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जन्म कुंडली में सुखी दांपत्य जीवन की स्थितियां

विवाह के बाद कुछ समय तो गॄहस्थी की गाडी बढिया चलती रहती है किंतु कुछ समय के बाद ही पति पत्नि में कलह झगडे, अनबन शुरू होकर जीवन नारकीय बन जाता है. इन स्थितियों के लिये भी जन्मकुंडली में मौजूद कुछ योगायोग जिम्मेदार होते हैं. अत: विवाह तय करने के पहले कुंडली मिलान के समय ही इन योगायोगों पर अवश्य ही दॄष्टिपात कर लेना चाहिये.

सातवें भाव में खुद सप्तमेश स्वग्रही हो एवम उसके साथ किसी पाप ग्रह की युति अथवा दॄष्टि भी नही होनी चाहिये. लेकिन स्वग्रही सप्तमेश पर शनि मंगल या राहु में से किन्ही भी दो ग्रहों की संपूर्ण दॄष्टि संबंध या युति है तो इस स्थिति में दापंत्य सुख अति अल्प हो जायेगा. इस स्थिति के कारण सप्तम भाव एवम सप्तमेश दोनों ही पाप प्रभाव में आकर कमजोर हो जायेंगे.

यदि शुक्र के साथ लग्नेश, चतुर्थेश, नवमेश, दशमेश अथवा पंचमेश की युति हो तो दांपत्य सुख यानि यौन सुख में वॄद्धि होती है वहीं षष्ठेश, अष्टमेश अथवा द्वादशेश के साथ संबंध होने पर दांपत्य सुख में न्यूनता आती है.

यदि सप्तम अधिपति पर शुभ ग्रहों की दॄष्टि हो, सप्तमाधिपति से केंद्र में शुक्र संबंध बना रहा हो, चंद्र एवम शुक्र पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो दांपत्य जीवन अत्यंत सुखी और प्रेम पूर्ण होता है.

लग्नेश सप्तम भाव में विराजित हो और उस पर चतुर्थेश की शुभ दॄष्टि हो, एवम अन्य शुभ ग्रह भी सप्तम भाव में हों तो ऐसे जातक को अत्यंत सुंदर सुशील और गुणवान पत्नि मिलती है जिसके साथ उसका आजीवन सुंदर और सुखद दांपत्य जीवन व्यतीत होता है. (यह योग कन्या लग्न में घटित नही होगा)

सप्तमेश की केंद्र त्रिकोण में या एकादश भाव में स्थित हो तो ऐसे जोडों में परस्पर अत्यंत स्नेह रहता है. सप्तमेश एवम शुक्र दोनों उच्च राशि में, स्वराशि में हों और उन पर पाप प्रभाव ना हो तो दांपत्य जीवन अत्यंत सुखद होता है.

सप्तमेश बलवान होकर लग्नस्थ या सप्तमस्थ हो एवम शुक्र और चतुर्थेश भी साथ हों तो पति पत्नि अत्यंत प्रेम पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं.

सप्तमेश एवम शुक्र एक दूसरे की राशि में केंद्र या त्रिकोण में बैठे हों और उन पर द्वितीयेश और चतुर्थेश का दॄष्टि संबंध हो तो निहायत ही सुखद दांपत्य सुख प्राप्त होता है.

पुरूष की कुंडली में स्त्री सुख का कारक शुक्र होता है उसी तरह स्त्री की कुंडली में पति सुख का कारक ग्रह वॄहस्पति होता है. स्त्री की कुंडली में बलवान सप्तमेश होकर वॄहस्पति सप्तम भाव को देख रहा हो तो ऐसी स्त्री को अत्यंत उत्तम पति सुख प्राप्त होता है.

जिस स्त्री के द्वितीय, सप्तम, द्वादश भावों के अधिपति केंद्र या त्रिकोण में होकर वॄहस्पति से देखे जाते हों, सप्तमेश से द्वितीय, षष्ठ और एकादश स्थानों में सौम्य ग्रह बैठे हों, ऐसी स्त्री अत्यंत सुखी और पुत्रवान होकर सुखोपभोग करने वाली होती है.

पुरूष का सप्तमेश जिस राशि में बैठा हो वही राशि स्त्री की हो तो पति पत्नि में बहुत गहरा प्रेम रहता है.

वर कन्या का एक ही गण हो तथा वर्ग मैत्री भी हो तो उनमें असीम प्रम होता है. दोनों की एक ही राशि हो या राशि स्वामियों में मित्रता हो तो भी जीवन में प्रेम बना रहता है.

अगर वर या कन्या के सप्तम भाव में मंगल और शुक्र बैठे हों उनमे कामवासना का आवेग ज्यादा होगा अत: ऐसे वर कन्या के लिये ऐसे ही ग्रह स्थिति वाले जीवन साथी का चुनाव करना चाहिये. अगर ऐसे ग्रहों से युक्त वर कन्या का विवाह ऐसे जातक से कर दिया जाये जिसके सप्तम भाव में बुध या गुरू बैठे हों , जो कि काम वासना को कम करने वाले ग्रह हैं, तो इस स्थिति में इस युगल यौन विषय्क असमानता आ जाती है जिसके फ़लस्वरूप इनके जीवन में झगडे झंझट शुरू होकर दांपत्य सुख खत्म सा हो जाता है.

