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हस्त रेखाओं द्वारा रोग की पहचान और उपाय

समस्त रोगों का मूल पेट है। जब तक पेट नियंत्रण में रहता है, स्वास्थ्य ठीक रहता है। ज्योतिषीय दृष्टि से हस्तरेखाओं के माध्यम से भी पेटजनित रोग और पेट की शिकायतों के बारे में जाना जा सकता है। हथेली पर हृदय रेखा, मस्तिष्क रेखा और नाखूनों के अध्ययन के साथ ही मंगल और राहू किस स्थिति में हैं, यह देखना बहुत जरूरी है।

जिन व्यक्तियों का मंगल अच्छा नहीं होता है, उनमें क्रोध और आवेश की अधिकता रहती है। ऐसे व्यक्ति छोटी-छोटी बातों पर भी उबल पड़ते हैं। अन्य व्यक्तियों द्वारा समझाने का प्रयास भी ऐसे व्यक्तियों के क्रोध के आगे बेकार हो जाता है। क्रोध और आवेश के कारण ऐसे लोगों का खून एकदम गर्म हो जाता है। लहू की गति (रक्तचाप) के अनुसार क्रोध का प्रभाव भी घटता-बढ़ता रहता है। राहू के कारण जातक अपने आर्थिक वादे पूर्ण नहीं कर पाता है। इस कारण भी वह तनाव और मानसिक संत्रास का शिकार हो जाता है।

हथेली पर हृदय रेखा टूट रही हो या फिर चेननुमा हो, नाखूनों पर खड़ी रेखाएँ बन गई हों तो ऐसे व्यक्ति को हृदय संबंधी शिकायतें, रक्त शोधन में अथवा रक्त संचार में व्यवधान पैदा होता है। यदि जातक का चंद्र कमजोर हो तो उसे शीतकारी पदार्थ जैसे दही, मट्ठा, छाछ, मिठाई और शीतल पेयों से दूर रहना चाहिए।

इसी तरह मंगल अच्छा न हो तो मिर्च-मसाले वाली खुराक नहीं लेनी चाहिए। तली हुई चीजें जैसे सेंव, चिवड़ा, पापड़, भजिए, पराठे इत्यादि से भी परहेज रखना चाहिए। ऐसे जातक को चाहिए कि वह सुबह-शाम दूध पीएँ, देर रात्रि तक जागरण न करें और सुबह-शाम के भोजन का समय निर्धारित कर ले। सुबह-शाम केले का सेवन भी लाभप्रद होता है।

पेट की खराबी से शरीर में गर्मी बढ़ जाती है और फिर इसी वजह से रक्तविकार पैदा होते हैं, जो आगे चलकर कैंसर का रूप तक अख्तियार कर सकते हैं। यह मत विश्व प्रसिद्ध हस्तरेखा शास्त्री डॉ. आउंट लुईस का है। जिस व्यक्ति के हाथ का आकार व्यावहारिक हो और साथ ही व्यावहारिक चिह्नों वाला हो तो ऐसा जातक अपने जीवन में काफी नियमित रहता है।

ऐसा जातक वृद्धावस्था में भी स्वस्थ रहता है। इसी तरह विशिष्ट बनावट के हाथ या कोणीय आकार के हाथ, जिसमें चंद्र और मंगल पर शुक्र का अधिपत्य हो तो ऐसे लोग स्वादिष्ट भोजन के शौकीन होते हैं। शुक्र प्रधान होने के कारण भोजन का समय नियमित नहीं रहता है। ऐसे में उदर विकार स्वाभाविक ही है। इस पर यदि हृदय रेखा मस्तिष्क रेखा और मंगल-राहू अच्छे न हों तो रक्तजनित रोगों की आशंका बढ़ जाती है।

