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शनि की साढे साती एवम अढैया


साढेसाती क्या है ?
सढेसाती वह समय है, जब जीवनकाल में जन्मराशि अर्थात चन्द्रराशि से शनि 12वें स्थान पर आता है. शनि एक राशि में लगभग अढाई वर्ष रहता है. जब शनि 12वें स्थान पर आता है तो साढेसाती आरम्भ होती है और जब जन्म अर्थात चन्द्रराशि से दूसरे स्थान से निकलता है तो यह समाप्त होती है. तीन राशियों में शनि का कुल समय साढे 7 वर्ष बनता है, इसलिए इसे साढेसाती कहा जाता है. शनि समस्त 12 राशियों के चक्र को 30 वर्ष की अवधि में पूर्ण करता है. इस तरह किसी भी व्यक्ति के जीवन में साढेसाती अधिकतम कुल तीन बार ही आ सकती है.

साढेसाती का प्रभाव एवं फल
जब भी कोई ज्योतिषी व्यक्ति को यह बताता है कि उसकी साढेसाती आरम्भ हो गई है तो साधारण व्यक्ति का मनोबल यह सुनते ही गिर जाता है. वह तुरन्त सोचने लगता है कि अब उसपर दु:खों, मुसीबतों तथा कठिनाईयों का पहाड टूट पडेगा, क्योंकि साढेसाती सम्बन्धी साधारण लोगों के मन में कुछ इसी प्रकार की गलत धारणा, शंका एवं भय पाया जाता है. जिसका मुख्य कारण अधकचरे ज्योतिषियों द्वारा लोगों के मन में साढेसाती सम्बन्धी अशुभ प्रभावों की बडी ही भयानक तस्वीर निर्मित कर दी गई है. ताकि जहाँ ओर साढेसाती की आड लेकर अपनी ज्योतिषीय अज्ञानता पर पर्दा डाला जा सके और दूसरे इसके जरिये साधारण जनता के भय का दोहन भी किया जाता रहे. यही कारण है कि जब कोई आम व्यक्ति किसी कष्ट, परेशानी, संकट में फंस जाता है तो वो यही समझने लगता है कि उसकी साढेसाती आरम्भ हो गई है. अब चाहे वो हुई हो या नहीं. चाहे उसके पीछे उसका अपना ही कोई कार्मिक दोष अथवा जन्मकुंडली में प्रतिकूल ग्रहदशा ही कारण क्यों न हो, लेकिन उसके मन में यही विचार आता है कि जरूर उसे शनि की साढेसाती लग गई है. यह साढेसाती के नाम पर फैलाये गये भ्रम और भय का ही परिणाम है. पंडितों द्वारा साढेसाती का हौव्वा दिखलाकर तरह-तरह के दान-पुण्य एवं उपाय बतला अथवा करवा दिए जाते हैं, जिसके कि बेचारा एक आम व्यक्ति ओर भी अधिक चक्रव्यूह में फँस जाता है.

यद्यपि, साढेसाती के कुछ समय में, कुछेक जातकों पर कुप्रभाव होते हैं, जैसे किसी भीषण शारीरिक व्याधि का होना, माता-पिता अथवा जीवनसाथी से मतभेद, रोजगार में नुक्सान, उन्नति में बाधा अथवा अन्य किसी प्रकार की चिन्ता, हानि, परेशानी आदि-------परन्तु जितना इसका दु:ष्प्रभाव होता नहीं, उससे कहीं अधिक लोगों के मन में इसका भय पैदा कर दिया गया है. अत: साढेसाती आरम्भ होने पर किसी प्रकार के भय की कोई आवश्यकता नहीं बल्कि इस अवधि में स्वयं को समझने एवं आत्मबल को सशक्त बनाने का सुअवसर समझना चाहिए तथा इसके शुभ प्रभावों के सम्बन्ध में ही विचार करना चाहिए. यह सदैव स्मरण रखने की आवश्यकता है कि जन्मकुंडली में जब कोई ग्रह बुरे स्थान पर आता है तो कोई न कोई शुभ ग्रह भी बचाव हेतु शुभ स्थान पर आ विराजमान होता है. तभी तो कहा गया है कि मारने वाले से बचाने वाला सदैव बलवान होता है. इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ही शनि की साढेसाती के शुभ/अशुभ प्रभाव बारे विचार करना चाहिए....
अलग अलग राशियों पर पडने वाला शनि की साढेसाती का प्रभाव

जन्म राशि


साढेसाती का प्रभाव

मेषमध्य के अढाई वर्ष अशुभ
वृषआरम्भिक अढाई वर्ष अशुभ
मिथुनअन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
कर्कअन्तिम 5 वर्ष अशुभ
सिँहप्रथम 5 वर्ष अशुभ
कन्याआरम्भिक अढाई वर्ष अशुभ
तुलाअन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
वृश्चिकअन्तिम 5 वर्ष अशुभ
धनुप्रारम्भिक 5 वर्ष अशुभ
मकरअन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
कुम्भअन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
मीनअन्तिम अढाई वर्ष अशुभ

कालसर्प योग से मुक्ति के सहज उपाय

यह तो सर्वविदित ही है कि जन्मकुंडली में कालसर्प योग के कारण इन्सन को जीवन में अनेक प्रकार की बाधाओं, हानि-परेशानी, दिक्कतों का सामना करना पडता है. जैसे, विवाह, सन्तान में विलम्ब, विद्याभ्यास में विक्षेप, दाम्पत्य जीवन में असंतोष, मानसिक अशांति, भ्रम एवं दुविधापूर्ण अनिश्चयात्मक स्थिति, स्वास्थय हानि, धनाभाव एवं प्रगति में रूकावट आदि इन सब कष्टों, परेशानियों से मुक्ति हेतु 'कालसर्प योग' की श्रद्धा-भक्तिपूर्वक विधिवत शान्ति करानी अति आवश्यक हो जाती है. इस योग की शान्ति के पश्चात ही व्यक्ति जीवन में पगे-पगे उत्पन होने वाली विषम परिस्थितियों से मुक्त होकर पूर्ण आनन्दमय सुखी जीवन का उपभोग कर सकता है.