दांपत्य सुख का संबंध पति पत्नि दोनों से होता है. एक कुंडली में दंपत्य सुख हो और दूसरे की में नही हो तो उस अवस्था में भी दांपत्य सुख नही मिल पाता, अत: सगाई पूर्व माता पिता को निम्न स्थितियों पर ध्यान देते हुये किसी सुयोग्य और विद्वान ज्योतिषी से दोनों की जन्म कुंडलियों में स्वास्थ्य, आयु, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, संतान पक्ष इत्यादि का समुचित अध्ययन करवा लेना चाहिये सिर्फ़ गुण मिलान से कुछ नही होता.

वर वधु की आयु का अधिक अंतर भी नही होना चाहिये, दोनों का शारीरिक ढांचा यानि लंबाई उंचाई, मोटाई, सुंदरता में भी साम्य देख लेना चाहिये. अक्सर कई धनी माता पिता अपनी काली कलूटी कन्या का विवाह धन का लालच देकर किसी सुंदर और गौरवर्ण लडके से कर देते हैं जो बाद में जाकर कलह का कारण बनता है. इसी तरह कई धनी पालक अपने काले कलूटे और कम पढे लिखे पुत्र के लिये सुंदर और गौरवर्ण पढी लिखी युवती से कर देते हैं और युवती के मां बाप भी यह सोचकर कि लडकी उंचे और धनी परिवार में जा रही है, उसकी शादी कर देते हैं, इस तरह के जोडे भी अक्सर दांपत्य सुख में कमी का शिकार होते हैं.

कुल मिलाकर शिक्षा, खानदान, खान पान परंपरा इत्यादि की साम्यता देखकर ही निर्णय लेना चाहिये. इस सबके अलावा वर कन्या के जन्म लग्न एवन जन्म राशि के तत्वों पर भी दॄष्टिपात कर लेना चाहिये. दोनों के लग्न, राशि के एक ही ततव हों और परस्पर मित्र भाव वाले हों तो भी पति पत्नि का जीवन प्रेम मय बना रहता है. इस मामले में विपरीत तत्वों का होना पति पत्नि में शत्रुता पैदा करता है यानि पति अग्नि तत्व का हो और पत्नि जल तत्व की हो तो गॄहस्थी की गाडी बहुत कष्ट दायक हो जाती है. कुल मिलाकर एक ही तत्व वाले जोडे अधिक सुखद दांपत्य जीवन जीते हैं..

प्रेम विवाह की सफ़लता या असफ़लता के लिये जिम्मेदार स्थितियां

जैसे--जैसे बच्चों की आयु बढने लगती है, त्यों-त्यों माता-पिता को उनकी विवाह-शादी की चिन्ता सताने लगती है. भारतीय समाज में अधिकाशंत: निर्धारित शादियां करने की ही परम्परा रही है. हालाँकि, पुरातन काल में विवाह की कईं प्रकार की परंपरायें प्रचलन में थी. इच्छित विवाह एवं स्वयंबर तथा गंधर्व विवाह भी हुआ करते थे. कुछ राजा लोग अपनी पुत्री की शादी के लिये किसी बात का प्रण ले लेते थे और उस प्रण को पूरा करने वाले का वरण कन्या को चाहे अनचाहे करना ही पडता था. भगवान राम एवं सीता जी का विवाह भी इसी परंपरा मे हुआ था.

आज के समय में जब लडका और लडकी दोनों ही पढे लिखें हैं और समान रूप से कामकाजी हो गये हैं. घर, शहर और विदेश में अकेले रह कर काम कर रहे हैं तभी से प्रेम विवाह का चलन बढा है. लेकिन यह बात भी उतनी ही सत्य है कि आज के समय में पालक प्रेम विवाह को अच्छी नजर से नही देखते हैं और यथा संभव प्रेम विवाह में रोडे ही अटकाने की कोशीश करते हैं. लेकिन अगर जन्मकुंडली में प्रेम विवाह के योग बने हुये हैं तो वो रोकने की लाख कोशीश करले उसको रोक नही पाते. इसी वजह से कई जोडे घर से भागकर मंदिर में शादी कर लेते हैं.

यहां एक बात कहना उचित होगा कि अगर जन्मकुंडली में प्रेम विवाह का योग परिलक्षित हो रहा हो तो पालको को चाहिये कि शांत दिमाग से काम लेकर किसी योग्य ज्योतिषी से बच्चों की कुंडली का अध्ययन अवश्य करवा लेना चाहिये जिससे यह पता लगाया जा सके कि ये प्रेम संबंध सफ़ल होकर सुख शांति बनी रहेगी या ये प्रेम संबंध सिर्फ़ अनैतिक संबंधों तक ही सीमित होकर कलह का कारण बनेंगे.