हस्तरेखा देखकर कैंसर की पूर्व चेतावनी दी जा सकती है और इस जानलेवा बीमारी के संकेत चिन्ह हथेली पर देखे जा सकते हैं। मस्तिष्क रेखा पर द्वीप समूह या पूरी मस्तिष्क रेखा पर बारीक-बारीक लाइनें हो तो ऐसे जातक को कैंसर की पूरी आशंका रहती है। ऐसी स्थिति में यदि मेडिकल टेस्ट करा लिया जाए और उसमें कोई लक्षण न मिलें, तब भी जातक की जीवनशैली में आवश्यक फेरबदल कर उसे भविष्य में कैंसर के आक्रमण से बचाया जा सकता है।

नाडी ज्योतिष

"नाडी".....अर्थात ज्योतिष शास्त्र; बिना बताये आपका पूरा नाम व जन्म वृतान्त बताने वाला दक्षिण भारत में प्रचलित नाडी-शास्त्र

नाडी का अर्थ तथा अभिप्राय
----"नाडी" शब्द के योम तो कईं अर्थ हैं, परन्तु ज्योतिष शास्त्र में "नाडी" का तात्पर्य समय की एक मात्रा का नाम है, जो आधे 'मुहूर्त' अथवा 24 मिनट के बराबर होती है. नाडी शब्द यद्यपि समय-वाचक है तथापि यह "ज्योतिष-शास्त्र" के अर्थ में प्रयुक्त होता है.

नाडी शब्द दक्षिण भारत में अधिक प्रचलित रहा है. वहाँ कईं "नाडी-ग्रन्थ" लिखे गए और उनमें से अनेक आज भी विद्यमान हैं. परन्तु ये नाडी-ग्रन्थ" कोई ज्योतिष के सामान्य ग्रन्थ नहीं हैं कि जिनमें सिर्फ ज्योतिष के सिद्धान्तों का ही वर्णन हो. ये तो इन्सान के प्राय: समस्त जीवन की घटनाओं का वर्णन करने वाले ग्रन्थ हैं. इतने ग्रह-स्थिति आदि का वर्णन तो केवल उतना ही है, जिससे यह पता चल जाये कि ये जन्मकुंडली अमुक व्यक्ति की है. दूसरे शब्दों में-------नाडी-ग्रन्थों का वर्णन यद्यपि ग्रह-स्थिति पर आधारित है, तो भी वे जीवन के सम्पूर्ण फलादेश को बताने वाले हैं, न कि ज्योतिष के सिद्धान्तों की जानकारी देने वाले. अर्थात यह नहीं बताते कि अमुक घटना क्यों और ज्योतिष के किस नियम के आधार पर हुई?

नाडी-शास्त्र की विशेषता:---- जैसे उत्तर भारत में 'भृगु-शास्त्र', 'अरूण संहिता', 'रावण-संहिता' आदि ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं, जो भविष्य में जन्म लेने वाले या आज से पहले जो जन्म ले चुके हैं----उन सभी मनुष्यों के जीवन में घटने वाली सभी घटनाओं का विस्तृत वर्णन देते हैं; उसी प्रकार दक्षिण भारत में 'नन्दी-नाड', 'शुक्र-नाडी', 'भुजन्दर-नाडी', 'सप्तऋषि-नाडी', 'चन्द्रकला-नाडी' आदि कईं नाडी-ग्रन्थ हैं; जिनमें चमत्कारिक रूप से मनुष्यों के जीवन का भूत और भविष्य का सम्पूर्ण वृतान्त पहले से ही लिख रखा है.

आप लोग यह जानकर आश्चर्यचकित रह जाएंगें---जब आप इन नाडी-ग्रन्थों के द्वारा अपना जीवन भविष्यफल जानना चाहेंगें तो आपसे बिना पूछे आपका पूरा नाम आपको बताया जाएगा. उदाहरण के लिए आप को बताया जाएगा कि आपका नाम 'रमेश कुमार' है. आपकी माता का नाम 'श्रीमति विमला देवी' है, आपके पिता का नाम ' श्री जगदीश चन्द्र' है, आपकी पत्नि का नाम 'सुमन' है. इसके अतिरिक्त आपको यह भी बताया जाएगा कि आपका जन्म किस गाँव या शहर में हुआ था.