किन्तु 'कालसर्प शान्ति अनुष्ठान' अपने आप में एक जटिल एवं महंगी प्रक्रिया है, जिसे कष्टों-परेशानियों में घिरे एक आम मध्यमवर्गीय परिवार के व्यक्ति द्वारा सम्पन्न करवा पाना भी थोडा मुश्किल हो जाता है. अब व्यक्ति या तो जीवनभर इस योग के दुष्प्रभावों को झेलता रहे या फिर अपने परिवार का पेट काटकर अथवा किसी से उधार पकडकर इस महंगें अनुष्ठान को सम्पन्न कराये. उस पर से इस बात की भी कोई गारंटी भी नहीं कि जिस ब्राह्मण के द्वारा वो शान्ति अनुष्ठान सम्पन्न करवाने जा रहा है, वो उसे पूर्ण विधि विधानपूर्वक कर भी पाता है या नहीं. क्योंकि ये तो ब्राह्मण की अपनी योग्यता पर निर्भर करता है कि वो इस गूढ शान्ति कर्म का कितना ज्ञान रखता है.

इसलिए हम कालसर्प योग शान्ति विधान के अतिरिक्त आपको कुछ सर्वसुलभ साधारण उपायों की जानकारी दे रहे हैं, जिन्हे समय-समय पर करते रहने से आप इस योग के दुष्प्रभावों से निजात पा सकते हैं----

* काले पत्थर की नाग देवता की एक प्रतिमा बनवा कर उसकी किसी मन्दिर में प्रतिष्ठा करवा दें.
* कार्तिक या चैत्रमास में सर्पबलि कराने से भी कालसर्प योग-दोष का निवारण हो जाता है.
* ताँबा धातु की एक सर्पमूर्ति बनवाकर अपने घर के पूजास्थल में स्थापित करें. एक वर्ष तक नित्य उसका पूजन करने के बाद उसे किसी नदी/तालाब इत्यादि में प्रवाहित कर दें.
* श्रावण कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि अर्थात नागपंचमी को उपवास रखें. उस दिन सर्पाकार सब्जियाँ खुद न खाकर, न अपने हाथों काटकर बल्कि उनका किसी भिक्षुक को दान करें.
* प्रत्येक मास के ज्येष्ठ सोमवार( सक्रान्ति के बाद आने वाला प्रथम सोमवार) के दिन शिवलिंग पर चाँदी के सर्पों की एक जोडी चढाते रहें.