प्रेम संबंध और प्रेम विवाह के लिये लडका लडकी की कुंडली के पंचम भाव का भलिभांति अध्ययन कर लेना चाहिये. प्रेम का संबंध पंचम भाव से होकर जीवन साथी का भाव सप्तम होता है. विवाह का कारक शुक्र होकर भोग विलास का दायित्व भी शुक्र का है. इन भावों के अध्ययन से ही स्पष्ट होगा कि ये प्रेमी जोदा सुखपूर्वक जीवन यापन करेगा या एक दुखी जीवन का निर्माण करेगा.

कुंडली के पंचम भाव से स्वाभाविक प्रेम और संतान के बारे में जाना जाता है. सप्तम भाव से इसके तादाम्य के अनुसार ही प्रेम विवाह की सफ़लता असफ़लता का निर्धारण किया जाता है. पंचमेश और सप्तमेश का कुंडली में एक दूसरे से त्रिकोण या केंद्र में होना अति आवश्यक है. यदि ये ग्रह लग्न, नवम भाव, दशम भाव या एकादश भाव में युति करें अथवा केंद्र त्रिकोण में हों तो प्रेम विवाह की प्रबल संभावना बनती है. पंचमेश सप्तमेश और नवमेश और इन भावों की स्थिति मजबूत हो तो एक सफ़ल और सुखद वैवाहिक जीवन व्यतीत होता है. इसके विपरीत पंचमेश, नवमेश और सप्तमेश का संअबंध किसी भी तरह कुंडली के छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो प्रेम विवाह में विफ़लता एवम निराशा ही उठानी पडती है.

निम्न लिखित योग कुंडली में अगर विद्यमान हों तो प्रेम विवाह की संभावना प्रबल होती है:----

१. युति अथवा दॄष्टि द्वारा पंचम, नवम और सप्तम भावो ए भावेशों का संबध बन रहा हो.

२. सांतवे भाव में शनि और केतु की उपस्थिति भी प्रेम विवाह में अति सहायक होती है.

३. जब नवम और सप्तम भाव और उनके अधिपति और गुरू अशुभ भावों से घिरे हों.

४. सप्तमेश एवम शुक्र यदि शनि या राहु से युति करें या उनसे दॄष्ट हों तो भी प्रेम विवाह हो सकता है.

जब द्वादश भाव चर राशि का नही हो एवम उसका संबंध लग्नेश और सप्तमेश के साथ हो जातक घर की परंपाराओं के विपरीत अंतर्जातीय विवाह करता है.

५. लग्न और सप्तम के अधिपति आटवें या पांचवे भाव मे हो अथवा लग्नेश पंचमेश सातवें हों, पंचमेश एवम सप्तमेश लग्न में हों तो मर्यादाओं को लांघते हुये जातक बेधडक प्रेम विवाह करता है.

६. लग्न में चंद्र हो या कर्क राशि हो, अथवा मंगल हो या उसकी राशि हो तो निश्चित तौर पर अंतर्जातीय प्रेम विवाह होता है.
७. पंचमेश, लग्नेश और सप्तमेश का संबंध द्वादश भाव से बने तब भी प्रेम विवाह होता है.

जन्मकुंडली का विस्तॄत अध्ययन करके प्रेम विवाह की सफ़लता या असफ़लता का निश्चित तौर पर पता लगाया जा सकता है.

कालसर्प योग से मुक्ति के सहज उपाय

यह तो सर्वविदित ही है कि जन्मकुंडली में कालसर्प योग के कारण इन्सन को जीवन में अनेक प्रकार की बाधाओं, हानि-परेशानी, दिक्कतों का सामना करना पडता है. जैसे, विवाह, सन्तान में विलम्ब, विद्याभ्यास में विक्षेप, दाम्पत्य जीवन में असंतोष, मानसिक अशांति, भ्रम एवं दुविधापूर्ण अनिश्चयात्मक स्थिति, स्वास्थय हानि, धनाभाव एवं प्रगति में रूकावट आदि इन सब कष्टों, परेशानियों से मुक्ति हेतु 'कालसर्प योग' की श्रद्धा-भक्तिपूर्वक विधिवत शान्ति करानी अति आवश्यक हो जाती है. इस योग की शान्ति के पश्चात ही व्यक्ति जीवन में पगे-पगे उत्पन होने वाली विषम परिस्थितियों से मुक्त होकर पूर्ण आनन्दमय सुखी जीवन का उपभोग कर सकता है.