नामों के अतिरिक्त आपकी वर्तमान उम्र तक के मोटे-मोटे हालात जैसे-----माता-पिता जीवित हैं अथवा नहीं, यदि मृत हैं तो उनकी मृत्यु कब हुई, भाई-बहन कितने हैं; उनमें कितने बढे हैं-कितने छोटे; इस समय तक कुल कितनी सन्तान हैं; उनमें लडके कितने हैं और लडकियाँ कितनी, किस व्यापार या नौकरी में आप लगे हुए हैं---इत्यादि ये सब बातें बताई जाएंगी. इन सब बातों का आपके द्वारा अनुमोदन करने के बाद फिर आगे आपके जीवन का सम्पूर्ण वृतान्त आपको बताया जाएगा. यह है रूप-रेखा एक सामान्य नाडी-ग्रन्थ की

अंक ज्योतिष

पश्चिमी देशों में अंक ज्योतिष का प्रचलन बहुत ज्यादा है और वर्तमान में यह भारत में भी बहुत ही लोक प्रिय हो रहा है. अंक ज्योतिष एक ऎसी पद्धति है,जिसमें व्यक्ति के नामांक (Name number), मूलांक (Root Number) और भाग्यांक (Destiny Number) द्वारा उसके बारे में भविष्य कथन किया जाता है. अगर व्यक्ति के नामांक, मूलांक और भाग्यांक इन तीनों का आपस में ताल मेल नही है तो यह जातक के लिए विशेष शुभकारी नही होता. नामांक का अंक निर्धारण अंग्रेजी अक्षरों के द्वारा किया जाता है. और मूलांक और भाग्यांक जन्म तारीख के अनुसार तय होते हैं.

अंक ज्योतिष में नामाक्षरों में अक्षर घटा/बढाकर नामांक का अंक अनुकूल किया जाता है. परंतु इस विधि में भी यह पाया गया है कि कई बार मूलांक और भाग्यांक के अंक आपस में सामंजस्य नही रखते हैं जिसका कोई समाधान भी नही है. नामांक के अंक को तो नाम के अक्षर बदल कर बेशक अपने अनूकूल किया जा सकता है परन्तु मूलांक और भाग्यांक को कभी बदला नहीं जा सकता. जैसे 2/11/1963 को जन्में व्यक्ति का मूलांक 2 है और भाग्यांक ( 2+1+1+1+9+6+3 = 5) होता है 5 और इन दोनो अंको का यानि 2 और 5 का आपस में कोई सामंजस्य नही बनता. और ऐसे असामंजस्य वाले अंक अच्छा फ़ल नही देते और जातक ना इनको बदल सकता है और ना ही कुछ उपाय कर सकता है. शायद अंक ज्योतिष में भी यही स्थिति प्रारब्ध भोगने जैसी है. आगामी अंको मे अपने पाठकों को इस विषय पर विस्तृत रूप से जानकारी प्रदान की जायेगी.

अंकशास्त्र क्या है? पढिये.....

आपका होने वाला पति कैसा होगा?

विवाह योग्य होती कन्याएं अक्सर यह कल्पना करती हैं कि उनका होने वाला पति कैसा होगा? जो घोडी पर चढकर आयेगा और उन्हें ले जायेगा जहां उनका नया घर संसार शुरू होगा. हर लडकी की इच्छा होती है कि उसका एक सुखी गॄहस्थ जीवन हो, प्यार देने वाला पति हो और जीवन में सुख ऐश्वर्य हो.