वास्तुजन्य दोष और रोग

वास्तुशास्त्र---अर्थात गृहनिर्माण की वह कला जो भवन में निवास कर्ताओं की विघ्नों, प्राकृतिक उत्पातों एवं उपद्रवों से रक्षा करती है. देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा रचित इस भारतीय वास्तु शास्त्र का एकमात्र उदेश्य यही है कि गृहस्वामी को भवन शुभफल दे, उसे पुत्र-पौत्रादि, सुख-समृद्धि प्रदान कर लक्ष्मी एवं वैभव को बढाने वाला हो.
इस विलक्षण भारतीय वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करने से घर में स्वास्थय, खुशहाली एवं समृद्धि को पूर्णत: सुनिश्चित किया जा सकता है. एक इन्जीनियर आपके लिए सुन्दर तथा मजबूत भवन का निर्माण तो कर सकता है, परन्तु उसमें निवास करने वालों के सुख और समृद्धि की गारंटी नहीं दे सकता. लेकिन भारतीय वास्तुशास्त्र आपको इसकी पूरी गारंटी देता है.
यहाँ हम अपने पाठकों को जानकारी दे रहे हैं कि वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन न करने से पारिवारिक सदस्यों को किस तरह से नाना प्रकार के रोगों का सामना करना पड सकता है.
पूर्व दिशा में दोष:-
* यदि भवन में पूर्व दिशा का स्थान ऊँचा हो, तो व्यक्ति का सारा जीवन आर्थिक अभावों, परेशानियों में ही व्यतीत होता रहेगा और उसकी सन्तान अस्वस्थ, कमजोर स्मरणशक्ति वाली, पढाई-लिखाई में जी चुराने तथा पेट और यकृत के रोगों से पीडित रहेगी.
* यदि पूर्व दिशा में रिक्त स्थान न हो और बरामदे की ढलान पश्चिम दिशा की ओर हो, तो परिवार के मुखिया को आँखों की बीमारी, स्नायु अथवा ह्रदय रोग की स्मस्या का सामना करना पडता है.
* घर के पूर्वी भाग में कूडा-कर्कट, गन्दगी एवं पत्थर, मिट्टी इत्यादि के ढेर हों, तो गृहस्वामिनी में गर्भहानि का सामना करना पडता है.
* भवन के पश्चिम में नीचा या रिक्त स्थान हो, तो गृहस्वामी यकृत, गले, गाल ब्लैडर इत्यादि किसी बीमारी से परिवार को मंझधार में ही छोडकर अल्पावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है.
* यदि पूर्व की दिवार पश्चिम दिशा की दिवार से अधिक ऊँची हो, तो संतान हानि का सामना करना पडता है.
* अगर पूर्व दिशा में शौचालय का निर्माण किया जाए, तो घर की बहू-बेटियाँ अवश्य अस्वस्थ रहेंगीं.
बचाव के उपाय:-
* पूर्व दिशा में पानी, पानी की टंकी, नल, हैंडापम्प इत्यादि लगवाना शुभ रहेगा.
* पूर्व दिशा का प्रतिनिधि ग्रह सूर्य है, जो कि कालपुरूष के मुख का प्रतीक है. इसके लिए पूर्वी दिवार पर 'सूर्य यन्त्र' स्थापित करें और छत पर इस दिशा में लाल रंग का ध्वज(झंडा) लगायें.
* पूर्वी भाग को नीचा और साफ-सुथरा खाली रखने से घर के लोग स्वस्थ रहेंगें. धन और वंश की वृद्धि होगी तथा समाज में मान-प्रतिष्ठा बढेगी.
पश्चिम दिशा में दोष:-
पश्चिम दिशा का प्रतिनिधि ग्रह शनि है. यह स्थान कालपुरूष का पेट, गुप्ताँग एवं प्रजनन अंग है.
* यदि पश्चिम भाग के चबूतरे नीचे हों, तो परिवार में फेफडे, मुख, छाती और चमडी इत्यादि के रोगों का सामना करना पडता है.
* यदि भवन का पश्चिमी भाग नीचा होगा, तो पुरूष संतान की रोग बीमारी पर व्यर्थ धन का व्यय होता रहेगा.
* यदि घर के पश्चिम भाग का जल या वर्षा का जल पश्चिम से बहकर, बाहर जाए तो परिवार के पुरूष सदस्यों को लम्बी बीमारियों का शिकार होना पडेगा.
* यदि भवन का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा की ओर हो, तो अकारण व्यर्थ में धन का अपव्यय होता रहेगा.
* यदि पश्चिम दिशा की दिवार में दरारें आ जायें, तो गृहस्वामी के गुप्ताँग में अवश्य कोई बीमारी होगी.
* यदि पश्चिम दिशा में रसोईघर अथवा अन्य किसी प्रकार से अग्नि का स्थान हो, तो पारिवारिक सदस्यों को गर्मी, पित्त और फोडे-फिन्सी, मस्से इत्यादि की शिकायत रहेगी.
बचाव के उपाय:-
* ऎसी स्थिति में पश्चिमी दिवार पर 'वरूण यन्त्र' स्थापित करें.
* परिवार का मुखिया न्यूनतम 11 शनिवार लगातार उपवास रखें और गरीबों में काले चने वितरित करे.
* पश्चिम की दिवार को थोडा ऊँचा रखें और इस दिशा में ढाल न रखें.
* पश्चिम दिशा में अशोक का एक वृक्ष लगायें.
उत्तर दिशा में दोष-
उत्तर दिशा का प्रतिनिधि ग्रह बुध है और भारतीय वास्तुशास्त्र में इस दिशा को कालपुरूष का ह्रदय स्थल माना जाता है. जन्मकुंडली का चतुर्थ सुख भाव इसका कारक स्थान है.
* यदि उत्तर दिशा ऊँची हो और उसमें चबूतरे बने हों, तो घर में गुर्दे का रोग, कान का रोग, रक्त संबंधी बीमारियाँ, थकावट, आलस, घुटने इत्यादि की बीमारियाँ बनी रहेंगीं.
* यदि उत्तर दिशा अधिक उन्नत हो, तो परिवार की स्त्रियों को रूग्णता का शिकार होना पडता है.
बचाव के उपाय :-
यदि उत्तर दिशा की ओर बरामदे की ढाल रखी जाये, तो पारिवारिक सदस्यों विशेषतय: स्त्रियों का स्वास्थय उत्तम रहेगा. रोग-बीमारी पर अनावश्यक व्यय से बचे रहेंगें और उस परिवार में किसी को भी अकाल मृत्यु का सामना नहीं करना पडेगा.
* इस दिशा में दोष होने पर घर के पूजास्थल में 'बुध यन्त्र' स्थापित करें.
* परिवार का मुखिया 21 बुधवार लगातार उपवास रखे.
* भवन के प्रवेशद्वार पर संगीतमय घंटियाँ लगायें.
* उत्तर दिशा की दिवार पर हल्का हरा(Parrot Green) रंग करवायें.
दक्षिण दिशा में दोष:-
दक्षिण दिशा का प्रतिनिधि ग्रह मंगल है, जो कि कालपुरूष के बायें सीने, फेफडे और गुर्दे का प्रतिनिधित्व करता है. जन्मकुंडली का दशम भाव इस दिशा का कारक स्थान होता है.
* यदि घर की दक्षिण दिशा में कुआँ, दरार, कचरा, कूडादान, कोई पुराना सामान इत्यादि हो, तो गृहस्वामी को ह्रदय रोग, जोडों का दर्द, खून की कमी, पीलिया, आँखों की बीमारी, कोलेस्ट्राल बढ जाना अथवा हाजमे की खराबीजन्य विभिन्न प्रकार के रोगों का सामना करना पडता है.
* दक्षिण दिशा में उत्तरी दिशा से कम ऊँचा चबूतरा बनाया गया हो, तो परिवार की स्त्रियों को घबराहट, बेचैनी, ब्लडप्रैशर, मूर्च्छाजन्य रोगों  से पीडा का कष्ट भोगना पडता है.
* यदि दक्षिणी भाग नीचा हो, ओर उत्तर से अधिक रिक्त स्थान हो, तो परिवार के वृद्धजन सदैव अस्वस्थ रहेंगें. उन्हे उच्चरक्तचाप, पाचनक्रिया की गडबडी, खून की कमी, अचानक मृत्यु अथवा दुर्घटना का शिकार होना पडेगा. दक्षिण पिशाच का निवास है, इसलिए इस तरफ थोडी जगह खाली छोडकर ही भवन का निर्माण करवाना चाहिए.
* यदि किसी का घर दक्षिणमुखी हो ओर प्रवेश द्वार नैऋत्याभिमुख बनवा लिया जाए, तो ऎसा भवन दीर्घ व्याधियाँ एवं किसी पारिवारिक सदस्य को अकाल मृत्यु देने वाला होता है.
बचाव के उपाय:-
* यदि दक्षिणी भाग ऊँचा हो, तो घर-परिवार के सभी सदस्य पूर्णत: स्वस्थ एवं संपन्नता प्राप्त करेंगें. इस दिशा में किसी प्रकार का वास्तुजन्य दोष होने की स्थिति में छत पर लाल रक्तिम रंग का एक ध्वज अवश्य लगायें.
* घर के पूजनस्थल में 'श्री हनुमंतयन्त्र' स्थापित करें.
* दक्षिणमुखी द्वार पर एक ताम्र धातु का 'मंगलयन्त्र'  लगायें.
* प्रवेशद्वार के अन्दर-बाहर दोनों तरफ दक्षिणावर्ती सूँड वाले गणपति जी की लघु प्रतिमा लगायें.

वैदिक ज्योतिष और रोजगार की स्थिति

व्यक्ति को जीवन में रोजगार, व्यवसाय, पद प्राप्ति, नौकरी आदि के कौन से अवसर प्राप्त होंगे अथवा जातक की आर्थिक स्थिति कैसी रहेगी, इसके संबंध में अपने पाठकों को यहाँ विस्तार पूर्वक जानकारी प्रदान की जा रही है. यहां कुछ मूल सिद्धांतो, ग्रहों के सांमंजस्य से बनते रोजगार एवम व्यवसायों, पद प्राप्ति व नौकरी प्राप्ति से संबंधित समस्याओं पर प्रकाश डाला जा रहा है.