किन्तु 'कालसर्प शान्ति अनुष्ठान' अपने आप में एक जटिल एवं महंगी प्रक्रिया है, जिसे कष्टों-परेशानियों में घिरे एक आम मध्यमवर्गीय परिवार के व्यक्ति द्वारा सम्पन्न करवा पाना भी थोडा मुश्किल हो जाता है. अब व्यक्ति या तो जीवनभर इस योग के दुष्प्रभावों को झेलता रहे या फिर अपने परिवार का पेट काटकर अथवा किसी से उधार पकडकर इस महंगें अनुष्ठान को सम्पन्न कराये. उस पर से इस बात की भी कोई गारंटी भी नहीं कि जिस ब्राह्मण के द्वारा वो शान्ति अनुष्ठान सम्पन्न करवाने जा रहा है, वो उसे पूर्ण विधि विधानपूर्वक कर भी पाता है या नहीं. क्योंकि ये तो ब्राह्मण की अपनी योग्यता पर निर्भर करता है कि वो इस गूढ शान्ति कर्म का कितना ज्ञान रखता है.

इसलिए हम कालसर्प योग शान्ति विधान के अतिरिक्त आपको कुछ सर्वसुलभ साधारण उपायों की जानकारी दे रहे हैं, जिन्हे समय-समय पर करते रहने से आप इस योग के दुष्प्रभावों से निजात पा सकते हैं----

* काले पत्थर की नाग देवता की एक प्रतिमा बनवा कर उसकी किसी मन्दिर में प्रतिष्ठा करवा दें.
* कार्तिक या चैत्रमास में सर्पबलि कराने से भी कालसर्प योग-दोष का निवारण हो जाता है.
* ताँबा धातु की एक सर्पमूर्ति बनवाकर अपने घर के पूजास्थल में स्थापित करें. एक वर्ष तक नित्य उसका पूजन करने के बाद उसे किसी नदी/तालाब इत्यादि में प्रवाहित कर दें.
* श्रावण कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि अर्थात नागपंचमी को उपवास रखें. उस दिन सर्पाकार सब्जियाँ खुद न खाकर, न अपने हाथों काटकर बल्कि उनका किसी भिक्षुक को दान करें.
* प्रत्येक मास के ज्येष्ठ सोमवार( सक्रान्ति के बाद आने वाला प्रथम सोमवार) के दिन शिवलिंग पर चाँदी के सर्पों की एक जोडी चढाते रहें.

शिक्षा में बाधा और ज्योतिषीय परामर्श

प्राय: देखा गया है कि अच्छी भली चलते विद्याअध्ययन में रूकावट खडी हो जाती है. जन्मकुंडली में शिक्षा से संबंधित कुछ ऐसे बाधा योग उपस्थित हो जाते हैं कि जन्म कुंडली में उच्च शिक्षा का योग होने पर भी कभी-कभी जातक उच्च शिक्षा प्राप्त करना तो दूर बल्कि सामान्य शिक्षा भी प्राप्त नही कर पाता. शिक्षा प्राप्ति में कुछ रुकावट वाले वाले योगइस प्रकार होते हैं.

यदि पंचमेश 6, 8 या 12 वें भाव में स्थित हो या किसी अशुभ ग्रह के साथ स्थित हो या अशुभ ग्रह से देखा जाता हो, तो जातक को शिक्षा प्राप्त करने में बाधा आती हैं. ज्यादातर शिक्षा प्राप्ति के समय यदि राहु की महादशा आ जाये तो जातक का मन विध्याअध्ययन के प्रति ऊब जाता है और वो अन्य सांसारिक पचडों में उलझ जाता है. जातक की कुंडली में अगर गुरु या बुध 3, 6, 8 या 12 वें भावगत हो, शत्रुगृही हो, तो शिक्षा प्राप्ति में अनावश्यक अवरोध खडा हो जाता है.

जातक की जन्म कुंडली में द्वितीय भाव में अशुभ ग्रह स्थित हो अथवा अशुभ ग्रहो का संबंध किसी भी रूप में द्वितीय भाव को दूषित कर रहा हो , तो विद्या प्राप्ति में रूकावट समझना चाहिये. इसी समय में अगर जातक की दशा अंतर्दशाओं में द्वितियेश का अष्टम भाव से संबंध बन जाये तो निश्चय ही शिक्षा में बाधा आयेगी.

इसके अलावा जन्म कुंडली में शनि पंचम भाव अथवा अष्टम भावगत हो तो भी शिक्षा अपूर्ण ही रह जाती है. पंचम भाव, पंचमेश, तृतीयेश, या नवमेष पर अशुभ प्रभाव हो, तो विद्या अध्ययन में व्यवधान आ जाता हैं धन, विद्या, वाणी एवं स्वयं के कोष के लिये द्वितीय भाव से विचार करना चाहिए.

विद्या अध्ययन में व्यवधान दूर करने के उपाय:-

अगर ग्रहों की अशुभ स्थिति के कारण अथवा किन्ही तात्कालिक अंतर्दशाओं की वजह से विद्या प्राप्ति में अडचन खदी हो रही हो, बालक की स्मरण शक्ति कमजोर हो अथवा एकाग्रता की कमी हो रही हो, इस स्थिति में अभिमंत्रित किया हुआ सरस्वती कवच एवं यंत्र धारण करना चाहिये.