पर क्या सभी क्न्याओं के सपने पूर्ण हो पाते हैं? एक तरफ़ ऐसा पति मिलता है जो बडा व्यापारी या ओहदेदार अफ़्सर है, अपनी पत्नि पर जान छिडकता है, उसकी सुख सुविधा के लिये अच्छा घर मकान नौकर चाकर जुटाता है तो दूसरी तरफ़ ऐसे भी पति होते हैं जो दिन रात घर में कलह किये रहते हैं. अब्बल तो वो खुद कमाने में अक्षम होकर पत्नि से दूसरों के घर झाडू बुहारी का काम करवाते हैं, बच्चों व पत्नि से मारपीट करना अपना धर्म समझते हैं. और कुछ ऐसे भी पति पाये जाते हैं जो अच्छा व्यापार, धन या अफ़सर होते हुये भी पत्नि और बच्चों को सिवाय गाली गलौच और मारपीट के कुछ नही देते, घर मे चौबीसों घंटे कलह मचाये रहते हैं. जब तक वो घर में रहते हैं, बच्चे और पत्नि यही प्रार्थना करते रहते अहिं कि कब ये घर से आफ़िस जाये और थोडी देर के लिये शांति मिले.

यानि कुछ ऐसी खुशनसीब पत्निया होती हैं जो यहां स्वर्गिक आनंद उठा रही होती हैं वही कुछ ऐसी होती हैं जो यहां साक्षात नर्क भोगती है. आईये इस बात को ज्योतिषिय दॄश्टिकोण से समझने का प्रयत्न करते हैं.

जन्म समय में जो ग्रहों की स्थिति होती है उस अनुसार विद्या, बुद्धि, धन, कुटुंब, भाग्य, सुख इत्यादि का अनुमान जन्म्कुंडली से लग जाता है इसी प्रकार किसी लडकी का दांपत्य जीवन कैसा रहेगा, इसका पता भी जन्मकुंडली स्थित ग्रहों को देखकर लग जाता है.

जनम्कुंडली का सातवां भाव जीवन साथी का होता है और गुरू पति सुख का कारक ग्रह होता है. मंगल की भुमिका यहां स्त्री के काम (यौन) सुख एवम रज से संबंधित होती है. अत: किसी स्त्री का का पति कैसा होगा और उसका भावी दांपत्य जीवन कैसा होगा? इसके लिये बहुत गहराई से स्त्री की जन्मकुंडली के सातवें भाव, सप्तमस्थ राशि, सप्तमस्थ स्थित ग्रह, सप्तम पर दॄष्टि डालने वाले अन्य भावाधिपति, वॄहस्पति ग्रह स्थित और उस पर अन्य भावाधिपतियों के प्रभाव का अध्ययन करना पडेगा. वॄहस्पति के साथ ही मंगल का भी विशेष रूप से अध्ययन कर लेना चाहिये. स्त्रियों की कुंडली का अध्ययन करते समय विशेष रूप से नवमांश कुंडली के साथ ही साथ द्रेषकाण और त्रिशांश का भलिभांति अवलोकन कर लेना चाहिये.

अब हम आपको कुछ वो योग बता रहे हैं जो किसी स्त्री की कुंडली में विद्यमान हों तो उसे दामफ्त्य सुख प्रदान करने वाले पति की प्राप्ति सहज रूप से होती है.

१. सप्तम भाव में सप्तमेष स्वग्रही हो
२. सप्तम भाव पर पाप ग्रहों की दॄष्टि ना होकर शुभ ग्रहों की दॄष्टि हो अथवा स्वयं सप्तमेश सप्तम भाव को देखता हो.
३. सप्तमस्थ कोई नीच ग्रह ना हो यदि सप्त भाव में कोई उच्च ग्रह हो तो अति सुंदर योग होता है.
४. सप्तम भाव में कोई पाप ग्रह ना होकर शुभ ग्रह विद्यमान हों और षष्ठेश या अष्टमेश की उपस्थिति सप्तम भाव में कदापि नही होनी चाहिये.
५. स्वयं सप्तमेश को षष्ठ, अष्टम एवम द्वादश भाव में नहीं होना चाहिये. सप्तमेश के साथ कोई पाप ग्रह भी नही होना चाहिये साथ ही स्वयं सप्तमेश नीच का नही होना चाहिये.
६. सप्तमेश उच्च राशिगत होकर केंद्र त्रिकोण में हो.
७. वॄहस्पति भी स्वग्रही या उच्च का होकर बलवान हो, दु:स्थानगत ना हो, उस पर पाप प्रभाव ना हो तो अति श्रेष्ठ दांपत्य सुख प्राप्त होता है.
८ मंगल भी बलवान हो. मंगल पर राहु शनि की युति अथवा दॄष्टि प्रभाव नही होना चाहिये.