१. व्यक्ति को सरकारी सेवा/ नौकरी/रोजगार/व्यापार अथवा कोई पद प्राप्त होगा, जन्मकुंडली के प्रथम, द्वितीय, दशम एवम एकादश भावों में ग्रहों की स्थिति एवम इन भावों के स्वामी ग्रहों की स्थिति एवम इन सब पर पडते अन्य ग्रहों के प्रभाव पर निर्भर करती है. यदि दसवें भाव का स्वामी ग्रह किसी प्रकार भी पहले, दूसरे, छठें एवम ग्यारहवें भावों से संबंध रखता है तो व्यक्ति को हर हालत में अच्छे रोजगार की प्राप्ति होती है. तथा वो पूर्णतया लाभदायक सिद्ध होता है.

२. जन्मकुंडली में अधिकांश ग्रह जिन राशियों में हो उस राशि के तत्व गुण, स्वभाव एवम जिस जिस रोजगार को वह राशि सूचित करेती है, व्यक्ति का स्वाभाविक झुकाव उन्हीं कार्यों की तरफ़ होता है.

३. दो या दो से अधिक क्रूर ग्रहों के साथ केतु जब मेष, वृश्चिक, मकर या कुंभ में से किसी राशि में हो तो व्यक्ति को निराशा, असफ़लता, हार तथा बार बार नौकरी छूटने का काष्ट सहन करना पडता है.

४. दसवें भाव का स्वामी ग्रह शुभ स्थिति में नौवें या बारहवें भाव में वृहस्पति के साथ स्थित हो तो व्यक्ति विदेश में सफ़लता प्राप्त करता है.

५. जब जन्मकुंडली में शनि से आगे राहु ( जैसे जन्मकुंडली में शनि पांचवें भाव में और राहु सातवें भाव में हो) होता है और इन दोनों के मध्य अन्य कोई ग्रह ना हो तो व्यक्ति को पहले ३५ वर्ष तक की आयु में रोजगार संबम्धी कष्टों और परेशानियों का सामना करना पडता है. किसी भी काम में उसके पूरी तरह से पैर नही जम पाते.

६. जन्मकुंडली मे बुध ग्रह कहीं भी अकेला एवम अशुभ प्रभाव से दूर हो तो व्यापार में जातक अत्यधिक उन्नति प्राप्त करता है.

७. यदि अधिकांश ग्रह जनमकुंडली में तीसरे, दसवें, ग्यारहवें एवम बारहवें अथवा ७, ८, ९, १०. ११ एवम १२ वें भाव में बैठे हों और उन्हीं में सूर्य ग्रह भी सम्मिलित हो तो जातक के लिये नौकरी करना अथवा जनहित विभागों में कार्य करना ही लाभ प्रद रहता है. ऐसे व्यक्ति व्यापार में कभी प्रगति नही कर सकते.



10 वें भाव में स्थित ग्रह अथवा 10 वें भाव का स्वामी ग्रह


रोजगार/ व्यवसाय
सूर्य
बहुत आशाएं और उमंगे रखने वाला, जीवन में उच्च अधिकारी बनना चाहे, उच्च पद प्राप्ति, सरकारी सेवा सेवा नौकरी में रहना कठिन, डाक्टर, लीडर या प्रबंधकीय कार्यों में सलंग्न.
चंद्रमा
व्यापार, प्रोविजन स्टोर, कृषि, जलीय पदार्थ, पैतृक व्यवसाय में सलंग्न, रोजगार में परिवर्तन हेतुबार बार विचार उठते रहें.
मंगल
जोखिम के कार्य, पुलिस सेना, मैक्नीकल, सर्जन, धातु का कार्य, केमिस्ट, फ़ायर ब्रिगेड, होटल, ढाबा, अग्नि से संबंधित कार्य, डाईवर, मेकेनिक एवम इंजीनीयर आदि.
बुध
व्यापारी, ज्योतिषी, प्रिंटिंग कार्य, सेकेरेट्री, लेखक, अकाऊंटेंट, क्लर्क, आडीटर, एजेंट, पुस्तक विक्रेता, दलाल, अनुवादक, अध्यापक, सहायक, नर्सिंग, मुंशी, स्पीडपोस्ट, कोरियर इत्यादि का कार्य.
गुरू
शिक्षक, प्रकाशक, जज, न्यायाधीश, वकील, धार्मिक नेता, कथावाचक, पुरोहित, बैंक अधिकारी, मेनेजर, कपडा स्टोर, प्रोविजन स्टोर, सलाहकारिता आदि के कार्य
शुक्र
स्वास्थ्य विभाग, अस्पताल, मेटरनिटी होम, सोसायटी, रेस्टोरेंट, रेडीमेड वस्त्र, मनियारी की दुकान, फ़ोटोग्राफ़ी, गिफ़्ट आयटम, आभूषण एवम स्त्री से संबंधित विभाग/कार्यक्षेत्र
शनि
लेबर, लेबर विभाग, प्रबंधक या फ़िर अधिनस्थ सेवा में उच्चपद, अधिकारी, उद्योगपति, डाक्टर, रंग रसायन, पेट्रोकेमिकल इत्यादि.

सब्र संतोष, सुझबूझ रखे तो व्यवसाय ठीक चले, जल्दबाजी करे तो मुश्किले खडी हों और हानि हो, दुर्घटनाएं, निराशा एवम घाटे का मुंह देखना पडे.
राहु
डाक्टर, कसाई, सफ़ाई कर्मचारी, जेल विभाग, विद्युत विभाग, लेखक उच्चाधिकारी एवम उच्च पद प्राप्ति.

यदि सूझबूझ रखे और दिमाग से काम ले तो उन्नति करे नही तो अपना काम खुद ही बिगाडे.
केतु
गुप्त विद्या, तांत्रिक, ज्योतिषि, होम्योपैथी/आयुर्वेद/नेचरोपैथी का डाक्टर, ट्रेवल एजेंट, फ़र्नीचर का काम, पशुओं का व्यापारी.