अभिमंत्रित तीन मुखी रूद्राक्ष गले में, काले धागे में धारण करवाने से मन विद्या अध्ययन में एकाग्र होता है.

जन्म कुंडली में उच्च शिक्षा का योग विद्यमान हो, इसके बावजूद भी शिक्षा में अशुभ ग्रहों की दशा/अंतर्दशाओं के कारण अडचन आरही हो तो संबंधित ग्रह की शांति हेतु उस ग्रह से संबंधित यंत्र/कवच जातक के बेडरूम में स्थापित करने से अत्यंत मंगल दायक फ़ल प्राप्त होते हैं, इसके अलावा किसी योग्य देवैज्ञ से सलाह लेकर भी उपाय किये जा सकते हैं.

अनिष्ट ग्रहों के कारण और निवारण


मानव जीवन पल-प्रतिपल ग्रहों से संचालित होता है और समस्त ग्रह आकाशमंडल में निरन्तर अपनी धुरी पर घूमते हुए निर्दिष्ट समय में सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते रहते हैं. चन्द्र से लेकर शनि पर्यन्त किसी भी ग्रह की अपनी स्वयं की किरणें या रश्मियाँ न होकर वो आत्मकारक सूर्य से प्रकाश ग्रहण करता है और फिर उसे पृथ्वी सहित आकाशमंडल में चारों ओर न्यूनाधिक रूप में फैला देता है. इस समूचे चराचर जगत में ग्रहों की रश्मियों का अभाव या अधिकता ही दुर्योग का कारण बनता है. इसलिए इन समस्त ग्रहों का उचित अनुपात ही मानव जीवन की श्रेष्ठता के लिए आवश्यक है. सूर्यादि इन नवग्रहों में से किसी एक ग्रह की दुर्बलता भी मानव जीवन की अपूर्णता ही कही जाएगी.
ग्रहों के इस उतार-चढाव को सामान्य रूप में लाने के लिए ग्रहों के निवारण एवं देवोपासना का स्वरूप यहाँ आप लोगों के कल्याण हेतु यहाँ प्रस्तुत है :--

सूर्य:- न केवल ज्योतिष अपितु सम्पूर्ण ब्राह्मंड में ही सूर्यदेव अपना सर्वोप्रमुख स्थान रखते हैं. ज्योतिषशास्त्र जहाँ ग्रहों की दृश्य-स्थिति का निर्देशक हैं, वहीं सूर्य इन समस्त ग्रहों एवं सम्पूर्ण जगत का पालनकर्ता है, जिन्हे नक्षत्रों एवं ग्रहों का राजा भी कहा जाता है. यह जीवों की आत्मा का अधिष्ठाता है. अत: व्यक्ति का आत्मबल इसी ग्रह से देखा जाता है. अगर किसी व्यक्ति का सूर्य अनिष्ट हो तो उसे जीवन में ह्रदय रोग, उदर सम्बन्धी विकार, नेत्र रोग, धन का नाश, ऋण का बोझ बढ जाना, मानहानि, अपयश, संतान सुख में कमी एवं ऎश्वर्य-नाश आदि दुष्फलों का सामना करना पडता हैं. ऎसे में व्यक्ति को सूर्य नमस्कार, सूर्य पूजा, हरिवंशपुराण आदि का पाठ करना चाहिए.

चन्द्रमा:- न केवल मनुष्य अपितु संसार के समस्त प्राणियों की देह में मन ही वह एकमात्र वस्तु है, जिसमें आगे भविष्य की सभी सम्भावनाओं के अंकुर विद्यामान रहते हैं. इसी मनतत्व का कारक ग्रह है---चन्द्रमा. कहा भी गया है कि 'चन्द्रमा मनसो जात:" अर्थात चन्द्रमा ही मन की शक्तियों का अधिष्ठाता है. अगर व्यक्ति की जन्मकुंडली में चन्द्रमा निर्बल अथवा अन्य किसी प्रकार से अनिष्ट प्रभाव में हो तो मानसिक रूप से तनाव, दुर्बल मन:स्थिति, शारीरिक एवं आर्थिक परेशानी, छाती-फेफडे संबंधी रोग-बीमारी, माता को कष्ट, सिरदर्द आदि जीवन में कष्टकारी स्थितियाँ निर्मित होती हैं. ऎसे में व्यक्ति को अपनी कुलदेवी या देवता की उपासना करनी चाहिए. नि:संदेह लाभ मिलेगा और कष्टों से मुक्ति प्राप्त होगी.

