही कोई कार्मिक दोष अथवा जन्मकुंडली में प्रतिकूल ग्रहदशा ही कारण क्यों न हो, लेकिन उसके मन में यही विचार आता है कि जरूर उसे शनि की साढेसाती लग गई है. यह साढेसाती के नाम पर फैलाये गये भ्रम और भय का ही परिणाम है. पंडितों द्वारा साढेसाती का हौव्वा दिखलाकर तरह-तरह के दान-पुण्य एवं उपाय बतला अथवा करवा दिए जाते हैं, जिसके कि बेचारा एक आम व्यक्ति ओर भी अधिक चक्रव्यूह में फँस जाता है.

यद्यपि, साढेसाती के कुछ समय में, कुछेक जातकों पर कुप्रभाव होते हैं, जैसे किसी भीषण शारीरिक व्याधि का होना, माता-पिता अथवा जीवनसाथी से मतभेद, रोजगार में नुक्सान, उन्नति में बाधा अथवा अन्य किसी प्रकार की चिन्ता, हानि, परेशानी आदि-------परन्तु जितना इसका दु:ष्प्रभाव होता नहीं, उससे कहीं अधिक लोगों के मन में इसका भय पैदा कर दिया गया है. अत: साढेसाती आरम्भ होने पर किसी प्रकार के भय की कोई आवश्यकता नहीं बल्कि इस अवधि में स्वयं को समझने एवं आत्मबल को सशक्त बनाने का सुअवसर समझना चाहिए तथा इसके शुभ प्रभावों के सम्बन्ध में ही विचार करना चाहिए. यह सदैव स्मरण रखने की आवश्यकता है कि जन्मकुंडली में जब कोई ग्रह बुरे स्थान पर आता है तो कोई न कोई शुभ ग्रह भी बचाव हेतु शुभ स्थान पर आ विराजमान होता है. तभी तो कहा गया है कि मारने वाले से बचाने वाला सदैव बलवान होता है. इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ही शनि की साढेसाती के शुभ/अशुभ प्रभाव बारे विचार करना चाहिए....
अलग अलग राशियों पर पडने वाला शनि की साढेसाती का प्रभाव

जन्म राशि


साढेसाती का प्रभाव

मेषमध्य के अढाई वर्ष अशुभ
वृषआरम्भिक अढाई वर्ष अशुभ
मिथुनअन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
कर्कअन्तिम 5 वर्ष अशुभ
सिँहप्रथम 5 वर्ष अशुभ
कन्याआरम्भिक अढाई वर्ष अशुभ
तुलाअन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
वृश्चिकअन्तिम 5 वर्ष अशुभ
धनुप्रारम्भिक 5 वर्ष अशुभ
मकरअन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
कुम्भअन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
मीनअन्तिम अढाई वर्ष अशुभ

अनिष्ट ग्रहों के कारण और निवारण


मानव जीवन पल-प्रतिपल ग्रहों से संचालित होता है और समस्त ग्रह आकाशमंडल में निरन्तर अपनी धुरी पर घूमते हुए निर्दिष्ट समय में सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते रहते हैं. चन्द्र से लेकर शनि पर्यन्त किसी भी ग्रह की अपनी स्वयं की किरणें या रश्मियाँ न होकर वो आत्मकारक सूर्य से प्रकाश ग्रहण करता है और फिर उसे पृथ्वी सहित आकाशमंडल में चारों ओर न्यूनाधिक रूप में फैला देता है. इस समूचे चराचर जगत में ग्रहों की रश्मियों का अभाव या अधिकता ही दुर्योग का कारण बनता है. इसलिए इन समस्त ग्रहों का उचित अनुपात ही मानव जीवन की श्रेष्ठता के लिए आवश्यक है. सूर्यादि इन नवग्रहों में से किसी एक ग्रह की दुर्बलता भी मानव जीवन की अपूर्णता ही कही जाएगी.
ग्रहों के इस उतार-चढाव को सामान्य रूप में लाने के लिए ग्रहों के निवारण एवं देवोपासना का स्वरूप यहाँ आप लोगों के कल्याण हेतु यहाँ प्रस्तुत है :--