कब होगा भाग्योदय ?


वर्तमान युग में मनुष्य अच्छा समय कब आयेगा? मनुष्य इसकी फ़िक्र में ही सारी उम्र गुजार देता है क्योंकि ये आर्थिक और भौतिक युग है, इस कलिकाल में आदमी की चाहत पद, सुंदर मकान और उच्च कोटि के वाहन की अतिशय होती है. अब हम आपको जन्मकुंडली की कुछ स्थितियां बताते हैं जिनके विद्यमान होने पर आप समय आने पर अवश्य पद, मकान व वाहन की प्राप्ति आसानी से कर सकेंगे. एक बात ध्यान रखिये कि वाहन, मकान, सुख का कारक चतुर्थ भाव होता है और इन सबके लिये चतुर्थेश का बलि होकर अन्य भावेशों से संबंध बनाना नितांत आवश्यक है.

यदि चतुर्थेश बली होकर केंद्र त्रिकोण में हो, साथ ही भोगों का कारक ग्रह शुक्र भी अच्छी स्थिति में हो तो चतुर्थ भाव या भावेश पर दॄष्टि डालने वाले ग्रह की दशा अंतर्दशा में वाहन सुख की प्राप्ति होगी.

एकादश भाव चतुर्थेश के साथ मंगल भी युति कर रहा हो तो निश्चय ही वाहन सुख के साथ साथ राज्य पद भी प्राप्त होता है.

नवमेश केंद्र में हो और चतुर्थेश नवम भाव में बलवान शुक्र के साथ हो तो कीमती वाहन के साथ साथ महा ऐश्वर्य की प्राप्ति भी होती है.

चतुर्थ भाव में नवमेश और चतुर्थेश हों तब भी वाहन की प्राप्ति होती है.

चतुर्थ भावगत सूर्य हो, और शुक्र से युत गुरू नवम भावगत हों तब ३४ वर्षायु पश्चात वाहन की प्राप्ति होती है.

चतुर्थ भाव पर लग्नेश एवम एकादशेश पूर्ण दॄष्टि डालते हों तो एक से अधिक वाहनों की प्राप्ति होती है.

शुभ ग्रह दॄष्ट होकर लग्नेश यदि चतुर्थ, नवम या एकादश भावगत हो तो उत्तम वाहन सुख प्राप्त होता है.

चतुर्थेश पंचमेश के द्वारा भाव परिवर्तन संबंध होने पर भी अक से अधिक वाहनों का सुख मिलता है.

दशमेश और कादशेश के चतुर्थ भाव गत होने पर भी उत्तम वाहन सुख मिलता है.

चतुर्थेश एवम एकादशेश का भाव परिवर्तन योग हो तो बारह वर्षायु में ही वाहन प्राप्ति होती है.

लग्नेश स्वग्रही या उच्च का होकर बलवान हो तो उत्तम जमीन का सुख का मिलता है.

चतुर्थेश अगर सप्तम भावगत हो तो स्त्री के माध्यम से जमीन प्राप्त होती है.

चतुर्थेश अगर अष्टम भाव गत हो तो जातक सुंदर मकान का स्वामी होता है.