जितना घूमने फ़िरने वाला हो उतना ही लाभ प्राप्त करे.

साढेसाती क्या है ?

साढेसाती क्या है ?
साढेसाती वह समय है, जब जीवनकाल में जन्मराशि अर्थात चन्द्रराशि से शनि 12वें स्थान पर आता है. शनि एक राशि में लगभग अढाई वर्ष रहता है. जब शनि 12वें स्थान पर आता है तो साढेसाती आरम्भ होती है और जब जन्म अर्थात चन्द्रराशि से दूसरे स्थान से निकलता है तो यह समाप्त होती है. तीन राशियों में शनि का कुल समय साढे 7 वर्ष बनता है, इसलिए इसे साढेसाती कहा जाता है. शनि समस्त 12 राशियों के चक्र को 30 वर्ष की अवधि में पूर्ण करता है. इस तरह किसी भी व्यक्ति के जीवन में साढेसाती अधिकतम कुल तीन बार ही आ सकती है.
साढेसाती का प्रभाव एवं फल
जब भी कोई ज्योतिषी व्यक्ति को यह बताता है कि उसकी साढेसाती आरम्भ हो गई है तो साधारण व्यक्ति का मनोबल यह सुनते ही गिर जाता है. वह तुरन्त सोचने लगता है कि अब उसपर दु:खों, मुसीबतों तथा कठिनाईयों का पहाड टूट पडेगा, क्योंकि साढेसाती सम्बन्धी साधारण लोगों के मन में कुछ इसी प्रकार की गलत धारणा, शंका एवं भय पाया जाता है. जिसका मुख्य कारण अधकचरे ज्योतिषियों द्वारा लोगों के मन में साढेसाती सम्बन्धी अशुभ प्रभावों की बडी ही भयानक तस्वीर निर्मित कर दी गई है. ताकि जहाँ ओर साढेसाती की आड लेकर अपनी ज्योतिषीय अज्ञानता पर पर्दा डाला जा सके और दूसरे इसके जरिये  साधारण जनता के भय का दोहन भी किया जाता रहे. यही कारण है कि जब कोई आम व्यक्ति किसी कष्ट, परेशानी, संकट में फंस जाता है तो वो यही समझने लगता है कि उसकी साढेसाती आरम्भ हो गई है. अब चाहे वो हुई हो या नहीं. चाहे उसके पीछे उसका अपना ही कोई कार्मिक दोष अथवा जन्मकुंडली में प्रतिकूल ग्रहदशा ही कारण क्यों न हो, लेकिन उसके मन में यही विचार आता है कि जरूर उसे शनि की साढेसाती लग गई है. यह साढेसाती के नाम पर फैलाये गये भ्रम और भय का ही परिणाम है. पंडितों द्वारा साढेसाती का हौव्वा दिखलाकर तरह-तरह के दान-पुण्य एवं उपाय बतला अथवा करवा दिए जाते हैं, जिसके कि बेचारा एक आम व्यक्ति ओर भी अधिक चक्रव्यूह में फँस जाता है.
यद्यपि, साढेसाती के कुछ समय में, कुछेक जातकों पर कुप्रभाव होते हैं, जैसे किसी भीषण शारीरिक व्याधि का होना, माता-पिता अथवा जीवनसाथी से मतभेद, रोजगार में नुक्सान, उन्नति में बाधा अथवा अन्य किसी प्रकार की चिन्ता, हानि, परेशानी आदि-------परन्तु जितना इसका दु:ष्प्रभाव होता नहीं, उससे कहीं अधिक लोगों के मन में इसका भय पैदा कर दिया गया है. अत: साढेसाती आरम्भ होने पर किसी प्रकार के भय की कोई आवश्यकता नहीं बल्कि इस अवधि में स्वयं को समझने एवं आत्मबल को सशक्त बनाने का सुअवसर समझना चाहिए तथा इसके शुभ प्रभावों के सम्बन्ध में ही विचार करना चाहिए. यह सदैव स्मरण रखने की आवश्यकता है कि जन्मकुंडली में जब कोई ग्रह बुरे स्थान पर आता है तो कोई न कोई शुभ ग्रह भी बचाव हेतु शुभ स्थान पर आ विराजमान होता है. तभी तो कहा गया है कि मारने वाले से बचाने वाला सदैव बलवान होता है. इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ही शनि की साढेसाती के शुभ/अशुभ प्रभाव बारे विचार करना चाहिए....
अलग अलग राशियों पर पडने वाला शनि की साढेसाती का प्रभाव

जन्म राशि


साढेसाती का प्रभाव

मेष मध्य के अढाई वर्ष अशुभ
वृष आरम्भिक अढाई वर्ष अशुभ
मिथुन अन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
कर्क अन्तिम 5 वर्ष अशुभ
सिँह प्रथम 5 वर्ष अशुभ
कन्या आरम्भिक अढाई वर्ष अशुभ
तुला अन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
वृश्चिक अन्तिम 5 वर्ष अशुभ
धनु प्रारम्भिक 5 वर्ष अशुभ
मकर अन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
कुम्भ अन्तिम अढाई वर्ष अशुभ
मीन अन्तिम अढाई वर्ष अशुभ