सूर्य:- न केवल ज्योतिष अपितु सम्पूर्ण ब्राह्मंड में ही सूर्यदेव अपना सर्वोप्रमुख स्थान रखते हैं. ज्योतिषशास्त्र जहाँ ग्रहों की दृश्य-स्थिति का निर्देशक हैं, वहीं सूर्य इन समस्त ग्रहों एवं सम्पूर्ण जगत का पालनकर्ता है, जिन्हे नक्षत्रों एवं ग्रहों का राजा भी कहा जाता है. यह जीवों की आत्मा का अधिष्ठाता है. अत: व्यक्ति का आत्मबल इसी ग्रह से देखा जाता है. अगर किसी व्यक्ति का सूर्य अनिष्ट हो तो उसे जीवन में ह्रदय रोग, उदर सम्बन्धी विकार, नेत्र रोग, धन का नाश, ऋण का बोझ बढ जाना, मानहानि, अपयश, संतान सुख में कमी एवं ऎश्वर्य-नाश आदि दुष्फलों का सामना करना पडता हैं. ऎसे में व्यक्ति को सूर्य नमस्कार, सूर्य पूजा, हरिवंशपुराण आदि का पाठ करना चाहिए.

चन्द्रमा:- न केवल मनुष्य अपितु संसार के समस्त प्राणियों की देह में मन ही वह एकमात्र वस्तु है, जिसमें आगे भविष्य की सभी सम्भावनाओं के अंकुर विद्यामान रहते हैं. इसी मनतत्व का कारक ग्रह है---चन्द्रमा. कहा भी गया है कि 'चन्द्रमा मनसो जात:" अर्थात चन्द्रमा ही मन की शक्तियों का अधिष्ठाता है. अगर व्यक्ति की जन्मकुंडली में चन्द्रमा निर्बल अथवा अन्य किसी प्रकार से अनिष्ट प्रभाव में हो तो मानसिक रूप से तनाव, दुर्बल मन:स्थिति, शारीरिक एवं आर्थिक परेशानी, छाती-फेफडे संबंधी रोग-बीमारी, माता को कष्ट, सिरदर्द आदि जीवन में कष्टकारी स्थितियाँ निर्मित होती हैं. ऎसे में व्यक्ति को अपनी कुलदेवी या देवता की उपासना करनी चाहिए. नि:संदेह लाभ मिलेगा और कष्टों से मुक्ति प्राप्त होगी.

मंगल:- मंगल ग्रह ऋषि भारद्वाज कुलोत्पन्न ग्रह है, जो कि क्षत्रिय जाति, रक्तपूर्ण एवं पूर्व दिशा का अधिष्ठाता है. जिन व्यक्तियों का जन्मकुंडली में मंगल अच्छा होता है, उनका भाग्योदय 28वें वर्ष की आयु मेम आरम्भ हो जाता है. मनुष्य में विज्ञान एवं पराक्रम की अभिव्यक्ति मंगल ग्रह के फलस्वरूप ही होती है. सत्ता पलट एवं राजनेताओं की हत्या के पीछे अशुभ मंगल की बडी अहम भूमिका होती है. क्योंकि यह भाई से विरोध, अचल सम्पत्ति में विवाद, सैनिक-पुलिस कारवाई, अग्निकाँड, हिँसा, चोरी, अपराध और गुस्से का कारक ग्रह है. इससे जिगर के रोग, मधुमेह, बवासीर एवं होंठ फटना आदि स्थितियाँ भी उत्पन्न होती हैं. ऎसे में व्यक्ति को हनुमान जी की उपासना---जैसे सुन्दरकांड, हनुमान बाहुक, हनुमदस्तोत्र, हनुमान चालीसा आदि का नित्यप्रति पाठ करना चाहिए और साथ में मिष्ठान आदि प्रशाद रूप में गरीबों में बाँटते रहना चाहिए. ध्यान रहे---वह प्रशाद स्वयं न खाये.

बुध:- यह शूद्र जाति, हरितवर्ण तथा पश्चिम दिशा का स्वामी ग्रह है, जो कि शुभ होने पर जीवन के 32वें वर्ष में भाग्योदय कराता है. यह विलक्षण व्यापारी बुद्धि, शीघ्रता व हास्य-विनोद का कारक ग्रह है. अगर किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में बुध ग्रह विपरीत, अनिष्टकारक स्थिति में हो , तो पथरी, गुर्दा, स्नायु रोग अथवा दाँतों संबंधी किसी रोग-व्याधि का सामना करना पडता है. बुद्धि में भ्रम बना रहता है, स्मरण शक्ति क्षीण होने लगती है, साथ में कार्य-व्यवसाय संबंधी लिए गये महत्वपूर्ण निर्णय विपरीत सिद्ध होने लगते हैं.
ऎसे में व्यक्ति को दुर्गा सप्तशती का कवच, कीलक व अर्गला स्तोत्र का नित्य पाठ करना चाहिए. साथ में गौमाता की सेवा करते रहें.