मंगल:- मंगल ग्रह ऋषि भारद्वाज कुलोत्पन्न ग्रह है, जो कि क्षत्रिय जाति, रक्तपूर्ण एवं पूर्व दिशा का अधिष्ठाता है. जिन व्यक्तियों का जन्मकुंडली में मंगल अच्छा होता है, उनका भाग्योदय 28वें वर्ष की आयु मेम आरम्भ हो जाता है. मनुष्य में विज्ञान एवं पराक्रम की अभिव्यक्ति मंगल ग्रह के फलस्वरूप ही होती है. सत्ता पलट एवं राजनेताओं की हत्या के पीछे अशुभ मंगल की बडी अहम भूमिका होती है. क्योंकि यह भाई से विरोध, अचल सम्पत्ति में विवाद, सैनिक-पुलिस कारवाई, अग्निकाँड, हिँसा, चोरी, अपराध और गुस्से का कारक ग्रह है. इससे जिगर के रोग, मधुमेह, बवासीर एवं होंठ फटना आदि स्थितियाँ भी उत्पन्न होती हैं. ऎसे में व्यक्ति को हनुमान जी की उपासना---जैसे सुन्दरकांड, हनुमान बाहुक, हनुमदस्तोत्र, हनुमान चालीसा आदि का नित्यप्रति पाठ करना चाहिए और साथ में मिष्ठान आदि प्रशाद रूप में गरीबों में बाँटते रहना चाहिए. ध्यान रहे---वह प्रशाद स्वयं न खाये.

बुध:- यह शूद्र जाति, हरितवर्ण तथा पश्चिम दिशा का स्वामी ग्रह है, जो कि शुभ होने पर जीवन के 32वें वर्ष में भाग्योदय कराता है. यह विलक्षण व्यापारी बुद्धि, शीघ्रता व हास्य-विनोद का कारक ग्रह है. अगर किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में बुध ग्रह विपरीत, अनिष्टकारक स्थिति में हो , तो पथरी, गुर्दा, स्नायु रोग अथवा दाँतों संबंधी किसी रोग-व्याधि का सामना करना पडता है. बुद्धि में भ्रम बना रहता है, स्मरण शक्ति क्षीण होने लगती है, साथ में कार्य-व्यवसाय संबंधी लिए गये महत्वपूर्ण निर्णय विपरीत सिद्ध होने लगते हैं.
ऎसे में व्यक्ति को दुर्गा सप्तशती का कवच, कीलक व अर्गला स्तोत्र का नित्य पाठ करना चाहिए. साथ में गौमाता की सेवा करते रहें.


बृहस्पति :- उत्तर दिशा का स्वामी ग्रह बृहस्पति देवताओं का गुरू है. इसकी कृपा मात्र से ही संसार को ज्ञान तथा गरिमा की प्राप्ति होती है. यह अपने तेज से समूचे संसार को चमत्कृत कर देता है. जन्मकुंडली में बृहस्पति के शुभ होने की स्थिति में यह 16वें वर्ष से ही व्यक्ति का भाग्योदय कराने लगता है. किन्तु यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में यह अशुभ अथवा निर्बल हो तो संतान सुख में कमी, गृहस्थ जीवन में व्यवधान, स्वजनों से वियोग, जीवनसाथी से तनाव एवं घर में आर्थिक विपन्नता निर्मित करता है. गौरतलब है कि तब पीलिया, एकान्तिक ज्वर, हड्डी का दर्द, पुरानी खाँसी का उभरना, दमा अथवा श्वसन संबंधी रोग-बीमारी भी प्रदान करता है.
ऎसे में व्यक्ति को हरि पूजन, हरिवंश पुराण या श्रीमदभागवत क नित्यप्रति पाठ करना चाहिए.

शुक्र :- शुक्र दैत्यों के गुरू हैं, भृगु ऋषि के पुत्र होने के कारण जिन्हे भृगुनन्दन भी कहा जाता है. वीर्यशक्ति पर शुक्र ग्रह का विशेष आधिपत्य है. यह कामसूत्र का कारक है ओर शुभ होने की स्थिति में व्यक्ति का 25वें वर्ष की आयु में भाग्योदय करा देता है. अगर जन्मकुंडली में शुक्र निर्बल अथवा अनिष्ट स्थिति में हो तो व्यक्ति को खुशी के अवसर पर गम, भूतप्रेत बाधा, शीघ्रपतन, सेक्स संबंधी परेशानी, संतान उत्पन्न करने में अक्षमता, दुर्बल-अशक्त शरीर, अतिसार, अजीर्ण, त्वचा एवं वायु विकार इत्यादि कईं तरह के कष्टों का सामना करना पडता है. इसलिए व्यक्ति को शुक्र की शुभता बनाये रखने की खातिर सदैव श्रीलक्ष्मी जी का सानिध्य प्राप्त करना चाहिए. नित्यप्रति श्रीसूक्त का पाठ करते रहें.