अंक 5 का महत्व

अंक 5 का महत्व
5 का अंक मनुष्य की प्राकृतिक विशेषताओं को व्यक्त करता है, जो कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश नामक इन पंच तत्वों के आधार पर निर्मित है. हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों में भी पंचभूत अर्थात पाँच देवताओं का वर्णन मिलता है. पाँच वस्तुओं का जहाँ आध्यात्मिक महत्व हैं, वहीं सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक जीवन में भी 5 का अंक अपना सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान रखता है. भारत में जिस प्रकार धार्मिक रूप से 5 को पवित्र तथा प्रबुद्ध अंक माना जाता है, वैसे ही चीन में भी इसे ईश्वरीय शक्ति का मेरूदंड कहा गया है. अंक ज्योतिष में 5 की उपलब्धि को अत्यंत भाग्यवर्द्धक स्वीकार किया गया है. 5 प्रकार के दंड विधान और पाँच ही भौतिक तत्व हैं.  ये पाँच भौतिक तत्व हैं------मिट्टी, लकडी, धातु,अग्नि और जल. जिनका अधिकार सूर्य आदि प्रमुख पाँच ग्रहों के अधीन है.
शनि---पृथ्वी अर्थात मिट्टी का अधिपति है.
बृहस्पति---काष्ठ अर्थात लकडी का अधिपति है.
शुक्र--सोना, चाँदी, ताँबा इत्यादि समस्त धातुओं का प्रतिनिधित्व करता है.
मंगल----अग्नि का अधिपति है.
चन्द्रमा------जलतत्व का अधिपति है.
मनुष्य के आचरण और चरित्र के व्यवहार को पाँच नियमों बाँधा जाता है-----जैसे संतान के प्रति वात्सल्य प्रेम, स्वामी-भक्ति, दापत्य जीवन की कर्तव्यनिष्ठा, आज्ञाकारिता और सदाश्यता. इन पाँचों चरित्रगुणों का संबंध मनुष्य के कर्म व्यवहार से जुडा है. इस प्रकार आप जान सकते हैं कि 5 का अंक मानवता और  मानवीय सम्बंधों का सूत्रधार अंक है. मनुष्य एक ऎसे धरातल के मध्य स्थित है, जहाँ एक ओर आँखों से दिखाई पडने वाला ये प्रत्यक्ष संसार है, वहीं दूसरी ओर अप्रत्यक्ष विश्व. इसके अनन्तर वह वास्तविक(Material) तथा अवास्तविक(Immaterial) संसार को मापने में व्यस्त है, जिसमें उसकी सहायता करते हैं अनुभूति तथा विचार. मनुष्य जो कि भौतिक और अभौतिक तत्वों का मूर्त रूप है, उसमें ब्राह्मंड का सार भी निहित है. वह इस विशाल ब्राह्मंड का ही सूक्ष्म अणु तत्व है. मानव जीवन रहस्य अंकों की सजीवता से बहुत गहराई से जुडा हुआ है, जिसे लाख चाहने पर भी नकारा नहीं जा सकता.

तयशुदा शादी या प्रेमविवाह ( Love Marrige or Arrange Marrige)

जब भी लड़का और लड़की के बीच प्रेम हो जाता है तो प्रेम की अंतिम परिणीति वो विवाह के रूप में करना चाहते हैं. कुछ लोग इसमे कामयाब हो जाते हैं और कुछ नाकाम होते देखे गये हैं. अब जन्मकुंडली के वो कौन से योग हैं जिनके फ़लित होने से प्रेम विवाह में सफ़लता मिलती है.

अगर जन्म कुंडली में चतुर्थेश दशम भावगत हो तो जातक/जातिका अवश्य ही प्रेम विवाह करते हैं चाहे जितनी भी बाधायें, उन्हें आसानी से पार कर लेते हैं.

इसके अलावा ज्योतिष में "शुक्र ग्रह" को प्रेम का कारक ग्रह माना जाता है जन्म कुण्डली में शुक्र का सम्बन्ध लग्न, पंचम, सप्तम तथा एकादश भावों से होने पर जातक प्रेमी स्वभाव का होता है. पर स्वभाव का विवाह में परिणत होना तभी संभव होगा जब इनका सप्तम से बलि और शुभ संबंध बन रहा हो. क्योंकि इस योग में लग्न पंचम और नवम त्रिकोण का सप्तम भाव से संबंध बन जाता है जो सफ़ल और सुखी दांपत्य जीवन देने में सक्षम सिद्ध होता है.

पंचम भाव का स्वामी पंचमेश शुक्र अगर सप्तम भाव में स्थित है तब भी प्रेम विवाह की प्रबल संभावना बनती है. शुक्र अगर अपने घर में मौजूद हो तब भी प्रेम विवाह का योग बनता है. अगर ये स्थियां जन्मकुंडली में ना हों तब भी अनेक योग मौजूद होकर प्रेम विवाह में सहायक सिद्ध होते हैं जैसे अगर कुण्डली में प्रेम विवाह योग नहीं है और नवमांश कुण्डली में सप्तमेश और नवमेश की युति होती है तब तो प्रेम विवाह की संभावना सौ प्रतिशत हो जाती है. प्रेम का कारक बलि और शुभ शुक्र ग्रह लग्न में मौजूद हो और साथ में लग्नेश भी वही बैथे हों तो प्रेम विवाह निश्चित तौर पर होता ही है.

शनि और केतु जैसे पापी ग्रहों की सप्तम भाव में युति प्रेम विवाह के लिये अति शुभ संकेत होता है।

शिक्षा में बाधा और ज्योतिषीय परामर्श

प्राय: देखा गया है कि अच्छी भली चलते विद्याअध्ययन में रूकावट खडी हो जाती है. जन्मकुंडली में शिक्षा से संबंधित कुछ ऐसे बाधा योग उपस्थित हो जाते हैं कि जन्म कुंडली में उच्च शिक्षा का योग होने पर भी कभी-कभी जातक उच्च शिक्षा प्राप्त करना तो दूर बल्कि सामान्य शिक्षा भी प्राप्त नही कर पाता. शिक्षा प्राप्ति में कुछ रुकावट वाले वाले योगइस प्रकार होते हैं.

यदि पंचमेश 6, 8 या 12 वें भाव में स्थित हो या किसी अशुभ ग्रह के साथ स्थित हो या अशुभ ग्रह से देखा जाता हो, तो जातक को शिक्षा प्राप्त करने में बाधा आती हैं. ज्यादातर शिक्षा प्राप्ति के समय यदि राहु की महादशा आ जाये तो जातक का मन विध्याअध्ययन के प्रति ऊब जाता है और वो अन्य सांसारिक पचडों में उलझ जाता है. जातक की कुंडली में अगर गुरु या बुध 3, 6, 8 या 12 वें भावगत हो, शत्रुगृही हो, तो शिक्षा प्राप्ति में अनावश्यक अवरोध खडा हो जाता है.

जातक की जन्म कुंडली में द्वितीय भाव में अशुभ ग्रह स्थित हो अथवा अशुभ ग्रहो का संबंध किसी भी रूप में द्वितीय भाव को दूषित कर रहा हो , तो विद्या प्राप्ति में रूकावट समझना चाहिये. इसी समय में अगर जातक की दशा अंतर्दशाओं में द्वितियेश का अष्टम भाव से संबंध बन जाये तो निश्चय ही शिक्षा में बाधा आयेगी.