बृहस्पति :- उत्तर दिशा का स्वामी ग्रह बृहस्पति देवताओं का गुरू है. इसकी कृपा मात्र से ही संसार को ज्ञान तथा गरिमा की प्राप्ति होती है. यह अपने तेज से समूचे संसार को चमत्कृत कर देता है. जन्मकुंडली में बृहस्पति के शुभ होने की स्थिति में यह 16वें वर्ष से ही व्यक्ति का भाग्योदय कराने लगता है. किन्तु यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में यह अशुभ अथवा निर्बल हो तो संतान सुख में कमी, गृहस्थ जीवन में व्यवधान, स्वजनों से वियोग, जीवनसाथी से तनाव एवं घर में आर्थिक विपन्नता निर्मित करता है. गौरतलब है कि तब पीलिया, एकान्तिक ज्वर, हड्डी का दर्द, पुरानी खाँसी का उभरना, दमा अथवा श्वसन संबंधी रोग-बीमारी भी प्रदान करता है.
ऎसे में व्यक्ति को हरि पूजन, हरिवंश पुराण या श्रीमदभागवत क नित्यप्रति पाठ करना चाहिए.

शुक्र :- शुक्र दैत्यों के गुरू हैं, भृगु ऋषि के पुत्र होने के कारण जिन्हे भृगुनन्दन भी कहा जाता है. वीर्यशक्ति पर शुक्र ग्रह का विशेष आधिपत्य है. यह कामसूत्र का कारक है ओर शुभ होने की स्थिति में व्यक्ति का 25वें वर्ष की आयु में भाग्योदय करा देता है. अगर जन्मकुंडली में शुक्र निर्बल अथवा अनिष्ट स्थिति में हो तो व्यक्ति को खुशी के अवसर पर गम, भूतप्रेत बाधा, शीघ्रपतन, सेक्स संबंधी परेशानी, संतान उत्पन्न करने में अक्षमता, दुर्बल-अशक्त शरीर, अतिसार, अजीर्ण, त्वचा एवं वायु विकार इत्यादि कईं तरह के कष्टों का सामना करना पडता है. इसलिए व्यक्ति को शुक्र की शुभता बनाये रखने की खातिर सदैव श्रीलक्ष्मी जी का सानिध्य प्राप्त करना चाहिए. नित्यप्रति श्रीसूक्त का पाठ करते रहें.

शनि:- पश्चिम दिशा का अधिष्ठाता शनि ग्रह सूर्य-पुत्र माना जाता है. इसके द्वारा कठिन कार्य करने की क्षमता, गम्भीरता और पारस्परिक प्रेम आदि की भावना जागृत होती है. साथ ही पति-पत्नि में मनमुटाव, गुप्त रोग, अग्निकाँड, दुर्घटना, अयोग्य संतान, आँखों में कष्ट, पेचिश, अतिसार, दाम, संग्रहणी, मूत्र विकार, जोडों घुटनों में दर्द, ह्रदय दौर्बल्य, कब्ज आदि विभिन्न प्रकार के रोगों की उत्पत्ति होती है. जन्मकुंडली में इसके शुभ होने की स्थिति में जहाँ ये 36वें वर्ष में व्यक्ति का भाग्योदय करा देता है, वहीं यदि ये निर्बल या अनिष्ट हो तो उपरोक्त वर्णित कईं तरह के दु:साध्य कष्टों का सामना करना पडता है. ऎसी स्थिति में भैरव जी की उपासना व्यक्ति के लिए अति कल्याणकारी सिद्ध होती है. नित्यप्रति संध्या समय भैरव स्तोत्र का पाठ करें एवं मद्यपान निषेध रखें तो अवश्य मनोवांछित लाभ होगा.

राहु:- राहु एक छाया ग्रह है.राहु राजनीति के क्षेत्र का सर्वोप्रमुख कार्केश ग्रह है, जो कि अशुभ प्रभावों में विशेष लाभकारी रहता है. इसके विपरीत होने की स्थिति में आकस्मिक घटना, वैराग्य, ऋण का भार चढ जाना, शत्रुतों की तरफ से पीडा-परेशानी, लडाई-झगडा, जेलयात्रा, मुकद्दमा-कोर्ट कचहरी, अपमानजन्य स्थितियाँ, मिरगी-तपेदिक-बवासीर एवं विभिन्न प्रकार के मानसिक रोगों का सामना करना पडता है.
 ऎसी स्थिति उत्पन होने पर व्यक्ति को सरस्वती आराधना का आश्रय लेना चाहिए. नित्यप्रति श्रीसरस्वती चालीसा का पाठ करे, साथ में कम से कम एक बार किसी गरीब कन्या के विवाह पर यथासामर्थ्य धन की मदद करे तो अशुभता को शुभता में बदलने मे देर नहीं लगेगी.