शनि:- पश्चिम दिशा का अधिष्ठाता शनि ग्रह सूर्य-पुत्र माना जाता है. इसके द्वारा कठिन कार्य करने की क्षमता, गम्भीरता और पारस्परिक प्रेम आदि की भावना जागृत होती है. साथ ही पति-पत्नि में मनमुटाव, गुप्त रोग, अग्निकाँड, दुर्घटना, अयोग्य संतान, आँखों में कष्ट, पेचिश, अतिसार, दाम, संग्रहणी, मूत्र विकार, जोडों घुटनों में दर्द, ह्रदय दौर्बल्य, कब्ज आदि विभिन्न प्रकार के रोगों की उत्पत्ति होती है. जन्मकुंडली में इसके शुभ होने की स्थिति में जहाँ ये 36वें वर्ष में व्यक्ति का भाग्योदय करा देता है, वहीं यदि ये निर्बल या अनिष्ट हो तो उपरोक्त वर्णित कईं तरह के दु:साध्य कष्टों का सामना करना पडता है. ऎसी स्थिति में भैरव जी की उपासना व्यक्ति के लिए अति कल्याणकारी सिद्ध होती है. नित्यप्रति संध्या समय भैरव स्तोत्र का पाठ करें एवं मद्यपान निषेध रखें तो अवश्य मनोवांछित लाभ होगा.

राहु:- राहु एक छाया ग्रह है.राहु राजनीति के क्षेत्र का सर्वोप्रमुख कार्केश ग्रह है, जो कि अशुभ प्रभावों में विशेष लाभकारी रहता है. इसके विपरीत होने की स्थिति में आकस्मिक घटना, वैराग्य, ऋण का भार चढ जाना, शत्रुतों की तरफ से पीडा-परेशानी, लडाई-झगडा, जेलयात्रा, मुकद्दमा-कोर्ट कचहरी, अपमानजन्य स्थितियाँ, मिरगी-तपेदिक-बवासीर एवं विभिन्न प्रकार के मानसिक रोगों का सामना करना पडता है.
 ऎसी स्थिति उत्पन होने पर व्यक्ति को सरस्वती आराधना का आश्रय लेना चाहिए. नित्यप्रति श्रीसरस्वती चालीसा का पाठ करे, साथ में कम से कम एक बार किसी गरीब कन्या के विवाह पर यथासामर्थ्य धन की मदद करे तो अशुभता को शुभता में बदलने मे देर नहीं लगेगी.

केतु:- केतु भी राहु की भान्ति ही छाया ग्रह है, जिसका प्रभाव बिल्कुल मंगल की तरह होता है. इसके निर्बल होने या दुष्प्रभाव से निगूढ विद्याओं का आत्मज्ञान होना अथवा मन में वैराग्य के भाव जागृत होना मुख्य फल है. मूर्छा, चक्कर आना, आँखों के अन्धेरा छा जाना, रीढ की हड्डी में चोट/रोग, मूत्र संबंधी विकार, ऎश्वर्य नाश अर्थात जीवन में सब कुछ पाकर एक दम से खो देना, पुत्र का दुर्व्यवहार तथा पुत्र पर संकट इत्यादि भीषण दु:खों का सामना करना पडता है.
इसके कुप्रभावों से मुक्ति प्राप्त करने हेतु व्यक्ति को एक बार जीवन में बछिया का दान अवश्य करना चाहिए. साथ में गणेश जी की उपासना करें तो कष्टों से अवश्य छुटकारा मिलेगा.

व्यापारिक अवरोध कैसे दूर करें ?

जीवन-यापन के लिए व्यक्ति को कोई न कोई रोजी रोजगार, व्यवसाय तो अवश्य करना पडता है और हर व्यक्ति यही कामना करता है कि वह जो भी कार्य करता है उसमें दिन-दूनी और रात चौगुनी उन्नति हो. किन्तु यदि किसी को अपने कार्य-व्यवसाय में निरन्तर हानि-परेशानी का सामना करना पड रहा हो, लगातार घाटा उठाना पड रहा हो और इस कारण व्यक्ति आर्थिक संकटों में घिरा हो तो उन्हे निम्नलिखित मन्त्र की शरण लेनी चाहिए. यह मन्त्र उनके घाटे-नुक्सान की भरपाई तो करेगा ही, साथ ही व्यापार में आशाजनक लाभकारी वृद्धि भी करेगा.

ॐ श्रीं श्रीं श्रीं परमां सिद्धि श्रीं श्रीं श्रीं
किसी भी महीने की त्रयोदशी तिथि अर्थात प्रदोष के दिन निराहार रहें और केवल फलाहार ही करें. सांयकाल शिवलिंग पर शुद्ध घी का आटे का दीपक जलायें. तदुपरान्त रात्रिकाल में इस मन्त्र की 5 माला जाप करें. यह क्रिअय लगातार 7 प्रदोष वारों तक करें तो इससे व्यापार के समस्त अवरोध समाप्त हो जायेंगें तथा वह खूब फलने-फूलने लगेगा. तीसरे प्रदोष से ही आपको इसके शुभ फल दिखाई देने लगेंगें.

आपका होने वाला पति कैसा होगा?

विवाह योग्य होती कन्याएं अक्सर यह कल्पना करती हैं कि उनका होने वाला पति कैसा होगा? जो घोडी पर चढकर आयेगा और उन्हें ले जायेगा जहां उनका नया घर संसार शुरू होगा. हर लडकी की इच्छा होती है कि उसका एक सुखी गॄहस्थ जीवन हो, प्यार देने वाला पति हो और जीवन में सुख ऐश्वर्य हो.