इसके अलावा जन्म कुंडली में शनि पंचम भाव अथवा अष्टम भावगत हो तो भी शिक्षा अपूर्ण ही रह जाती है. पंचम भाव, पंचमेश, तृतीयेश, या नवमेष पर अशुभ प्रभाव हो, तो विद्या अध्ययन में व्यवधान आ जाता हैं धन, विद्या, वाणी एवं स्वयं के कोष के लिये द्वितीय भाव से विचार करना चाहिए.

विद्या अध्ययन में व्यवधान दूर करने के उपाय:-

अगर ग्रहों की अशुभ स्थिति के कारण अथवा किन्ही तात्कालिक अंतर्दशाओं की वजह से विद्या प्राप्ति में अडचन खदी हो रही हो, बालक की स्मरण शक्ति कमजोर हो अथवा एकाग्रता की कमी हो रही हो, इस स्थिति में अभिमंत्रित किया हुआ सरस्वती कवच एवं यंत्र धारण करना चाहिये.

अभिमंत्रित तीन मुखी रूद्राक्ष गले में, काले धागे में धारण करवाने से मन विद्या अध्ययन में एकाग्र होता है.

जन्म कुंडली में उच्च शिक्षा का योग विद्यमान हो, इसके बावजूद भी शिक्षा में अशुभ ग्रहों की दशा/अंतर्दशाओं के कारण अडचन आरही हो तो संबंधित ग्रह की शांति हेतु उस ग्रह से संबंधित यंत्र/कवच जातक के बेडरूम में स्थापित करने से अत्यंत मंगल दायक फ़ल प्राप्त होते हैं, इसके अलावा किसी योग्य देवैज्ञ से सलाह लेकर भी उपाय किये जा सकते हैं.

कैसे हैं आपके शिक्षा योग?

जातक के शिक्षा योग कैसे हैं? यह एक सहज जिज्ञासा होती है जिसके बारे में जन्मकुंडली के चतुर्थ भाव के अधिपति की स्थिति से सहज ही जानकारी प्राप्त की जा सकती है. यानि चतुर्थेश कुंडली के जिस भाव में बैठा हो उसके अनुसार परिणाम प्राप्त होते हैं. नीचे हम सभी भावों की स्थिति के अनुसार फ़ल बता रहे हैं.

प्रथम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के प्रथम भाव में बैठा हो तो जातक जीवन में अच्छी विद्या प्राप्त करता है जो उसको लाभदायक रहती है.

द्वितीय भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के द्वितीय भाव में बैठा हो तो ऐसा जातक विद्या अवश्य प्राप्त करता है भले ही उसके पालकों की आर्थिक हैसियत उसे पढाने लायक ना हो तो भी.

तृतीय भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के तृतीय भाव में बैठा हो तो जातक की विद्या प्राप्त करने में उसकी माता की विशेष भूमिका होती है. माता की मेहनत से ऐसा जातक शिक्षा प्राप्त कर लेता है.

चतुर्त भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के चतुर्थ भाव में ही बैठा हो तो ऐसा जातक बहुत ही उत्तम विद्या प्राप्त करता है.

पंचम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के पंचम भाव में बैठा हो तो ऐसा जातक अनेक प्रकार की बाधाओं के साथ विद्या प्राप्त करता है और जातक अपने जीवन में ऐसी विद्या का कोई उपयोग नही कर पाता है.

षष्ठ भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के षष्ठ भाव में बैठा हो तो ऐसे जातक को विद्याध्ययन में बहुत अडेचने आती हैं परंतु उसे विद्या लाभकारी होती है.

सप्तम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के सप्तम भाव में बैठा हो तो और ऐसे जातक की विद्या २२ साल की उम्र के पहले पूर्ण हो जाती है और उससे जातक लाभ प्राप्त करता है. यदि २२ साल की उम्र के पहले विवाह हो जाये तो उसकी विद्या प्राप्ति में विघ्न उत्पन्न हो जाते हैं.

अष्टम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के अष्टम भाव में बैठा हो तो ऐसे जातक को मातृ सुख में कमी होती है और मातृ सुख के अभाव वश विद्या में न्युनता.

नवम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के नवम भाव में बैठा हो तो ऐसा जातक प्रचारक, आलोचक, एवम शिक्षक होता है चाहे पूरी विद्या प्राप्त की हो या नही.

दशम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के दशम भाव में बैठा हो तो ऐसे जातक को स्कूल जाने में डर लगता है और विद्या में कमी रहती है. ऐसा जातक अपने पिता का कार्य संभालता है.

एकादशम भाव - अगर चतुर्थेश कुंडली के एकादश भाव में बैठा हो तो ऐसा जातक अनेक रूकावटों के साथ विद्या प्राप्त करता है.

द्वादश भाव - ऐसा जातक घर के बाहर रहकर विद्या प्राप्त करता है. ऐसा जातक पढे तो पूरा पढे वर्ना एकांत में बैठा विद्या प्राप्त करने के सपने लेने वाला होता है.

मेष लग्न की संक्षिप्त और सारगर्भित विवेचना

आकाश के 0 डिग्री से 30 डिग्री तक के भाग को मेष राशि के नाम से जाना जाता है. जिस जातक के जन्‍म के समय यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है , उस जातक का लग्‍न मेष माना जाता है.

मेष लग्‍न में मन का स्‍वामी चंद्र चतुर्थ भाव का अधिपति (चतुर्थेश) होता है एवम यह जातक के माता, भूमि भवन, वाहन, चतुष्पद, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपति, दया, परोपकार, कपट, छल, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थो का सेवन, संचित धन, झूंठा आरोप, अफ़वाह, प्रेम, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह को अभिव्यक्त करता है. जन्‍मकुंडली अथवा दशाकाल में चंद्रमा के कमजोर/बलशाली होने से ऊपर बताये गये विषयों के सुख दुख की प्राप्ति होती है. इन सब के लिये चंद्र्मा के साथ साथ अन्य ग्रहों की युति एवम दॄष्टि का भलिभांति अध्ययन कर लेना चाहिये.