केतु:- केतु भी राहु की भान्ति ही छाया ग्रह है, जिसका प्रभाव बिल्कुल मंगल की तरह होता है. इसके निर्बल होने या दुष्प्रभाव से निगूढ विद्याओं का आत्मज्ञान होना अथवा मन में वैराग्य के भाव जागृत होना मुख्य फल है. मूर्छा, चक्कर आना, आँखों के अन्धेरा छा जाना, रीढ की हड्डी में चोट/रोग, मूत्र संबंधी विकार, ऎश्वर्य नाश अर्थात जीवन में सब कुछ पाकर एक दम से खो देना, पुत्र का दुर्व्यवहार तथा पुत्र पर संकट इत्यादि भीषण दु:खों का सामना करना पडता है.
इसके कुप्रभावों से मुक्ति प्राप्त करने हेतु व्यक्ति को एक बार जीवन में बछिया का दान अवश्य करना चाहिए. साथ में गणेश जी की उपासना करें तो कष्टों से अवश्य छुटकारा मिलेगा.

भारतीय ज्योतिष और काल सर्प दोष


कालसर्प योग को समझना और उसके प्रति सजगता
सही मायनों में आज अधिकतर व्यक्ति इस योग के प्रति बेखबर हैं. जब कि कुछ के सिर इसका हौव्वा चढा हुआ है. जातक का भय तब और भी बढ जाता है, जब कोई ज्योतिषी अतिश्योक्ति से इस योग का बखान करता है. वस्तुत: यह योग विध्वंसकारी न होकर चमतकरी भी है. बस समय रहते इसका ज्ञान और उपाय करना आवश्यक है. समझदार विद्वान ज्योतिर्विद बिना अतिरिक्त लाभ उठाये यदि सही मार्गदर्शन करे तो इसका निदान अवश्य हो जाता है.

इस योग की ये विशेषता है कि कालसर्प योग में जन्म लेने वाले जातकों का जन्म निश्चित रूप से कर्म भोग के लिए ही होता है. वो आत्मा किसी विशेष उद्देश्यपूर्ति के लिए ही जन्म लेती है. ईश्वर द्वारा सूक्ष्म दिव्य-संचालन का कार्यभार सौरमंडल के इन दो ग्रहों--राहु-केतु के जिम्मे सौंपा गया है. सृष्टि में व्याप्त माया का दूसरा नाम है राहू और उससे मुक्ति अर्थात मोक्ष का नाम है केतु. राहू जहाँ माया के रूप में जगत को बाँधता हैं, वहीं केतु उस माया के बँधन से मुक्त का मार्ग दिखाता है. लेकिन कालसर्प ग्रसित जातक माया के इस बँधन में बहुत गहरे फँसा होता है. इसलिए ही कालसर्प योग पीडित जातक सामान्य व्यक्ति से कुछ अलग होते हैं. विचारों से भी, व्यक्तित्व से भी और जीवन की परिस्थितियों से भी-----पूर्णत: भिन्न.

इसके अतिरिक्त जीवन में जहाँ इस योग के अधिकाँश नकारात्मक फल भोगने पडते हैं, वहीं साथ मे जीवन के कुछ अन्य विषयों में इसके सकारात्मक फल भी प्राप्त होते हैं. मूल आधार जन्मकुंडली में राहु-केतु किस भाव में स्थित हैं एवं जन्मकुंडली अनुसार व्यक्ति के भाग्य की प्रबलता कितनी है, इस पर परिणामों की तीव्रता अवलंबित रहती है.
जन्मकुंडली के चतुर्थ, अष्टम या व्यय भाव में राहू और कुंडली में कालसर्प योग हो तो वह अधिक नकारात्मक होगा. इस योग के अधिक-से-अधिक फल राहू की महादशा या किसी अन्य ग्रह की महादशा में राहू की अन्तर्दशा अवधि में मिलेंगें. इसके अतिरिक्त राहु अशुभ गोचर भ्रमण में भी इसके दुष्परिणाम देखने को मिलते रहेंगें.