लग्नेश, द्वितियेश और एकादशेश कि युति अगर चतुर्थ भाव में हो तो जातक अनेक मकानों का स्वामी होता है.

लग्नेश सप्तमेश चतुर्थ भावगत हो तो बिना प्रयास के ही मकान की प्राप्ति होती है.

राहु या शनि चतुर्थ भावगत हों तो पुराने मकान की प्राप्ति होती है.

सिंह और मकर लग्न हो और मंगल चौथे भाव में बैठा हो तो मकान बनने में अकारण अनेक परेशानियों का समना करना पडता है.

अंक ज्योतिष-- प्राथमिक परिचय

सूर्य, चन्द्र, बुध आदि नवग्रह और मेष, वृष आदि समस्त बारह राशियों तथा पृथ्वी को भी एक विकिरण तरंग पैदा करने वाले ग्रहों की मान्य सूची में रखकर पैदा हुए व्यक्तियों के सम्बोधन ध्वनियों के नामाक्षर के भाग्यवादी विश्लेषण का दूसरा नाम है---अंक ज्योतिष.

यद्यपि भारतीय ज्योतिष विज्ञान आज बहुत सक्षम और सूक्ष्म गणनाओं के आधार पर जीवन के सांगोपांग विश्लेषण का एक माध्यम बन चुका है, परन्तु भविष्य बतलाने में अंक ज्योतिष भी अपने आप में अदभुत सामर्थ्य रखता है. बस इसके लिए आपको अपने नाम के शुद्ध अंग्रेजी वर्णाक्षर का ज्ञान होना चाहिए.

आपका नाम आपके लिए कितना भाग्यशाली या अनुकूल है, इसकी जानकारी भी आप बेहद सरलता से अंक ज्योतिष के माध्यम से कर सकते हैं.

अंक ज्योतिष के प्रसंग में यह भी एक रोचक तथ्य है कि इसके फलित सूत्र सदैव अकाटय हैं और जिन्हे पूरे विश्व के सभी सभ्य समाजों में आज भी पूर्ण विश्वास के साथ अंगीकार किया जा रहा हैं. मेरा कौन सा भाग्यशाली अंक है ? या फिर कौन सा विपरीत अंक ऎसा है, जो हमारे लिए कष्ट एवं विपरीतता का माहौल पैदा कर रहा है?----इसमें सिर्फ अंक ज्योतिष ही आपकी मदद कर सकता है. इसमें न तो कोई जटिलता है और न ही इसके लिए कोई लम्बा-चौडा हिसाब किताब करना पडता है. बस आपको जन्मकुंडली या सही जन्म समय का ज्ञान अवश्य होना चाहिए.

यह निर्विवाद सत्य है कि मानव मन की थाह पाने के लिए आजतक किसी उपकरण या मशीन का इजाद नहीं हो पाया है, भले ही चाँद तारों तक पहुंचने के लिए अन्तरिक्ष यान बना लिए गये. लेकिन भारतीय ज्योतिष और उसका ही एक अंग अंक ज्योतिष ही एकमात्र ऎसा माध्यम है, जिसके जरिये किसी भी सचेतन प्राणी की गति-प्रगति का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है.
दरअसल अंकों का प्रयोग किसी भी वस्तु की संख्यात्मक मूल्यों की अभिव्यक्ति के लिए होता है, जिसमें इकाई एक आधार है. इकाई का समग्र अर्थ शून्य अर्थात जीरो से है. जीरो से ही सारे अंक निकलते हैं और फिर जीरो में ही विलीन हो जाते हैं. अर्थात ब्राह्मण्ड(शून्य) सभी ग्रहों(अंकों) की गोद है, जिसमें ये सूर्यादि समस्त ग्रह समाहित हैं.

आपका प्रधान ग्रह केतु हो तो...


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यदि आपका मुख्य ग्रह राहु हो तो...



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आपका प्रधान ग्रह शनि हो तो...


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आपका प्रधान ग्रह शुक्र हो तो...


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