पर क्या सभी क्न्याओं के सपने पूर्ण हो पाते हैं? एक तरफ़ ऐसा पति मिलता है जो बडा व्यापारी या ओहदेदार अफ़्सर है, अपनी पत्नि पर जान छिडकता है, उसकी सुख सुविधा के लिये अच्छा घर मकान नौकर चाकर जुटाता है तो दूसरी तरफ़ ऐसे भी पति होते हैं जो दिन रात घर में कलह किये रहते हैं. अब्बल तो वो खुद कमाने में अक्षम होकर पत्नि से दूसरों के घर झाडू बुहारी का काम करवाते हैं, बच्चों व पत्नि से मारपीट करना अपना धर्म समझते हैं. और कुछ ऐसे भी पति पाये जाते हैं जो अच्छा व्यापार, धन या अफ़सर होते हुये भी पत्नि और बच्चों को सिवाय गाली गलौच और मारपीट के कुछ नही देते, घर मे चौबीसों घंटे कलह मचाये रहते हैं. जब तक वो घर में रहते हैं, बच्चे और पत्नि यही प्रार्थना करते रहते अहिं कि कब ये घर से आफ़िस जाये और थोडी देर के लिये शांति मिले.

यानि कुछ ऐसी खुशनसीब पत्निया होती हैं जो यहां स्वर्गिक आनंद उठा रही होती हैं वही कुछ ऐसी होती हैं जो यहां साक्षात नर्क भोगती है. आईये इस बात को ज्योतिषिय दॄश्टिकोण से समझने का प्रयत्न करते हैं.

जन्म समय में जो ग्रहों की स्थिति होती है उस अनुसार विद्या, बुद्धि, धन, कुटुंब, भाग्य, सुख इत्यादि का अनुमान जन्म्कुंडली से लग जाता है इसी प्रकार किसी लडकी का दांपत्य जीवन कैसा रहेगा, इसका पता भी जन्मकुंडली स्थित ग्रहों को देखकर लग जाता है.

जनम्कुंडली का सातवां भाव जीवन साथी का होता है और गुरू पति सुख का कारक ग्रह होता है. मंगल की भुमिका यहां स्त्री के काम (यौन) सुख एवम रज से संबंधित होती है. अत: किसी स्त्री का का पति कैसा होगा और उसका भावी दांपत्य जीवन कैसा होगा? इसके लिये बहुत गहराई से स्त्री की जन्मकुंडली के सातवें भाव, सप्तमस्थ राशि, सप्तमस्थ स्थित ग्रह, सप्तम पर दॄष्टि डालने वाले अन्य भावाधिपति, वॄहस्पति ग्रह स्थित और उस पर अन्य भावाधिपतियों के प्रभाव का अध्ययन करना पडेगा. वॄहस्पति के साथ ही मंगल का भी विशेष रूप से अध्ययन कर लेना चाहिये. स्त्रियों की कुंडली का अध्ययन करते समय विशेष रूप से नवमांश कुंडली के साथ ही साथ द्रेषकाण और त्रिशांश का भलिभांति अवलोकन कर लेना चाहिये.

अब हम आपको कुछ वो योग बता रहे हैं जो किसी स्त्री की कुंडली में विद्यमान हों तो उसे दामफ्त्य सुख प्रदान करने वाले पति की प्राप्ति सहज रूप से होती है.

१. सप्तम भाव में सप्तमेष स्वग्रही हो
२. सप्तम भाव पर पाप ग्रहों की दॄष्टि ना होकर शुभ ग्रहों की दॄष्टि हो अथवा स्वयं सप्तमेश सप्तम भाव को देखता हो.
३. सप्तमस्थ कोई नीच ग्रह ना हो यदि सप्त भाव में कोई उच्च ग्रह हो तो अति सुंदर योग होता है.
४. सप्तम भाव में कोई पाप ग्रह ना होकर शुभ ग्रह विद्यमान हों और षष्ठेश या अष्टमेश की उपस्थिति सप्तम भाव में कदापि नही होनी चाहिये.
५. स्वयं सप्तमेश को षष्ठ, अष्टम एवम द्वादश भाव में नहीं होना चाहिये. सप्तमेश के साथ कोई पाप ग्रह भी नही होना चाहिये साथ ही स्वयं सप्तमेश नीच का नही होना चाहिये.
६. सप्तमेश उच्च राशिगत होकर केंद्र त्रिकोण में हो.
७. वॄहस्पति भी स्वग्रही या उच्च का होकर बलवान हो, दु:स्थानगत ना हो, उस पर पाप प्रभाव ना हो तो अति श्रेष्ठ दांपत्य सुख प्राप्त होता है.
८ मंगल भी बलवान हो. मंगल पर राहु शनि की युति अथवा दॄष्टि प्रभाव नही होना चाहिये.

चमत्कारिक टोटके


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