'कालसर्प योग' सकारात्मक हो तो जन्मकालीन राहु पर से गोचर के राहु के भ्रमण काल में इसके श्रेष्ठ-फलों की प्राप्ति होती है.रिलायंस इन्डस्ट्रीज के संस्थापक श्री धीरू भाई अम्बानी का जीवन इसका तगडा उदाहरण है. जीवन में राहू का समय आने पर ही धीरूभाई 'शून्य' से 'ब्राह्मण्ड' प्राप्त कर सके.

हर्षद मेहता नाम से भला कौन अपरिचित होगा. उनकी जन्मकुंडली में चतुर्थ भाव स्थित राहु नें ही उन्हे शेयर मार्किट के सिँहासन से गिराकर धूल में मिला डाला. धनु के राहु का गोचर भ्रमण आरम्भ होते ही उनके रहस्यों का पर्दाफाश हुआ और वो कानून के शिकंजे में फंसते चले गए.

भारत की कुंडली में भी कालसर्प योग है. इस 'कालसर्प योगी' भारत को स्वतन्त्रता के बाद पं. जवाहरलाल नेहरू के रूप में प्रथम प्रधान्मत्री "कलसर्प योगी" ही प्राप्त हुआ. भारत की कुंडली में विद्यमान यह योग भी अपने आप में बहुत कुछ कहता है. भ्रष्टाचार,घोटालों, लूट-खसोट, आंतकवाद, अराजकता और सामाजिक-सांस्कृतिक पतन के रूप में देश की इस वर्तमान दुर्दशा का एकमात्र कारण ये कालसर्प योग ही है.


(कालसर्प भाग..२ आगे पढें)

भारतीय ज्योतिष और पितृ दोष

'सीमा' एक ऎसा शब्द है जिससे सम्पूर्ण विश्व जुडा हुआ है और उससे प्रभावित भी होता है. प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक प्राणी इस शब्द से प्रत्यक्ष रूप से जुडा है, सभी की अपनी एक सीमा होती है, एक मर्यादा होती है. जब भी इस सीमा का, इस मर्यादा का किसी भी तरह से उल्लंघन किया जाता है तो अहित होना निश्चित है. उदाहरण के लिए जल को ही लीजिए, जब तक जल अपनी मर्यादा में है, अपनी सीमा में है---तब तक हम सभी के लिए प्राण देने वाला है. परन्तु यदि जल अपनी सीमाओं को लाँघकर समुद्र से निकलकर शहर में आ जाये, उसकी लहरें मकानों को ध्वस्त कर दें, तो क्या होगा ? हवा जब तक मध्यम गति से बह रही है हमारी श्वासें चल रही हैं, परन्तु यदि हवा अपनी सीमाओं को लाँघ जाये, अपनी मर्यादा छोड दे, अपना अनुशासन त्याग दे, तो क्या होगा ? आँधी और तूफान, चारों ओर हाहाकार ही हाहाकार.

अत: यह तो स्पष्ट है कि प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक प्राणी एक सीमा में, एक मर्यादा में है, अनुशासन में है---तब तक ही वह सबके लिए उत्तम है, कल्याणकारी है. यह बात हमारे घर-परिवार व धार्मिक संस्कारों पर भी लागू होती है. परिवार के सदस्य सीमाओं का उल्लंघन करें, मर्यादाओं को ताक पर रख दें तो क्या होगा ? निश्चित है कि समस्त परिवार को कष्ट उठाना ही पडेगा. एक घर-परिवार का अनुशासन टूटेगा, मर्यादा भंग होगी तो उसका प्रभाव आसपास के घरों में, मोहल्ले में और समाज पर भी निश्चित रूप से पडेगा. इसी प्रकार परिवार के मुखिया द्वारा जो सत्कर्म एवं दुष्कर्म किए जाते हैं, उनका फल उसके जाने के बाद पारिवारिक सदस्यों को भुगतना पडता है, विशेषकर उसकी सन्तान को. अब यह फल अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी, जो कि उस मुखिया द्वारा किए गए कर्मों पर निर्भर करता है. यदि परिवार के मुखिया द्वारा अच्छे कार्य किए गए हैं, तो निश्चित रूप से वह अपने परिवार को सम्पन्नता एवं प्रसन्नता दे पाएगा. यदि उसने अनैतिक एवं दुराचार ही किए हैं तो वह अपने परिवार को अपमान,घृणा एवं दु:खों के अतिरिक्त भला ओर दे भी क्या सकता है.