प्रकाश फ़ैलाने वाला सूर्य पंचम भाव का स्‍वामी (पंचमेश) होता है. जातक के बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायस धन प्राप्ति, जुआ, लाटरी, सट्टा, जठराग्नि, पुत्र संतान, मंत्र द्वारा पूजा, व्रत उपवास, हाथ का यश, कुक्षी, स्वाभिमान, अहंकार को अभिव्यक्त करता है. जन्‍मकुंडली या दशाकाल में सूर्य की अच्छी बुरी स्थिति अनुसार ही इन फ़लों की न्यूनाधिकता रहती है. भलिभांति सूर्य की स्थिति का अध्ययन करके इन बातों का जातक कितना लाभ ले सकेगा, यह पता लगता है. सूर्य बली हो तो अच्छे फ़लों में वॄद्धि होती है और कमजोर सुर्य इन फ़लों में कमी उत्पन्न करता है.

मंगल प्रथम और अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है. यह लग्नेश होने के नाते जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख दुख, विवेक, मष्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, आकॄति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधि होता है. मेष लग्न में अगर मंगल बलशाली हो तो समस्त कुंडली में शुभ फ़ल अधिक प्राप्त होते हैं, बलवान और शुभ मंगल फ़लों में वॄद्धिकारक होता है जबकि कमजोर मंगल इन फ़लों में न्यूनता पैदा करता है.

लग्नेश के साथ साथ मेष लग्न में मंगल अष्ट भाव का प्रतिनिधि यानि अष्टमेश भी होता है. अष्टमेश होने नाते मंगल, व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि का भी प्रतिनिधि है. इन समस्त फ़लों के बारे में मंगल की स्थिति का अध्ययन करके ही जाना जा सकता है. मेष लग्न में मंगल लग्नेश होकर अष्टमेश है इसलिये उसे अष्टमेश होने का दोषी नही माना जाता, अगर मंगल शुभ और बलि हो तो मेष लग्न में शुभ फ़लों की अतिशय वॄद्धि ही करता है. अशुभ अथवा नीच, कमजोर होने से किंचित अशुभ फ़ल भी प्रदान करता है.

शुक्र द्वितीय और सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है , यहां शुक्र की स्थिति का भलिभांति अध्ययन कर लेना चाहिये. क्योंकि शुक्र यहां द्वितियेश होने के नाते धन और कुटुंब का प्रतिनिधि है और सप्तमेष होने से जीवन के एक प्रमुख भाव यानि विवाह का भी प्रतिनिधि है.

कुल, आंख (दाहिनी), नाक, गला, कान, स्वर, हीरे मोती, रत्न आभूषण, सौंदर्य, गायन, संभाषण, कुटुंब एवम विद्या के मामले यहां द्वितियेश होने के कारण शुक्र के अधीन है, बलि और शुभ प्रभाव वाला शुक्र इन फ़लों में वॄद्धि करेगा और हीनबलि व कमजोर शुक्र इन मामलों में न्यूनता प्रदान करेगा.

लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार इत्यादि के मामले मेष लग्न में सप्तमेष होने के नाते शुक्र के अधीनस्थ होते हैं. शुभ और बलवान शुक्र इन फ़लों में अतिशय शुभ फ़लकारी होता है और कमजोर और पाप प्रभाव वाला शुक्र इन मामलों में न्यूनता देता है.

बुध, मेष लग्न में तृतीय भाव का स्‍वामी यानि तॄतीयेश होता है. यहां बुध नौकर चाकर, सहोदर, प्राकर्म, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्य़ुटर, अकाऊंट्स, मोबाईल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योग्याभ्यास, दासता इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. शुभ और बलवान बुध यहां शुभ फ़लों का वॄद्धिकारक होता है जबकि कमजोर और पाप प्रभाव वाला बुध इन फ़लों में कमी और अशुभता प्रदान करता है.

बृहस्‍पति नवम भाव का स्‍वामी यानि नवमेश होता है. इस लग्न मे धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, शील, तप, प्रवास, पिता का सुख, तीर्थयात्रा, दान, पीपल इत्यादि का प्रतिनिधि वॄहस्पति यानि गुरू होता है. शुभ और बलवान वॄहस्पति की स्थिति मेष लग्न के जातको को वर्णित फ़लों की अतिशय शुभकारक प्राप्ति करवाता है जबकि हीनबलि और पाप प्रभाव वाला गुरू जैसा शुभ ग्रह भी इन फ़लों को देने में असमर्थ होता है.

शनि दशम (दशमेश) और एकादश भाव (एकादशेश) का अधिपति होता है. दशमाधिपति होने के नाते राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतॄत्व, विदेश यात्रा, पैतॄक संपति इत्यादि का प्रतिनिधि होता है. एवम एकादश भाव का प्रतिनिधि होने के नाते लोभ, लाभ, स्वार्थ, गुलामी, दासता, संतान हीनता, कन्या संतति, ताऊ, चाचा, भुवा, बडे भाई बहिन, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, बेईमानी इत्यादि विषय का प्रतिनिधि होता है.

बलि और शुभ प्रभाव वाला शनि उपरोक्त विषयगत फ़लों में शुभ और कमजोर व पाप प्रभाव वाला शनि अशुभ फ़ल प्रदान करता है.

राहु षष्ठ भाव का अधिपति यानि षष्ठेश होता है. रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, शंका, पीडा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वॄति, साहुकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि के फ़लों का दायित्व राहु पर होता है. अगर राहु शुभ प्रभाव युक्त हो तो शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं और अशुभ प्रभाव वाले राहु की वजह से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

केतु बारहवें भाव का अधिपति यानि द्वादशेश होता है. निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, मूर्छा, कुत्ता, मछली, मोक्ष, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लम्पटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण इत्यादि विषयों का दायित्व केतु पर होता है. अगर केतु शुभ प्रभाव युक्त हो तो अत्यंत शुभ प्राप्त होते हैं और अशुभ और पाप प्रभाव युक्त केतु के अतिशय अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

स्मरण रहे कि युं तो जन्मकुंडली के सभी ग्रह अपनी शुभता अशुभता का फ़ल जीवन पर्यन्त ही देते रहते हैं किंतु अपनी दशा अंतर्दशा में संपूर्ण रूप से प्रभावी होकर शुभ अशुभ फ़लों के दाता बनते हैं.