इस प्रकार के दुष्परिणाम ज्योतिष शास्त्र में पितृदोष के नाम से जाने जाते है. यह पितृदोष अपने किसी पूर्वज द्वारा मर्यादा भंग करने से होते हैं. इनके कारण व्यक्ति आर्थिक संकट, विभिन्न कार्यों में बाधा, विवाहादि में रूकावटें, पारिवारिक झगडे, अपमान, अपयश, दोषारोपण, ऋणग्रस्तता, व्यापार/व्यवसाय में घाटा, नौकरी आदि में बार-बार परेशानियाँ आदि अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पडता है.

जानिये-----कहीं आपकी कुंडली में पितृदोष तो नही?....

कब होगा भाग्योदय ?


वर्तमान युग में मनुष्य अच्छा समय कब आयेगा? मनुष्य इसकी फ़िक्र में ही सारी उम्र गुजार देता है क्योंकि ये आर्थिक और भौतिक युग है, इस कलिकाल में आदमी की चाहत पद, सुंदर मकान और उच्च कोटि के वाहन की अतिशय होती है. अब हम आपको जन्मकुंडली की कुछ स्थितियां बताते हैं जिनके विद्यमान होने पर आप समय आने पर अवश्य पद, मकान व वाहन की प्राप्ति आसानी से कर सकेंगे. एक बात ध्यान रखिये कि वाहन, मकान, सुख का कारक चतुर्थ भाव होता है और इन सबके लिये चतुर्थेश का बलि होकर अन्य भावेशों से संबंध बनाना नितांत आवश्यक है.

यदि चतुर्थेश बली होकर केंद्र त्रिकोण में हो, साथ ही भोगों का कारक ग्रह शुक्र भी अच्छी स्थिति में हो तो चतुर्थ भाव या भावेश पर दॄष्टि डालने वाले ग्रह की दशा अंतर्दशा में वाहन सुख की प्राप्ति होगी.

एकादश भाव चतुर्थेश के साथ मंगल भी युति कर रहा हो तो निश्चय ही वाहन सुख के साथ साथ राज्य पद भी प्राप्त होता है.

नवमेश केंद्र में हो और चतुर्थेश नवम भाव में बलवान शुक्र के साथ हो तो कीमती वाहन के साथ साथ महा ऐश्वर्य की प्राप्ति भी होती है.

चतुर्थ भाव में नवमेश और चतुर्थेश हों तब भी वाहन की प्राप्ति होती है.

चतुर्थ भावगत सूर्य हो, और शुक्र से युत गुरू नवम भावगत हों तब ३४ वर्षायु पश्चात वाहन की प्राप्ति होती है.

चतुर्थ भाव पर लग्नेश एवम एकादशेश पूर्ण दॄष्टि डालते हों तो एक से अधिक वाहनों की प्राप्ति होती है.

शुभ ग्रह दॄष्ट होकर लग्नेश यदि चतुर्थ, नवम या एकादश भावगत हो तो उत्तम वाहन सुख प्राप्त होता है.

चतुर्थेश पंचमेश के द्वारा भाव परिवर्तन संबंध होने पर भी अक से अधिक वाहनों का सुख मिलता है.

दशमेश और कादशेश के चतुर्थ भाव गत होने पर भी उत्तम वाहन सुख मिलता है.

चतुर्थेश एवम एकादशेश का भाव परिवर्तन योग हो तो बारह वर्षायु में ही वाहन प्राप्ति होती है.

लग्नेश स्वग्रही या उच्च का होकर बलवान हो तो उत्तम जमीन का सुख का मिलता है.

चतुर्थेश अगर सप्तम भावगत हो तो स्त्री के माध्यम से जमीन प्राप्त होती है.

चतुर्थेश अगर अष्टम भाव गत हो तो जातक सुंदर मकान का स्वामी होता है.

लग्नेश, द्वितियेश और एकादशेश कि युति अगर चतुर्थ भाव में हो तो जातक अनेक मकानों का स्वामी होता है.

लग्नेश सप्तमेश चतुर्थ भावगत हो तो बिना प्रयास के ही मकान की प्राप्ति होती है.

राहु या शनि चतुर्थ भावगत हों तो पुराने मकान की प्राप्ति होती है.

सिंह और मकर लग्न हो और मंगल चौथे भाव में बैठा हो तो मकान बनने में अकारण अनेक परेशानियों का समना करना पडता है.

विवाह कब होगा ?



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